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Friday, 05 June 2026
राजनीति

289 करोड़ का कैंपस, सिर्फ 15 छात्र, मोदी ने काटा था फीता

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Komal
संवाददाता
📅 27 April 2026, 7:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 438 views
289 करोड़ का कैंपस, सिर्फ 15 छात्र, मोदी ने काटा था फीता
📷 aarpaarkhabar.com

पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान की गौरवशाली शुरुआत

ग्रेटर नोएडा में स्थित 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान' को भारत के पुरातत्व के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर साबित करने के लिए बनाया गया था। 25 एकड़ की भूमि पर विस्तृत और 289 करोड़ रुपये की विशाल लागत से निर्मित इस भव्य कैंपस का औपचारिक उद्घाटन साल 2019 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। इस संस्थान के निर्माण का मुख्य उद्देश्य भारत को पुरातत्व और संस्कृति के क्षेत्र में विश्व स्तरीय शिक्षा और शोध का केंद्र बनाना था।

जब इस संस्थान का उद्घाटन किया गया था, तब इसे लेकर भारी उम्मीदें थीं। सरकार ने घोषणा की थी कि यह संस्थान न केवल भारत बल्कि एशिया के सबसे बड़े पुरातत्व प्रशिक्षण केंद्रों में से एक बनेगा। इसमें अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं, विशाल पुस्तकालय, आवासीय सुविधाएं और शिक्षण के लिए सभी आवश्यक संसाधन थे। संस्थान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारी भी कार्यरत होने वाले थे।

वर्तमान समय में संस्थान की दयनीय स्थिति

लेकिन जब हमारी टीम ने इस संस्थान की वर्तमान स्थिति का जायजा लिया, तो जो दृश्य सामने आया वह निराशाजनक और चिंताजनक था। 289 करोड़ रुपये के इस भव्य कैंपस में मात्र 15 छात्र अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। हजारों वर्ग मीटर का यह विशाल परिसर लगभग खाली दिख रहा है। कक्षाओं में सन्नाटा पसरा हुआ है। हॉस्टल में जहां सैकड़ों छात्रों के रहने की व्यवस्था की गई थी, वहां घास उग आई है।

संस्थान के पास जहां आधुनिक प्रयोगशालाएं हैं, वहां कोई काम नहीं हो रहा। बहुमंजिला इमारतें और सभागार सालों से बंद हैं। पाठ्यक्रमों में छात्रों की रुचि न के बराबर है। शिक्षकों की भी अपर्याप्त संख्या है। जो कर्मचारी हैं, वे भी विभिन्न कारणों से अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह निपट नहीं पा रहे हैं।

हमारी जांच में पता चला कि संस्थान के पास न तो पर्याप्त प्रशिक्षित शिक्षकदल है और न ही स्पष्ट शैक्षणिक दिशा-निर्देश। पाठ्यक्रम के विषय में भी स्पष्टता नहीं है कि इसे किन छात्रों के लिए तैयार किया जाए। संस्थान के प्रबंधन का कहना है कि वे नई पाठ्यक्रम तैयार कर रहे हैं, लेकिन यह प्रक्रिया बेहद धीमी गति से चल रही है।

प्रशासनिक लापरवाही और निर्णय में देरी

हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में यह पता चला कि संस्थान को लेकर विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय की भारी कमी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, संस्कृति मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन के बीच स्पष्ट दायित्व का विभाजन नहीं है। हर विभाग दूसरे पर जिम्मेदारी डालता है।

छात्र भर्ती की प्रक्रिया में भी भारी देरी हुई है। शुरुआत में भर्ती प्रक्रिया के लिए विज्ञापन निकाले गए थे, लेकिन चयन प्रक्रिया में महीनों लग गए। कई योग्य छात्रों ने अन्य संस्थानों में दाखिला ले लिया। संस्थान को बताया गया था कि इसे 500 छात्रों का नामांकन होगा, लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग है।

आवासीय सुविधाओं के रख-रखाव में भी उपेक्षा की गई है। हॉस्टल की इमारतें टूट-फूट की शिकार हैं। बुनियादी ढांचा, जिसे अत्याधुनिक बताया जाता था, वह अब जर्जर अवस्था में है। बिजली, पानी और अन्य सुविधाओं में बाधाएं आती हैं।

संस्थान के निदेशक और अन्य अधिकारी भी समय-समय पर बदलते रहे हैं, जिससे कार्यों में निरंतरता नहीं रह सकी। कोई दीर्घकालीन योजना नहीं है कि संस्थान को कैसे विकसित किया जाए और इसे सफल बनाया जाए।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार द्वारा इतने विशाल बजट और महत्वाकांक्षी परियोजना के बाद भी संस्थान अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाया। भारत के पुरातत्व क्षेत्र की यह एक बड़ी कमजोरी है। इस संस्थान को सफल बनाने के लिए तत्काल प्रशासनिक सुधार, कुशल नेतृत्व और स्पष्ट नीति की आवश्यकता है। अगर यह स्थिति जारी रहती है, तो यह 289 करोड़ रुपये का निवेश बिल्कुल बेकार साबित हो जाएगा।