पंजाब के 30 गांवों में बीमारी रिपोर्ट से शादी का फैसला
पंजाब के 30 गांवों में स्वास्थ्य रिपोर्ट के आधार पर शादी तय होती है। ग्रामीण सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहे हैं।
पंजाब के लगभग 30 गांवों में एक ऐसी प्रथा प्रचलित है जो आधुनिक भारत के लिए शर्मनाक है। यहां विवाह के फैसले पूरी तरह मेडिकल रिपोर्ट पर निर्भर करते हैं। किसी भी तरह की बीमारी का संदेह मिलता है तो शादी का रिश्ता तुरंत तोड़ दिया जाता है। इस प्रथा के कारण हजारों लड़के-लड़कियां सामाजिक बहिष्कार का शिकार हो रहे हैं।
हमारी टीम ने जब इन गांवों का दौरा किया तो लोगों के चेहरों पर निराशा और पीड़ा साफ दिखी। एक ओर तो देश में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हो रही हैं, लेकिन दूसरी ओर कुछ जगहों पर लोग बीमारी को अभिशाप मानते हैं। पंजाब के इन 30 गांवों में जहां खेती-किसानी करने वाले सरल लोग रहते हैं, वहां शादी-विवाह एक बिल्कुल अलग तरीके से होता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, किसी लड़के या लड़की के लिए शादी का रिश्ता पक्का करने से पहले पूरी मेडिकल जांच की जाती है। दोनों पक्षों के लड़के-लड़कियों को विभिन्न बीमारियों के लिए टेस्ट करवाना पड़ता है। रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद ही शादी की बात आगे बढ़ती है। यह प्रथा न केवल गैरकानूनी है, बल्कि मानवाधिकारों का भी हनन करती है।
भेदभाव का शिकार युवा
पंजाब के इन गांवों में ऐसे कई युवा हैं जिनकी शादी सिर्फ इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि उन्हें कोई बीमारी है। एक लड़का जो मधुमेह का मरीज है, उसके साथ तीन बार शादी का रिश्ता आया और तीनों बार उसकी मेडिकल रिपोर्ट के कारण तोड़ दिया गया। उसके परिवार को न केवल आर्थिक नुकसान हुआ, बल्कि सामाजिक शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ी।
एक अन्य मामले में, एक लड़की जिसे बचपन में दमा की समस्या है, वह भी शादी के लिए कई बार इनकार का सामना करती रही। गांव के लोग उसके परिवार को अपना दूर रखते हैं। बाजार में जब महिला को देखते हैं तो कानाफूसी करने लगते हैं। बच्चों को यह हिदायत दी जाती है कि उसके करीब न जाएं क्योंकि वह बीमार है।
यह भेदभाव सिर्फ विवाह तक सीमित नहीं है। इन गांवों में बीमार लोगों को सामाजिक कार्यक्रमों में भी आने के लिए दबाव डाला जाता है। मंदिर, पंचायत और सार्वजनिक समारोहों में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है। समाज के इस रवैये ने इन लोगों को मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया है।
विधिवत नियमों की अवहेलना
भारतीय संविधान और विभिन्न कानूनों में किसी भी तरह का भेदभाव गैरकानूनी है। लिंग भेद से संबंधित कानून, समान नागरिकता कानून और अन्य संवैधानिक प्रावधान स्पष्ट करते हैं कि किसी को भी बीमारी के कारण भेदभाव नहीं किया जा सकता। लेकिन पंजाब के इन ग्रामीण क्षेत्रों में कानून का पालन नहीं हो रहा है।
स्थानीय प्रशासन को भी इस मामले की जानकारी है, लेकिन वह निष्क्रिय रहा है। पंचायत स्तर पर इस प्रथा को चुपचाप चलने दिया जा रहा है। जब भी कोई शिकायत आती है, तो तुरंत पंचायत के लोग हस्तक्षेप करके मामले को दबा देते हैं। पीड़ितों को न्याय पाने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की प्रथाएं विज्ञान और तर्क के विरुद्ध हैं। हर बीमारी का इलाज संभव है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने साबित किया है कि बीमारी किसी को अयोग्य या अभिशप्त नहीं बनाती। लेकिन जहां शिक्षा का अभाव है, वहां ऐसी कुप्रथाएं आसानी से पनपती हैं।
जागरूकता और समाधान
इस समस्या का समाधान निकालने के लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। सरकार को इन गांवों में स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा देनी चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में युवाओं को सिखाया जाना चाहिए कि बीमारी किसी को हीन नहीं बनाती। महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों के माध्यम से परिवारों को यह समझना चाहिए कि स्वास्थ्य एक निजी मामला है।
एनजीओ और सामाजिक संगठनों को इन गांवों में काम करना चाहिए। पंचायत में महिलाओं और युवा प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि प्रगतिशील विचार आ सकें। प्रशासन को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए यदि किसी को भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।
पंजाब सरकार को इस मामले पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। इन 30 गांवों की पहचान करके वहां विशेष कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए। पीड़ितों को कानूनी सहायता दी जानी चाहिए। समाज में यह संदेश पहुंचना चाहिए कि बीमारी किसी को सामाजिक अधिकार से वंचित नहीं कर सकती।
आखिरकार, हर इंसान को समान सम्मान और अधिकार पाने का हक है। बीमारी जीवन का एक हिस्सा है और इसे सामान्य मानना चाहिए। पंजाब के इन गांवों में जो कुछ चल रहा है, वह न केवल अमानवीय है, बल्कि संवैधानिक रूप से भी दोषपूर्ण है। समय आ गया है कि समाज इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठाए और एक समतामूलक समाज की ओर कदम बढ़ाए।




