🔴 ब्रेकिंग
सरकारी नौकरी: 3500+ पद, आज अंतिम तिथि|हरमन-दीप्ति के शतकों से भारत की शानदार जीत|सर्बिया चुनाव: छात्रों की जीत, वुसिक की हार|एलआईसी जीवन आनंद स्कीम: मैच्योरिटी पर ₹25 लाख|अवनीत कौर की बिकिनी लुक में बोल्डनेस ने उड़ाई अक्ल|फिरोजाबाद में कार हादसा: 4 की मौत|गेहूं का आटा कितने महीने तक रहता है खराब नहीं|अनुष्का शर्मा और विराट कोहली कृष्णा दास कंसर्ट में|मथुरा में सोशल मीडिया ठग गिरफ्तार, महिलाओं को भड़काता था|जम्मू-कश्मीर विलय दिवस: 26 अक्तूबर 1947 का इतिहास|सरकारी नौकरी: 3500+ पद, आज अंतिम तिथि|हरमन-दीप्ति के शतकों से भारत की शानदार जीत|सर्बिया चुनाव: छात्रों की जीत, वुसिक की हार|एलआईसी जीवन आनंद स्कीम: मैच्योरिटी पर ₹25 लाख|अवनीत कौर की बिकिनी लुक में बोल्डनेस ने उड़ाई अक्ल|फिरोजाबाद में कार हादसा: 4 की मौत|गेहूं का आटा कितने महीने तक रहता है खराब नहीं|अनुष्का शर्मा और विराट कोहली कृष्णा दास कंसर्ट में|मथुरा में सोशल मीडिया ठग गिरफ्तार, महिलाओं को भड़काता था|जम्मू-कश्मीर विलय दिवस: 26 अक्तूबर 1947 का इतिहास|
Thursday, 05 November 2026
राजनीति

सर्बिया चुनाव: छात्रों की जीत, वुसिक की हार

सर्बिया के चुनाव में छात्र प्रदर्शनकारियों ने बहुमत जीता और पुतिन समर्थक राष्ट्रपति वुसिक को हराया। देश में राजनीतिक बदलाव की नई शुरुआत।

author
Komal
संवाददाता
📅 26 October 2026, 7:47 AM ⏱ 1 मिनट 👁 767 views
सर्बिया चुनाव: छात्रों की जीत, वुसिक की हार
📷 aarpaarkhabar.com

सर्बिया में हुए हाल के चुनावों ने देश की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुसिक को इस बार चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है। छात्रों के प्रदर्शन और जनता के आंदोलन से जन्मी नई राजनीतिक शक्तियां अब सर्बिया की सरकार में बहुमत लेकर आई हैं। यह विकास न केवल सर्बिया के लिए बल्कि पूरे यूरोपीय क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

वुसिक की राजनीतिक यात्रा काफी लंबी और विवादास्पद रही है। उन्होंने लगभग दो दशक तक सर्बिया की राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखा। उनके शासनकाल में सर्बिया को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भारतीय राजनीति में भी राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन बदलाव के माध्यम से नई सरकारें आई हैं। सर्बिया में भी यही प्रक्रिया दिख रही है।

वुसिक पर विभिन्न आरोप लगे हैं कि उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों को नष्ट किया। उनके काल में मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगे थे। न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी खतरे में आ गई थी। बहुत से लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर किया गया। इसी वजह से देश के विभिन्न क्षेत्रों में असंतोष की भावना बढ़ने लगी थी।

छात्र आंदोलन की शुरुआत और विकास

पिछले दो वर्षों में सर्बिया के छात्रों ने एक मजबूत आंदोलन खड़ा किया। यह आंदोलन शुरुआत में कुछ प्रमुख मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था। छात्रों को शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार की समस्या और राजनीतिक पारदर्शिता को लेकर चिंताएं थीं। धीरे-धीरे यह आंदोलन एक व्यापक जन आंदोलन का रूप ले गया।

छात्र संगठनों ने विभिन्न शहरों में प्रदर्शन किए। बेलग्रेड, नोवी सैड, निश और अन्य प्रमुख शहरों में हजारों छात्र सड़कों पर उतरे। उन्होंने वुसिक की सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन किए और लोकतांत्रिक सुधारों की मांग की। इस आंदोलन ने जल्द ही बड़े पैमाने पर जनता को प्रभावित किया। समाज के विभिन्न वर्गों के लोग इस आंदोलन से जुड़ गए।

छात्रों का यह आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था। उन्होंने हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। बल्कि संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी मांग को रखा। गांधी जी के अहिंसात्मक तरीके यहां भी देखे जा सकते हैं। इसी वजह से लोगों का समर्थन निरंतर बढ़ता गया।

चुनाव परिणाम और नई सरकार का गठन

चुनाव के परिणाम आ गए हैं और सर्बिया की जनता ने अपना फैसला दे दिया है। छात्र आंदोलन से जुड़ी राजनीतिक शक्तियों ने चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया है। कई नई राजनीतिक पार्टियां भी चुनाव में सफल रहीं। वुसिक की पार्टी को चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा है।

चुनाव के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। विभिन्न पार्टियां आपस में समझौता कर रही हैं। एक स्थिर सरकार बनाने के लिए गठबंधन की चर्चाएं चल रही हैं। नई सरकार को काफी चुनौतियों का सामना करना होगा। देश की अर्थव्यवस्था को ठीक करना, भारत जैसे विविध समाज में साम्प्रदायिक सद्भावना बनाए रखना ये सब काम करने होंगे।

भू-राजनीतिक प्रभाव और पुतिन समर्थन

वुसिक का एक और विवादास्पद पक्ष यह रहा कि उन्हें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का समर्थन प्राप्त था। यूक्रेन पर रूस के हमले के समय वुसिक के रवैये पर सवालिया निशान लगे थे। पश्चिमी देशों ने सर्बिया पर दबाव डाला कि वह रूस के खिलाफ प्रतिबंधों में शामिल हो।

वुसिक ने इस बीच एक संतुलन कर रखा था। एक ओर तो उन्होंने यूरोपीय संघ के सदस्य बनने की बातें कहीं, लेकिन दूसरी ओर रूस से अपने संबंध बनाए रखे। छात्रों और जनता को यह नीति पसंद नहीं आई। सर्बिया की जनता यूरोपीय मूल्यों और लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर जाना चाहती थी।

नई सरकार के आने से सर्बिया की विदेश नीति में बदलाव आ सकता है। यूरोपीय संघ से संबंध और भी मजबूत हो सकते हैं। नाटो के साथ सहयोग बढ़ सकता है। हालांकि सर्बिया की एक पारंपरिक रूसी जनता भी है जो रूस से अच्छे संबंध चाहती है। इसलिए नई सरकार को एक नाजुक संतुलन बनाना होगा।

सर्बिया के इस चुनावी परिणाम से दक्षिण पूर्वी यूरोप की राजनीति में नई हलचल आएगी। छात्र आंदोलन से जन्मी नई राजनीतिक संस्कृति अन्य देशों को भी प्रभावित कर सकती है। लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत को इस चुनाव में देखा जा सकता है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में भी ऐसे उदाहरण देखे जा सकते हैं, जहां जनता के मतदान से बदलाव आया है।