ट्रंप ने ईरान से युद्ध क्यों शुरू किया
ट्रंप की ईरान नीति में नेतन्याहू का प्रभाव
11 फरवरी 2026 की सुबह एक ऐतिहासिक मुलाकात हुई। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू व्हाइट हाउस पहुंचे। उनके साथ एक गोपनीय प्रेजेंटेशन था जिसका विषय था ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सीधे सिचुएशन रूम में बैठे थे। नेतन्याहू ने अपनी योजना प्रस्तुत की। हर बिंदु, हर विश्लेषण, हर सैन्य चाल सावधानी से तैयार की गई थी। जब नेतन्याहू ने समाप्त किया, तो ट्रंप ने मुस्कुराते हुए कहा: "साउंड्स गुड टू मी।" ये पांच शब्द काफी थे। इसके बाद की घटनाओं ने पूरे विश्व को हिलाकर रख दिया।
ट्रंप की सरकार में विरोधाभास थे। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल केन दीर्घकालीन प्रभाव को लेकर चिंतित थे। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पहले से ही युद्ध विस्तार के विरुद्ध थे। विदेश मंत्री मार्को रूबियो सीआईए की चेतावनियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहते थे। सीआईए के विश्लेषकों ने नेतन्याहू की योजना को "अव्यावहारिक और अत्यधिक जोखिम भरा" बताया। तकनीकी विभाग ने भी कई त्रुटियां पाई थीं। लेकिन यह सब कुछ ट्रंप के निर्णय के सामने फीका पड़ गया।
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठकें गर्मागर्म होने लगीं। रूबियो ने स्पष्ट शब्दों में कहा: "यह योजना बकवास है।" जनरल केन ने सामरिक नुकसान के बारे में विस्तार से बताया। वेंस ने तर्क दिया कि इससे अमेरिका के सीमित संसाधन और भी घट जाएंगे। लेकिन ट्रंप ने सभी को अनदेखा किया। उन्हें नेतन्याहू की योजना पसंद आई थी।
सरकार का विभाजन और एक मंत्री की एकल भूमिका
ट्रंप की कैबिनेट में गहरा विभाजन था। अधिकांश सदस्य नेतन्याहू की योजना से सहमत नहीं थे। लेकिन एक मंत्री था जो पूरी तरह इसके समर्थन में था। वह था रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ। हेग्सेथ ने न केवल योजना को समर्थन दिया, बल्कि इसे और भी आक्रामक बनाने के लिए सुझाव दिए। उन्होंने सैन्य संसाधनों को अधिकतम तरीके से तैयार करने पर जोर दिया।
हेग्सेथ और ट्रंप का संबंध बहुत करीबी था। हेग्सेथ ने ट्रंप को विश्वास दिलाया कि यह युद्ध जल्दी खत्म होगा। उन्होंने बताया कि अमेरिकी सेना ईरान को आसानी से नियंत्रित कर सकती है। उन्होंने दावा किया कि इस ऑपरेशन में अधिक जनशक्ति की आवश्यकता नहीं होगी। ये सब बातें ट्रंप को लुभाईं। वो सुन रहे थे जो सुनना चाहते थे।
आंतरिक मतभेद गहरे होते गए। रूबियो ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे इस निर्णय से असहमत हैं। वेंस ने व्यक्तिगत रूप से ट्रंप से बात की। जनरल केन ने अपना इस्तीफा देने का संकेत दिया। लेकिन ट्रंप पर कोई असर नहीं पड़ा। उनका मन पहले से ही बना चुका था।
26 फरवरी की शाम: वह पल जो सब कुछ बदल गया
26 फरवरी 2026 की शाम अमेरिकी राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पल साबित हुई। सिचुएशन रूम में एक अंतिम बैठक बुलाई गई। सभी प्रमुख सदस्य वहां मौजूद थे। इंटेलिजेंस रिपोर्ट तैयार की गई थी। सैन्य योजना अंतिम रूप से तैयार की जा चुकी थी। व्हाइट हाउस के प्रमुख सलाहकार चिंतित थे।
रूबियो ने एक बार फिर से अपनी असहमति व्यक्त की। वेंस ने अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव के बारे में बताया। जनरल केन ने सैन्य हताहत की संभावना को लेकर चेतावनी दी। सीआईए प्रमुख ने स्पष्ट रूप से कहा कि ईरान का जवाब बहुत खतरनाक हो सकता है। लेकिन शाम 6:30 बजे, जब सभी बातें खत्म हो गईं, तो ट्रंप ने घोषणा की: "हमें लगता है हमला करना चाहिए।"
ये सात शब्द पर्याप्त थे। निर्णय ले लिया गया था। कोई और बहस नहीं। कोई और सवाल नहीं। ट्रंप ने स्पष्ट निर्देश दिए कि सभी तैयारी तुरंत आगे बढ़ाई जाए। हेग्सेथ ने तुरंत सैन्य कमांडरों को बुलाया। सेना को सर्वोच्च स्तर की तैयारी के आदेश दिए गए।
रूबियो ने तुरंत अपना विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि वे इस निर्णय को गलत मानते हैं और इसके परिणामों के लिए जिम्मेदारी नहीं लेंगे। वेंस ने भी अपना स्टेटमेंट दिया, लेकिन कुछ देर बाद। जनरल केन चुप रहे, लेकिन उनके चेहरे पर गहरी चिंता थी। सीआईए प्रमुख ने अपने विश्लेषण की एक प्रति व्हाइट हाउस के रिकॉर्ड में दर्ज करवाई।
इस निर्णय के पीछे क्या कारण थे? ट्रंप के आंतरिक सर्किल के अनुसार, राष्ट्रपति को लगा कि यह कार्रवाई अमेरिका को वैश्विक मंच पर शक्तिशाली दिखाएगी। नेतन्याहू की योजना को देखते हुए, उन्हें विश्वास था कि यह ऑपरेशन सफल होगा। हेग्सेथ के आश्वासन ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ट्रंप के राजनीतिक सलाहकारों ने सुझाव दिया कि यह कदम उन्हें मजबूत राष्ट्रपति के रूप में स्थापित करेगा।
लेकिन इतिहास जानता है कि क्या हुआ। यह निर्णय अमेरिका के लिए एक लंबे और कठिन संघर्ष की शुरुआत साबित हुई। जो चेतावनियां दी गई थीं, वो सभी सच साबित हुईं। रूबियो और वेंस की चिंताएं न केवल वैध थीं, बल्कि भविष्य की घटनाओं में प्रतिबिंबित होने लगीं। ट्रंप का यह निर्णय एक ऐसी यात्रा की शुरुआत थी जिसका अंत किसी को भी पूरी तरह पता नहीं था।
राजनीतिक इतिहास के छात्रों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पाठ बन गया। एक नेता के निर्णय कैसे पूरे देश की भाग्य बदल सकते हैं। कैसे एक सलाहकार की राय दूसरी सभी को नकार सकती है। और कैसे अंतर्राष्ट्रीय नीति के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय कभी-कभी बहुत कम लोगों द्वारा लिए जाते हैं।




