EV कार का PUC चालान: इलेक्ट्रिक गाड़ी को क्यों मिला जुर्माना
राजस्थान के नागौर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर हर कोई दंग है। प्रदूषण मुक्त यात्रा के लिए इलेक्ट्रिक कार (EV) खरीदने वाले एक शख्स को तब जोर का झटका लगा, जब पुलिस ने उसकी बैटरी से चलने वाली कार का प्रदूषण प्रमाणपत्र (PUC) न होने का चालान काट दिया। यह घटना उजागर करती है कि हमारे देश में EV से संबंधित कानूनों को लेकर कितना भ्रम है और ट्रैफिक पुलिस को इसके बारे में कितनी कम जानकारी है।
इस मामले में वाहन मालिक ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि उसकी गाड़ी में साइलेंसर ही नहीं है क्योंकि यह इलेक्ट्रिक कार है। ईवी में पेट्रोल या डीजल इंजन नहीं होता, इसलिए न तो इसमें एक्जॉस्ट सिस्टम होता है और न ही साइलेंसर। फिर भी, पुलिस द्वारा PUC सर्टिफिकेट न होने का चालान काटा गया। यह पूरी घटना देश के कानूनों और उन्हें लागू करने वाली एजेंसियों के बीच असंगति को दर्शाती है।
PUC नियम और EV कारों का मामला
प्रदूषण प्रमाणपत्र (PUC) या प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र का मुख्य उद्देश्य है यह सुनिश्चित करना कि पेट्रोल और डीजल चलित वाहन पर्यावरण के अनुरूप प्रदूषण नियंत्रण मानदंडों को पूरा करते हैं। इसमें वाहन के एक्जॉस्ट पाइप से निकलने वाली हानिकारक गैसों जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर की जांच की जाती है।
इलेक्ट्रिक वाहनों के मामले में, चूंकि ये शून्य उत्सर्जन पर काम करते हैं, इसलिए उन्हें कानूनी तौर पर PUC प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। कई देशों में तो इलेक्ट्रिक वाहनों को PUC जांच से पूरी तरह छूट दी जाती है। लेकिन भारत में, विभिन्न राज्यों में इस संबंध में अलग-अलग नियम हैं, जिससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
भारत सरकार ने भी कई बार स्पष्ट किया है कि इलेक्ट्रिक वाहनों को PUC प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। राजस्थान परिवहन विभाग भी इस बात को मानता है, लेकिन ट्रैफिक पुलिस स्तर पर जानकारी की कमी से ऐसी गलतियां होती हैं।
ट्रैफिक पुलिस में जागरूकता की कमी
नागौर मामले में जो सबसे चिंताजनक बात उजागर हुई है वह है ट्रैफिक पुलिस में इलेक्ट्रिक वाहनों से संबंधित कानूनों के प्रति जागरूकता की कमी। पुलिस के पास यातायात नियमों की जानकारी होनी चाहिए, लेकिन जब नई तकनीक आती है तो अक्सर उन्हें समय पर प्रशिक्षण नहीं दिया जाता।
देश भर में पुलिस विभागों को आपातकालीन आधार पर EV वाहनों के बारे में विस्तृत जानकारी और दिशानिर्देश प्रदान करने की जरूरत है। इसमें शामिल होना चाहिए कि इलेक्ट्रिक वाहनों को किन कानूनों से छूट दी जाती है और किन नियमों का उन्हें पालन करना होता है।
राजस्थान में इस घटना के बाद, अधिकारियों को पुलिस कर्मियों के लिए तत्काल प्रशिक्षण सेशन आयोजित करने चाहिए। साथ ही, सभी ट्रैफिक थानों में एक सूचना पत्र जारी किया जाना चाहिए जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया हो कि इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए PUC अनिवार्य नहीं है।
EV को बढ़ावा देने के लिए सही नीति की जरूरत
भारत सरकार ने 2050 तक कार्बन न्यूट्रल होने का लक्ष्य रखा है और इसके लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों पर बेशुमार लाभ दिए हैं जैसे कम पंजीकरण शुल्क, रोड टैक्स में छूट, और PUC से मुक्ति।
लेकिन जब आम नागरिक को EV खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और फिर अनजाने में गलत चालान काट दिया जाता है, तो इससे लोगों के मन में ईवी को लेकर संशय पैदा होता है। इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति को सफल बनाने के लिए, केंद्र और राज्य सरकारों को समन्वित तरीके से काम करना होगा।
नागौर के इस मामले को सकारात्मक रूप से देखें तो यह एक सीखने का मौका है। इससे पता चलता है कि कहां सुधार की जरूरत है। राज्य सरकारों को चाहिए कि वे नियमित अंतराल पर ट्रैफिक पुलिस को प्रशिक्षण दें। साथ ही, सभी संबंधित विभागों को एक समन्वित दिशानिर्देश दिया जाना चाहिए।
वाहन मालिकों को भी सलाह दी जाती है कि जब कोई गलत चालान काटा जाए तो तुरंत संबंधित ट्रैफिक थाने या उच्च अधिकारियों के पास शिकायत करें। इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर सरकार का रुख सकारात्मक है, इसलिए ऐसे मामलों में न्याय मिलना चाहिए।
संक्षेप में, नागौर का यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि नई तकनीकों को अपनाते समय सभी स्तरों पर सही जानकारी और समन्वय होना कितना जरूरी है। EV क्रांति को सफल बनाने के लिए केवल सरकारी प्रोत्साहन पर्याप्त नहीं है, बल्कि कानूनों को सही तरीके से लागू करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस घटना से उम्मीद है कि राज्य सरकारें इस ओर ध्यान देंगी और भविष्य में ऐसी गलतियां नहीं होंगी।




