तमिलनाडु चुनाव: मुफ्त वादों का सफर
तमिलनाडु के चुनावी इतिहास में मुफ्त योजनाओं और नकद सहायता की एक लंबी परंपरा रही है। राज्य की राजनीति में जहां बदलाव आया, वहीं सरकारें बदलीं, पर मुफ्त वादों की यह परंपरा कभी बंद नहीं हुई। असल में, यह द्रविड़ आंदोलन की विरासत है जो राजनीतिक दलों ने अपनाई और समय के साथ इसे और विस्तृत करते गए।
तमिलनाडु में मुफ्त योजनाओं की शुरुआत पढ़ाई और खाने से हुई थी। दशकों पहले जब राज्य में गरीबी अधिक थी, तब स्कूलों में बच्चों को मुफ्त भोजन देने की योजना लाई गई। यह केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं थी, बल्कि राजनीतिक दलों के लिए सत्ता हासिल करने का माध्यम भी बन गई। जो पार्टी सत्ता में आई, उसने इस योजना को न केवल जारी रखा, बल्कि इसमें और सामग्रियां जोड़ती गई।
मुफ्त योजनाओं का विस्तार
समय के साथ तमिलनाडु में मुफ्त की योजनाओं का दायरा बहुत बढ़ गया। शुरुआत में जहां स्कूलों में मुफ्त भोजन और किताबें दी जाती थीं, वहीं अब राज्य की सरकारें बिजली, पानी और अन्य सुविधाओं में भी मुफ्त देने के वादे कर रहीं। महिलाओं के लिए मुफ्त गोल्ड योजनाएं, सार्वजनिक परिवहन में मुफ्त पास, बुजुर्गों के लिए नकद सहायता - ये सभी योजनाएं अब तमिलनाडु की राजनीति का अभिन्न अंग बन गई हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुफ्त योजनाओं का विस्तार प्रौद्योगिकी की ओर भी हुआ है। पहले जहां मुफ्त में सिर्फ जीवन की जरूरत की चीजें दी जाती थीं, अब लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी मुफ्त में देने की घोषणाएं होने लगीं। विभिन्न राजनीतिक दलों ने चुनावों से पहले आकर्षक वादे किए हैं कि वे सत्ता में आने पर बेरोजगार युवाओं को लैपटॉप, स्मार्टफोन और अन्य आधुनिक उपकरण देंगे।
यह माना जाता है कि द्रविड़ राजनीति की मूल विचारधारा समाज के सभी वर्गों के लिए समानता और सामाजिक न्याय लाना था। पर समय के साथ इस विचारधारा को चुनावी जीत के लिए एक हथियार में बदल दिया गया। राजनेता अब जनता को बेहतर प्रशासन देने की बजाय, मुफ्त सामान देकर उनका समर्थन हासिल करने की कोशिश करते हैं।
आर्थिक बोझ और राजकोष पर असर
तमिलनाडु की सरकार के बजट पर मुफ्त योजनाओं का भारी दबाव है। पिछले बजट वर्ष 2025-26 में अकेले इन सभी स्कीमों के लिए राज्य को 98,857 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े। यह राशि राज्य के कुल बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बावजूद राज्य की बुनियादी सुविधाएं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, और बेहतर बुनियादी ढांचे के विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा पाता।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ये मुफ्त योजनाएं अस्थायी राहत तो देती हैं, पर दीर्घकालिक विकास में बाधा बनती हैं। जब सरकार का अधिकांश पैसा मुफ्त योजनाओं में लग जाता है, तो बेहतर स्कूल, अस्पताल, और रोजगार के अवसर पैदा करने पर निवेश नहीं हो पाता। यह एक दुष्चक्र बन गया है जहां राजनीतिक दल चुनावों से पहले और बड़े वादे करते हैं, और सत्ता में आने के बाद उन वादों को पूरा करने के लिए और ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है।
पर यह भी सच है कि तमिलनाडु में ये मुफ्त योजनाएं जनता को पसंद आती हैं। चुनाव के परिणामों से लगता है कि जो पार्टी बेहतर मुफ्त सामान देने का वादा करती है, वही अक्सर चुनावों में जीतती है। इसलिए किसी भी पार्टी को ये योजनाएं रद्द करने का साहस नहीं दिख रहा है।
द्रविड़ राजनीति की विरासत
आश्चर्य की बात यह है कि जो योजनाएं एक राजनीतिक दल लेकर आया, उसे अगली सरकार ने बंद नहीं किया, बल्कि और बढ़ाया। द्रविड़ मुनेत्रा कड़गम (डीएमके) जब सत्ता में आई, तो उसने अन्नाद्रमुक (एडीएमके) की योजनाओं को न केवल जारी रखा, बल्कि उनमें और सामग्रियां जोड़ीं। इसी तरह जब अन्नाद्रमुक की सरकार वापस आई, तो उसने भी डीएमके की योजनाओं को बढ़ाया।
यह राजनीतिक परंपरा तमिलनाडु की विशेषता बन गई है। हर चुनाव में नए और बड़े वादे होते हैं। महिलाओं के लिए सोना, युवाओं के लिए लैपटॉप, बेरोजगारों के लिए सीधा नकद - ये सभी वादे अब एक सामान्य बात हो गई है। राजनीतिक दल जानते हैं कि अगर उन्हें जीतना है, तो मुफ्त योजनाओं के बड़े वादे करने होंगे।
तमिलनाडु के राजनीतिक दलों के बीच अब यह एक अलिखित होड़ हो गई है कि कौन बेहतर और ज्यादा मुफ्त सामान देने का वादा करता है। इस होड़ में कभी-कभी तो विचार भी बिखर जाते हैं। पार्टियां अपनी विचारधारा और नीतियों से अधिक मुफ्त योजनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित करती हैं। इससे तमिलनाडु की राजनीति को कमजोर बनाने का काम हुआ है।
मुफ्त योजनाएं निश्चित रूप से समाज के गरीब और कमजोर वर्गों के लिए महत्वपूर्ण हैं, पर इन्हें अस्थायी राहत के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि दीर्घकालिक समाधान के रूप में। तमिलनाडु के राजनेताओं को चाहिए कि वे दीर्घकालिक विकास पर ध्यान दें और युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करें। केवल मुफ्त सामान देने से राज्य का संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। जब तक राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी और युवाओं को स्वावलंबी बनाने के प्रयास नहीं होंगे, तब तक तमिलनाडु की राजनीति इसी दुष्चक्र में फंसी रहेगी।




