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Friday, 05 June 2026
राजनीति

ईरान अंदरूनी रार, इस्लामाबाद शांति वार्ता रुकी

author
Komal
संवाददाता
📅 24 April 2026, 6:47 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.2K views
ईरान अंदरूनी रार, इस्लामाबाद शांति वार्ता रुकी
📷 aarpaarkhabar.com

ईरान की राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर तनाव देखने को मिला है। अमेरिका के साथ इस्लामाबाद में होने वाली ऐतिहासिक शांति वार्ता अंतिम समय पर स्थगित कर दी गई है। इस निर्णय के पीछे ईरान की आंतरिक सत्ता संघर्ष का हाथ है। राष्ट्रपति इब्राहिम रैसी के नेतृत्व वाली सरकार और सर्वोच्च नेता खामेनेई के करीबी धड़े के बीच परमाणु समझौते और वार्ता की शर्तों को लेकर गहरे मतभेद सामने आए हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह स्थिति ईरान के भीतर चल रहे सत्ता संघर्ष का ही परिणाम है। पिछले कुछ सालों से ईरान में रूढ़िवादी और सुधारवादी खेमों के बीच की दूरी बढ़ती ही जा रही है। परमाणु कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर दोनों पक्षों के विचार एकदम अलग-अलग हैं। राष्ट्रपति पेजेशकियन का समूह अमेरिका के साथ वार्ता के पक्ष में है, जबकि खामेनेई के सलाहकार इसे देश के स्वार्थ के खिलाफ मानते हैं।

ईरान की आंतरिक राजनीति में बढ़ता तनाव

ईरान की राजनीतिक व्यवस्था बेहद जटिल है। यहां राष्ट्रपति के पास सरकार चलाने की शक्तियां होती हैं, लेकिन सर्वोच्च नेता के पास सेना, न्यायपालिका और अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं पर नियंत्रण होता है। इसी कारण कई बार ये दोनों शक्तियां एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी हो जाती हैं। वर्तमान परिस्थिति भी कुछ ऐसी ही है।

राष्ट्रपति रैसी के प्रशासन की ओर से यह सुझाव आया था कि अमेरिका के साथ इस्लामाबाद में शांति वार्ता होनी चाहिए। इस वार्ता के जरिए ईरान अपनी परमाणु कार्यक्रम को लेकर आंतरराष्ट्रिक समुदाय को आश्वस्त करना चाहता है। साथ ही, अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए भी विदेशी निवेश की जरूरत है। लेकिन सर्वोच्च नेता की ओर से इस विचार को लेकर असहमति व्यक्त की गई।

खामेनेई के करीबी सलाहकारों का तर्क यह है कि अमेरिका कभी ईरान के साथ ईमानदारी से नहीं बरता है। पिछली परमाणु समझौते (जेसीपीओए) को अमेरिका ने 2018 में ही तोड़ दिया था। इसी कारण ईरान को फिर से वार्ता में शामिल होने से पहले अमेरिका की मंशा को परखना चाहिए। इस तरह की आशंकाओं के कारण ईरान के भीतर नई बहस शुरू हो गई।

परमाणु समझौते पर मतभेद का बढ़ता असर

ईरान का परमाणु कार्यक्रम बीते कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय रहा है। वर्ष 2015 में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच एक विस्तृत समझौता हुआ था, जिसे संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के तहत ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाने को राजी होना पड़ा था।

हालांकि, 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को अलग कर दिया। इसके बाद से ईरान ने फिर से अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। अब नई सरकार चाहती है कि इस समझौते को फिर से जीवंत किया जाए। लेकिन इसे लेकर ईरान के नेतृत्व में अतंर्विरोध हैं।

राष्ट्रपति का पक्ष यह मानता है कि परमाणु समझौते के माध्यम से ईरान आर्थिक प्रतिबंधों से मुक्ति पा सकता है। वहीं, खामेनेई के सलाहकारों का कहना है कि अमेरिका इस समझौते को तोड़ने के लिए किसी भी समय तैयार है। इसलिए ईरान को अपनी परमाणु क्षमता को मजबूत करते रहना चाहिए। इसी विचारधारात्मक मतभेद के कारण इस्लामाबाद की वार्ता स्थगित कर दी गई।

वार्ता स्थगन के भू-राजनीतिक प्रभाव

इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता का स्थगन केवल ईरान तक सीमित नहीं है। इसके वृहत्तर भू-राजनीतिक असर हैं। पाकिस्तान को इस वार्ता से क्षेत्रीय शांति बहाल करने की आशा थी। अमेरिका और ईरान के बीच बेहतर संबंध क्षेत्र में स्थिरता ला सकते थे।

गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया है। सीरिया, इराक और यमन जैसे मुल्कों में दोनों का प्रभाव क्षेत्र टकराव का कारण बन गया है। इस बीच अगर इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता सफल हो जाती, तो इस क्षेत्र में शांति की संभावनाएं बढ़ सकती थीं।

इस वार्ता के स्थगन से भारत जैसे देशों को भी चिंता होनी चाहिए। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सीधा असर फारस की खाड़ी और हिंद महासागर में व्यापार मार्गों पर पड़ता है। भारत की एक बड़ी आबादी तेल आयात के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर है। क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने से भारत को भी अर्थव्यवस्था के स्तर पर नुकसान हो सकता है।

ईरान के अंदरूनी राजनीतिक संकट से पता चलता है कि बड़ी भूराजनीतिक समस्याओं का समाधान आसान नहीं है। एक देश के भीतर के विभिन्न शक्तिशाली खेमों के बीच सहमति बनाना भी कठिन होता है। ईरान के मामले में भी यही हो रहा है। जब तक राष्ट्रपति और सर्वोच्च नेता के बीच परमाणु नीति को लेकर सहमति नहीं बन जाती, तब तक अंतरराष्ट्रीय वार्ता आगे नहीं बढ़ सकती।

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ईरान अपने इस आंतरिक मतभेद को कैसे सुलझाता है। क्या राष्ट्रपति और सर्वोच्च नेता के बीच कोई समझौता बन पाएगा, या फिर यह संकट और गहरा जाएगा? अभी के लिए तो स्पष्ट है कि इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता का अनिश्चित भविष्य है। इसके स्थगन के कारण क्षेत्र में राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ गई है।