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Friday, 05 June 2026
धर्म

भौम प्रदोष व्रत 2026: पूजा मुहूर्त और विधि

author
Komal
संवाददाता
📅 28 April 2026, 6:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 855 views

हिंदू धर्म में व्रत और पूजा का विशेष महत्व है। इन्हीं पवित्र परंपराओं में से एक है भौम प्रदोष व्रत, जिसे आज रखा जा रहा है। यह व्रत हर महीने में दो बार आता है और माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने से भगवान शिव और हनुमान जी की विशेष कृपा मिलती है। आइए जानते हैं कि भौम प्रदोष व्रत क्या है, इसका महत्व क्या है और इसे सही तरीके से कैसे पूरा किया जाए।

भौम प्रदोष व्रत का महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रदोष व्रत को बहुत ही पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रदोष का अर्थ है संध्या का समय, जो सूर्यास्त के बाद का समय होता है। हर महीने में दो प्रदोष आते हैं - एक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को और एक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को।

भौम प्रदोष का विशेष अर्थ है मंगलवार के दिन आने वाला प्रदोष व्रत। भौम का अर्थ है मंगल ग्रह और मंगलवार। यह व्रत विशेषतः मंगल ग्रह की नकारात्मक प्रभाव से बचने और उसकी सकारात्मक शक्तियों को प्राप्त करने के लिए रखा जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भौम प्रदोष व्रत पर भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद मिलता है। इसके अलावा हनुमान जी को भी इस व्रत का विशेष महत्व है क्योंकि हनुमान जी मंगल ग्रह के देवता माने जाते हैं। जो लोग इस व्रत को पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ रखते हैं, उन्हें जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं।

इस व्रत को रखने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं दूर होती हैं, आर्थिक परेशानियों में कमी आती है और पारिवारिक जीवन में सुख-शांति बढ़ती है। मंगल ग्रह की चाल खराब हो या किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल दोष हो, तो भौम प्रदोष व्रत रखना विशेषतः लाभकारी माना जाता है।

शुभ मुहूर्त और व्रत का समय

भौम प्रदोष व्रत को सही मुहूर्त में रखना बहुत जरूरी है। प्रदोष व्रत को संध्या के समय पूजा करने का विधान है। संध्या काल का समय सूर्यास्त के बाद शुरू होता है और चंद्र उदय तक रहता है।

इस बार भौम प्रदोष व्रत के लिए संध्या का समय शाम साढ़े पांच बजे से लेकर रात आठ बजे तक माना जा रहा है। इसी समय में भगवान शिव की पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है। व्रत को सुबह से शुरू किया जाता है और संध्या में भगवान की पूजा के बाद पारण किया जाता है।

व्रत रखने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह व्रत के दिन सूर्योदय से पहले ही उठ जाएं, स्नान-ध्यान कर लें और भगवान शिव का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। दिनभर में केवल फल, दूध और जल का सेवन करना चाहिए। सांयकाल को संध्या के समय भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए।

भौम प्रदोष व्रत की पूजा विधि

भौम प्रदोष व्रत की पूजा को सही विधि से करना बहुत महत्वपूर्ण है। पहले अपने पूजा स्थल को साफ-सुथरा कर लें। फिर भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग को स्थापित करें।

पूजा शुरू करते समय भगवान गणेश का आह्वान करें। फिर एक दीप जलाएं और संध्या के समय भगवान शिव को जल से स्नान कराएं। शिव को चंदन, फूल और तुलसी का पत्ता अर्पित करें। भगवान को फल और खीर का भोग लगाएं।

शिवजी की आरती करें और उनसे आशीर्वाद मांगें। आप चाहें तो 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप भी कर सकते हैं। इसके बाद हनुमान जी को भी फूल और दीप अर्पित करें क्योंकि हनुमान जी मंगल ग्रह से जुड़े हैं।

पूजा के बाद प्रसाद को घर के सभी सदस्यों को बांटें। व्रत को संध्या के बाद तोड़ते समय शुद्ध घी या दूध का सेवन करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा आप दाल, चावल या खीर खा सकते हैं।

व्रत के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां

भौम प्रदोष व्रत को रखते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। सबसे पहले तो मन और शरीर दोनों को पवित्र रखना चाहिए। व्रत के दिन किसी को गुस्सा नहीं करना चाहिए और न ही किसी के साथ बुरा व्यवहार करना चाहिए।

व्रत के दिन झूठ बोलना, किसी को गाली देना या अश्लील बातें करना मना है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मन में शुद्ध विचार रखने चाहिए। जो महिलाएं इस व्रत को रखती हैं, उन्हें विशेषतः पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए।

व्रत के दिन में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और देर रात तक जागना नहीं चाहिए। समय पर सोना और समय पर उठना चाहिए। इसके अलावा जो लोग शारीरिक रूप से कमजोर हों या किसी बीमारी से जूझ रहे हों, वे अपनी क्षमता के अनुसार व्रत को कम कर सकते हैं।

भौम प्रदोष व्रत एक बहुत ही पवित्र और महत्वपूर्ण व्रत है। इसे सही तरीके से रखने से निश्चित ही भगवान शिव की कृपा मिलती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। इसलिए इस व्रत को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ रखें।