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Saturday, 03 October 2026
खेल

55 लाख सैलरी पर भी अकेलापन क्यों? दोस्ती की कमी

author
Komal
संवाददाता
📅 30 April 2026, 7:16 AM ⏱ 1 मिनट 👁 456 views
55 लाख सैलरी पर भी अकेलापन क्यों? दोस्ती की कमी
📷 aarpaarkhabar.com

स्कूल की जिंदगी हर किसी को अच्छी लगती है। न जॉब का टेंशन, न परिवार की जिम्मेदारियां, न ही भविष्य की चिंता। बस पढ़ाई, खेल, मजाक और दोस्तों का साथ। लेकिन बड़े होते ही हमें सिखाया जाता है कि सफलता ही सब कुछ है। अच्छी सैलरी, बड़ा घर, प्रेस्टिजियस जॉब - यही तो जिंदगी का मकसद है। और जब हम सब कुछ पा लेते हैं, तो एक अजीब सन्नाटा महसूस होता है। 55 लाख रुपये की सैलरी, आधुनिक घर, परिवार, सब कुछ है... पर दोस्त नहीं। और यही कमी हर दिन को नीरस बना देती है।

यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं है। आज का हर युवा इसी दौरान से गुजर रहा है। स्कूल में जो दोस्तियां बनी थीं, वह कॉलेज में कमजोर पड़ गईं। कॉलेज के दोस्त अलग-अलग शहरों में चले गए। नौकरी की शुरुआत में तो ऑफिस के लोगों के साथ समय बिताया, लेकिन वह रिश्ते भी सतही ही रहे। और जब घर आते हो, तो अकेलापन सब कुछ निगल जाता है।

आधुनिक जिंदगी ने दोस्ती को कहां खो दिया?

पिछले दो दशकों में दोस्ती की परिभाषा बदल गई है। सोशल मीडिया पर हजारों 'फ्रेंड्स' हैं, लेकिन दिल की बात कहने के लिए कोई नहीं। व्हाट्सएप पर मेसेज तो आते हैं, पर असली रिश्ते धीरे-धीरे ठंडे पड़ते जा रहे हैं। स्कूल और कॉलेज के दिनों में दोस्तों के साथ बैठना, हंसना, रोना - यह सब कुछ प्राकृतिक था। लेकिन जब आप अपने करियर में उतर जाते हो, तो हर कोई अपनी दौड़ में व्यस्त हो जाता है।

ऑफिस की जिंदगी तो और भी जटिल है। यहां सब कुछ प्रोफेशनल है। आप किसी को अपनी कमजोरियां नहीं बता सकते, अपने सपने साझा नहीं कर सकते। हर रिश्ता सजावटी रहता है। "कैसे हो?" का जवाब हमेशा "ठीक हूं" ही होता है। कोई नहीं जानना चाहता कि आप वास्तव में कितना अकेला महसूस कर रहे हो।

अपने घर लौटकर आप जो पाते हो, वह महज चार दीवारें हैं। परिवार है, लेकिन उनसे भी सब कुछ साझा नहीं कर सकते। माता-पिता को चिंता न हो जाए इसलिए अपनी समस्याएं छिपाते हो। पत्नी या पति है, लेकिन वह भी अपनी दुनिया में व्यस्त रहते हैं। बच्चे हैं, पर उनसे गहरी बातचीत संभव नहीं। तो फिर किससे बातें करोगे? किसके साथ वह पुरानी दोस्ताना में हंसोगे जो बिना किसी अपेक्षा के होती थी?

पैसा और सफलता ने क्या छीन लिया?

55 लाख सैलरी वाले व्यक्ति को शायद यह भी पता नहीं कि उसकी सबसे बड़ी खामी यह है कि दोस्ती अब एक विलासिता बन गई है जिसे वह खरीद नहीं सकता। स्कूल के दिनों में दोस्ती बिना किसी शर्त के होती थी। अब सब कुछ लेनदेन में बदल गया है। किसे समय नहीं है? सब अपने-अपने मकसदों में व्यस्त हैं।

करियर की सीढ़ियां चढ़ते समय आप अपने पीछे कई लोगों को छोड़ देते हो। जो समान सफल नहीं हुए, उनसे दोस्ती में थोड़ी शर्मिंदगी आती है। और जो सफल हुए, उनसे तो प्रतिस्पर्धा रहती है। ऐसे में असली दोस्ती की गुंजाइश ही नहीं रह जाती।

पैसा कई चीजें खरीद सकता है - घर, गाड़ी, कपड़े - लेकिन दोस्ती नहीं। दोस्ती को समय की जरूरत है, प्रयास की जरूरत है, समझ की जरूरत है। और आजकल किसी के पास न समय है, न ही किसी दूसरे के दर्द को समझने की ताकत।

अकेलापन से निकलने का रास्ता क्या है?

पहली बात यह है कि अपने पुराने दोस्तों से फिर से जुड़ने का प्रयास करें। सोशल मीडिया पर लाइक देना दोस्ती नहीं है। सच्ची दोस्ती के लिए समय देना होगा। महीने में कम से कम एक बार उन लोगों से मिलें जिनके साथ आप हंस सकते हो, रो सकते हो। अगर वह दूर हैं, तो कॉल करें, वीडियो चैट करें - लेकिन सच्ची बातचीत करें।

दूसरी बात, नई दोस्ती की कोशिश करें। अपने शहर में कोई हॉबी क्लब ज्वाइन करें, किसी एनजीओ में काम करें, किसी स्पोर्ट्स क्लब में जाएं। ऐसी जगहों पर आप ऐसे लोगों से मिलेंगे जिनके साथ आपके काम-काज से अलग कोई साझा रुचि है।

तीसरी बात, परिवार को समय दें। अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों से गहरी बातचीत करें। परिवार के साथ ही सच्ची दोस्ती संभव है।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात - अपने ऊपर काम करें। अकेलापन सिर्फ बाहर से नहीं आता, यह अंदर से भी आता है। खुद को समझें, अपनी कमजोरियों को स्वीकार करें, और मदद मांगने से न डरें।

55 लाख की सैलरी बहुत बड़ी बात है, लेकिन वह जिंदगी को खुशनुमा नहीं बना सकती अगर आपके पास कोई प्रेमपूर्ण रिश्ता नहीं है। याद रखें, सफलता का असली मतलब यह नहीं कि आप अकेले बड़े घर में बैठो। सफलता का असली मतलब है कि आपके पास साझा करने के लिए कोई हो, हंसने के लिए कोई हो, और दर्द में साथ देने वाला कोई हो।

स्कूल की दोस्तियां अक्सर बेशर्त होती हैं, बिना किसी उम्मीद के। वह खूबसूरती को समझें और उसे बचाने की कोशिश करें। और नई दोस्तियां बनाते समय भी उसी सच्चाई को ढूंढें। तभी आपकी 55 लाख की सैलरी वाली जिंदगी नीरस नहीं, रंगीन हो सकती है।