राजस्थान की भूतिया यूनिवर्सिटी करोड़ों खर्च
राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था एक बड़े घोटाले का सामना कर रही है जिसमें कथित रूप से 'भूतिया' विश्वविद्यालयों के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये बर्बाद हो रहे हैं। यह मामला सिर्फ एक संस्था का नहीं है, बल्कि पूरी शिक्षा प्रणाली की विफलता का प्रतीक है। धरातल पर जब इन विश्वविद्यालयों की हकीकत देखी जाती है तो पता चलता है कि न तो इनके पास कोई समुचित भवन है, न ही पर्याप्त संख्या में स्टाफ मौजूद है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन विश्वविद्यालयों में कोई छात्र नहीं हैं।
यह मामला जयपुर के शिक्षा संकुल से सामने आया है जहां आजतक के संवाददाताओं ने इन विश्वविद्यालयों की जमीनी हकीकत का पता लगाया। जब इन संस्थानों की भौतिक स्थिति की जांच की गई, तो यह पाया गया कि प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से धराशायी है। कागजों पर ये विश्वविद्यालय चल रहे हैं, लेकिन जमीन पर कोई वास्तविकता नहीं है।
राजस्थान के भूतिया विश्वविद्यालयों की असली कहानी
राजस्थान में कई विश्वविद्यालय ऐसे हैं जिनकी घोषणा तो की गई थी, लेकिन वे कभी सही तरीके से काम करना शुरू ही नहीं हुए। सरकारी दस्तावेजों में ये संस्थाएं पूरी तरह सक्रिय दिखाई देती हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि इनमें न तो कोई स्थायी भवन है, न ही शिक्षकों की उचित संख्या है। कुछ विश्वविद्यालयों के मामले में तो किराये के भवनों में भी काम नहीं हो रहा है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन विश्वविद्यालयों के नाम पर हर साल सरकारी बजट से बड़ी राशि आवंटित की जाती है। यह राशि प्रशासन के विभिन्न खर्चों के नाम पर खर्च की जाती है, लेकिन इसका कोई फायदा आम जनता को नहीं मिलता। जिन छात्रों को इन विश्वविद्यालयों में दाखिला लेना चाहिए था, वे न तो दाखिला ले पाते हैं और न ही कोई शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं।
जयपुर के शिक्षा संकुल में जब विस्तृत जांच की गई, तो पता चला कि कई विश्वविद्यालयों के अधिकारियों के पास न तो किसी संपत्ति के कागजात हैं, न ही किसी स्कूल या कॉलेज से संबद्धता का साक्ष्य। इन विश्वविद्यालयों का प्रबंधन पूरी तरह से काल्पनिक है। कुछ मामलों में तो यह भी पता चला कि विश्वविद्यालय के नाम पर नियुक्त अधिकारी ही अपने कार्यालय पर मौजूद नहीं होते।
सरकारी खजाने से करोड़ों का सालाना रिसाव
राजस्थान सरकार के बजट दस्तावेजों को देखें तो पता चलता है कि इन भूतिया विश्वविद्यालयों को हर साल करोड़ों रुपये आवंटित किए जाते हैं। ये पैसे प्रशासनिक खर्च, कर्मचारियों के वेतन, बिजली-पानी के बिल और अन्य विविध खर्चों के नाम पर खर्च किए जाते हैं। लेकिन जब इन खर्चों का विश्लेषण किया जाता है, तो कहीं भी कोई पारदर्शिता नहीं दिखाई देती।
लेखा परीक्षा के आंकड़ों में भी कई अनियमितताएं सामने आई हैं। कुछ विश्वविद्यालयों ने ऐसे खर्चों की रिपोर्ट दी है जो संभव ही नहीं हो सकते। उदाहरण के लिए, जहां कोई छात्र नहीं हैं, वहां परीक्षा संचालन का खर्च दर्ज किया जा रहा है। जहां कोई प्रयोगशाला नहीं है, वहां प्रयोगशाला के रखरखाव के लिए पैसे खर्च किए जा रहे हैं।
प्रश्न यह उठता है कि ये पैसे आखिर कहां जाते हैं? कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे कारोबार में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें हैं। उच्च स्तर के अधिकारी, विश्वविद्यालय के कर्मचारी और स्थानीय ठेकेदार मिलकर इस घोटाले को अंजाम दे रहे हैं। हर साल सरकारी खजाने से निकलने वाले करोड़ों रुपये इन्हीं लोगों की जेबों में चले जाते हैं।
प्रशासनिक अव्यवस्था और जवाबदेही की कमी
सबसे गंभीर समस्या यह है कि इन विश्वविद्यालयों में कोई भी जवाबदेही नहीं है। न तो शिक्षा विभाग के अफसर इनके बारे में कुछ पूछते हैं, न ही विश्वविद्यालय के प्रबंधन को कोई सवाल का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति राजस्थान के शिक्षा प्रणाली में एक बड़ी खामी को दर्शाती है।
जब संवाददाताओं ने इन विश्वविद्यालयों के कार्यालयों का दौरा किया, तो कई जगहों पर तो कार्यालय ही खाली पड़े थे। कुछ स्थानों पर केवल एक या दो कर्मचारी मिले जो भी अपनी असली पहचान नहीं बता सके। यह स्पष्ट संकेत है कि पूरी व्यवस्था ही नकली है।
शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों से जब इसके बारे में सवाल किए गए, तो वे बेहद संतुष्ट नजर आए। उन्होंने कहा कि उनके पास इन विश्वविद्यालयों के बारे में कोई समस्या की जानकारी नहीं है। यह प्रतिक्रिया ही दर्शाती है कि सरकारी तंत्र कितना अकर्मण्य है।
इस पूरे मामले का एकमात्र समाधान यह हो सकता है कि सरकार इन भूतिया विश्वविद्यालयों का तुरंत लेखा-जोखा करे, भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे, और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाए। छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए राजस्थान को अपनी शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह से सुधारना होगा।




