UPSC प्रीलिम्स 2024: छात्रों का विरोध और सवाल
यूपीएससी प्रीलिम्स पर मचा बवाल
भारत की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन परीक्षा माने जाने वाली यूपीएससी (संघ लोक सेवा आयोग) की सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा को लेकर देश भर में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। 24 मई 2024 को आयोजित इस परीक्षा में लगभग 5.5 लाख अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था। लेकिन परीक्षा समाप्त होते ही परीक्षा के स्वरूप, प्रश्नों की जटिलता और मूल्यांकन प्रणाली को लेकर भारी आक्रोश व्यक्त किया गया है।
छात्रों का कहना है कि इस बार की परीक्षा पिछली परीक्षाओं की तुलना में बेहद कठिन थी। केवल कठिन ही नहीं, बल्कि कई सवाल ऐसे भी थे जिन्हें समझना ही मुश्किल था। विशेषकर हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए यह परीक्षा काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुई क्योंकि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद के दौरान कई सवालों का अर्थ ही गड़बड़ा जाता था।
नीट परीक्षा में प्रश्न पत्र लीक होने की घटना और सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं में अनियमितताओं के कारण पहले ही देश भर में परीक्षा प्रणाली को लेकर भारी असंतोष व्याप्त है। ऐसे में यूपीएससी की परीक्षा को लेकर भी यह विरोध एक नई चिंता को दर्शाता है।
सीएसएटी पेपर की जटिलताएं
यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा दो पेपरों से मिलकर बनती है - सामान्य अध्ययन और सीएसएटी (सिविल सेवा अप्टीट्यूड टेस्ट)। इस बार सीएसएटी पेपर को लेकर काफी शिकायतें आई हैं। छात्रों का कहना है कि इस बार के सीएसएटी पेपर में तार्किक चिंतन, विश्लेषणात्मक क्षमता और गणितीय कौशल से संबंधित प्रश्न असाधारण रूप से कठिन थे।
इसके अलावा, कई छात्रों ने यह भी कहा है कि कुछ प्रश्नों का विकल्प अस्पष्ट था और एक से अधिक विकल्प सही लग रहे थे। यूपीएससी के आधिकारिक उत्तर कुंजी जारी होने के बाद भी कई छात्रों और शिक्षकों ने सवाल उठाए हैं कि प्रदान किए गए उत्तर वास्तविक रूप से सही हैं या नहीं।
एक प्रमुख शिक्षा विश्लेषक के अनुसार, सीएसएटी पेपर की कठिनाई का स्तर हर बार परिवर्तनशील होता है, लेकिन इस बार यह अत्यधिक बढ़ गया था। इससे लाखों अभ्यर्थियों के स्कोर में काफी हद तक गिरावट देखी गई है, जिससे उनके अगले चरण में चयनित होने की संभावना कम हो गई है।
हिंदी अनुवाद में खामियां
हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए सबसे बड़ी समस्या हिंदी अनुवाद में आई कमियां हैं। यूपीएससी प्रश्न पत्र मूलतः अंग्रेजी में तैयार किए जाते हैं और फिर उन्हें हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जाता है। इस प्रक्रिया में अक्सर मूल प्रश्न का अर्थ परिवर्तित हो जाता है।
इस बार भी कई प्रश्नों में हिंदी अनुवाद इस तरह किया गया था कि उनका अर्थ ही बदल गया। उदाहरण के लिए, कई सामान्य अध्ययन के प्रश्नों में स्थान, संदर्भ और तकनीकी शब्दावली का अनुवाद इस तरह किया गया था कि सवाल को समझना ही मुश्किल हो गया था। हिंदी माध्यम के छात्रों का कहना है कि वे न केवल परीक्षा देने वाले हैं, बल्कि अनुवाद को समझने के लिए भी अतिरिक्त समय खर्च कर रहे हैं।
यह समस्या केवल एकांतिक नहीं है। भारतीय भाषा माध्यम के हजारों छात्रों ने इस बारे में शिकायतें दर्ज की हैं। कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि यूपीएससी को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए अलग प्रश्न पत्र तैयार करने चाहिए, न कि अनुवाद के माध्यम से।
छात्रों की मांगें और सरकार की जिम्मेदारी
वर्तमान में हजारों छात्र विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। कुछ ने तो याचिका भी दायर की है कि परीक्षा को दोबारा आयोजित किया जाए। छात्रों की मुख्य मांगें हैं:
पहली, परीक्षा के मूल्यांकन में पारदर्शिता लाई जाए। दूसरी, हिंदी अनुवाद को सुधारा जाए या अलग प्रश्न पत्र तैयार किए जाएं। तीसरी, जटिल और अस्पष्ट सवालों को लेकर आयोग को और अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
यूपीएससी को भी इस मामले में गंभीर कदम उठाने चाहिए। भारत में सिविल सेवा परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं है, यह लाखों युवाओं का जीवन निर्धारित करती है। ऐसे में किसी भी तरह की असंगतি या कमी गंभीर परिणाम दे सकती है। आयोग को न केवल परीक्षा की गुणवत्ता बनाए रखनी चाहिए, बल्कि सभी माध्यमों के छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने चाहिए। नीट और सीबीएसई की परीक्षा प्रणाली में आई खामियों से सीखते हुए, यूपीएससी को अपनी प्रणाली में सुधार लाने चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े। अंततः, परीक्षा प्रणाली का उद्देश्य प्रतिभा को पहचानना है, न कि उसे भ्रमित करना।




