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Monday, 06 July 2026
राजनीति

क्षेत्रीय दलों की कमाई 51% घटी, सपा समेत 21 पार्टियों का खर्च आय से ज्यादा

author
Komal
संवाददाता
📅 29 May 2026, 6:30 AM ⏱ 1 मिनट 👁 572 views
क्षेत्रीय दलों की कमाई 51% घटी, सपा समेत 21 पार्टियों का खर्च आय से ज्यादा
📷 aarpaarkhabar.com

नई दिल्ली - देश की राजनीति में एक बड़ा खुलासा सामने आया है। असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2024-25 में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की आय में 51 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है। लेकिन इसके बावजूद समाजवादी पार्टी सहित 21 पार्टियों ने अपनी कुल आय से कहीं ज्यादा राशि खर्च की है। यह स्थिति राजनीतिक दलों की आर्थिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस वित्तीय वर्ष में कई प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों की आय में भारी कमी दर्ज की गई है। इन दलों के लिए स्वैच्छिक चंदा आय का प्रमुख स्रोत रहा है। हालांकि, कुछ पार्टियों ने अपनी बचत से इस कमी को पूरा करने की कोशिश की है, लेकिन अधिकांश पार्टियों का खर्च उनकी आय से कहीं अधिक रहा है। यह परिस्थिति राजनीतिक दलों की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर सवाल उठाती है।

आय में भारी गिरावट और खर्च में बेतहाशा वृद्धि

एडीआर की रिपोर्ट से स्पष्ट हो जाता है कि क्षेत्रीय दलों की आर्थिक स्थिति काफी गंभीर है। वित्त वर्ष 2024-25 में जहां आय में 51 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, वहीं दूसरी ओर खर्च में वृद्धि देखी गई है। समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी जैसी प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियां भी इस सूची में शामिल हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल 21 पार्टियों ने अपनी कुल आय से अधिक राशि व्यय की है। इसका मतलब यह है कि ये पार्टियां या तो अपनी पिछली बचत का उपयोग कर रही हैं या फिर अन्य अनियमित तरीकों से धन प्राप्त कर रही हैं। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, राजनीतिक दलों को अपनी आय और व्यय का विस्तृत ब्यौरा देना अनिवार्य है।

यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक इसलिए है क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब कोई पार्टी अपनी आय से अधिक खर्च करती है, तो सवाल उठता है कि यह अतिरिक्त राशि कहां से आ रही है। क्या यह किसी बड़े दाता या गैर-कानूनी स्रोत से आ रही है। ये प्रश्न लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

स्वैच्छिक चंदे का महत्व और पारदर्शिता की कमी

एडीआर की रिपोर्ट में यह बात भी उजागर हुई है कि स्वैच्छिक चंदा राजनीतिक दलों की आय का मुख्य स्रोत है। लेकिन यहां भी पारदर्शिता की कमी दिखाई दे रही है। कई दल अपने दाताओं के नाम और देय राशियों को सार्वजनिक नहीं करते हैं, विशेषकर जब राशि पांच लाख रुपये से कम हो।

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ राजनीतिक दलों ने तो पर्याप्त बचत भी दर्ज की है, जिसका मतलब है कि उनके पास पिछले वर्षों से जमा धन है। लेकिन अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियों की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल है। इसके कारण ये पार्टियां चुनावी प्रचार और अन्य राजनीतिक गतिविधियों के लिए अतिरिक्त धन के लिए अन्य स्रोतों पर निर्भर हो जाती हैं।

यह पारदर्शिता की कमी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के रास्ते खोल देती है। जब राजनीतिक दलों का वित्त पूरी तरह पारदर्शी नहीं होता, तो बड़े पूंजीपतियों या अन्य शक्तिशाली लोगों का प्रभाव बढ़ जाता है। इससे जनहित की नीतियां पीछे छूट जाती हैं और विशेष हितों की नीतियां आगे आती हैं।

चुनाव आयोग और पारदर्शिता की जिम्मेदारी

एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि कई प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों ने निर्धारित समय सीमा के बाद भी अपनी ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की। यह चिंता का विषय है क्योंकि चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार राजनीतिक दलों को हर वित्तीय वर्ष के लिए ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत करनी अनिवार्य है।

यह पारदर्शिता की कमी सिर्फ क्षेत्रीय दलों तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय दलों में भी इसी तरह की प्रवृत्तियां देखी जाती हैं। लेकिन चूंकि क्षेत्रीय दल अपेक्षाकृत छोटे हैं, इनकी आर्थिक स्थिति अधिक कमजोर है। इसलिए ये पार्टियां अधिक दबाव में आती हैं।

चुनाव आयोग को अपनी निगरानी कड़ी करनी चाहिए। जो पार्टियां समय पर रिपोर्ट नहीं देती हैं, उन पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, राजनीतिक दलों के लिए पारदर्शिता के नियमों को और सख्त बनाने की आवश्यकता है। पांच लाख रुपये से कम के चंदे को भी सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि बड़े दाताओं को छोटे दानों के जरिये भेद-भाव वाली नीति को वरीयता न दे सकें।

इस स्थिति से निपटने के लिए एक व्यापक सुधार की जरूरत है। राजनीतिक दलों को सार्वजनिक स्वभाव की संस्थाओं के रूप में माना जाता है, इसलिए उनकी आर्थिक स्वच्छता अत्यंत महत्वपूर्ण है। अगर हम लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाना चाहते हैं, तो राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता को अनिवार्य बनाना होगा।

एडीआर की यह रिपोर्ट एक चेतावनी संकेत है कि हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों की नींव में दरारें आ रही हैं। अगर समय रहते इसे ठीक नहीं किया गया, तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसलिए, सभी राजनीतिक दलों को, चाहे वे क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय, अपनी वित्तीय व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। साथ ही, चुनाव आयोग को भी अपनी भूमिका को और प्रभावी ढंग से निभाना चाहिए।