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Thursday, 30 July 2026
समाचार

यूएनएससी सुधार पर भारत की चेतावनी अस्थायी सीट विस्तार

author
Komal
संवाददाता
📅 16 June 2026, 5:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 632 views
यूएनएससी सुधार पर भारत की चेतावनी अस्थायी सीट विस्तार
📷 aarpaarkhabar.com

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है जिसमें उन्होंने यूएनएससी (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) के सुधारों पर अपना सख्त रुख जाहिर किया है। भारत ने साफ कहा है कि महज अस्थायी सीटों की संख्या में वृद्धि से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पूरी तस्वीर नहीं बदलेगी। भारत का मानना है कि सच्चे अर्थों में सुधार के लिए परिषद की संरचना में गहरे बदलाव की जरूरत है।

वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा हो रही है। विभिन्न देश अपनी स्थायी सदस्यता के लिए दावेदारी पेश कर रहे हैं, जबकि कुछ राष्ट्र अस्थायी सीटों में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। लेकिन भारत का स्पष्ट मत है कि केवल संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा।

भारत का स्पष्ट रुख और निर्धारित शर्तें

भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने अंतर सरकारी वार्ताओं में यह बात रखी है कि यूएनएससी के सुधार को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। महज अस्थायी सीटों को बढ़ाने से सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली में जो खामियां हैं, वे दूर नहीं होंगी। भारत का तर्क है कि स्थायी सदस्यों की संख्या और परिषद के निर्णय लेने की प्रक्रिया दोनों में ही सुधार की आवश्यकता है।

भारत ने यह भी कहा है कि किसी भी नई वार्ता प्रक्रिया को स्पष्ट और लिखित मसौदे के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। यह मसौदा सभी पक्षों को स्वीकार हो और उस पर सर्वसम्मति बने। साथ ही, इस प्रक्रिया के लिए एक निर्धारित समयसीमा भी होनी चाहिए ताकि वार्ताएं अनिश्चितकाल तक न चलती रहें। भारत का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से ही सार्थक सुधार संभव हो पाएंगे।

पिछले कई दशकों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना अपरिवर्तित रही है। यह परिषद द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों के अनुसार बनाई गई थी, जब विश्व की शक्तियों का संतुलन अलग था। वर्तमान युग में विश्व राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है, लेकिन सुरक्षा परिषद की संरचना में इसका प्रतिबिंब नहीं दिखता। यही कारण है कि विकासशील देश विशेषकर भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य देश इस संस्था को अधिक प्रतिनिधित्वकारी बनाने की मांग कर रहे हैं।

स्थायी सदस्यता की मांग और वैश्विक न्यायसंगतता

भारत विश्व की सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से एक है और एक प्रमुख आर्थिक शक्ति भी बन गया है। देश की बढ़ती भूमिका और जिम्मेदारियों को देखते हुए भारत यूएनएससी में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है। भारत का तर्क पूरी तरह न्यायसंगत है क्योंकि वह अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के मामलों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

भारत की स्थायी सदस्यता की मांग का समर्थन कई देशों ने किया है। इसके बावजूद, पांच स्थायी सदस्य देशों की सहमति मिलना अभी भी दूर की कौड़ी दिख रहा है। भारत इसी लिए अभी फोकस उन सुधारों पर दे रहा है जो तुरंत किए जा सकते हैं, परंतु साथ ही स्पष्ट करता है कि अधूरे सुधार से काम नहीं चलेगा।

भारत की चेतावनी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह यह संदेश दे रहा है कि यदि केवल सतही सुधार किए गए तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की वैधता और प्रभावशीलता प्रश्नचिह्न के घेरे में आ जाएगी। विकासशील देश यह मानते हैं कि वर्तमान व्यवस्था विकसित देशों को अनुचित लाभ दे रही है। इसलिए न्यायसंगत सुधार के बिना परिषद की स्वीकार्यता कम होती जाएगी।

आगे की चुनौतियां और समाधान

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों में आने वाली समय में कई चुनौतियां हो सकती हैं। विभिन्न देशों के विरोधाभासी हित और राजनीतिक मतभेद इस प्रक्रिया को जटिल बना सकते हैं। पांच स्थायी सदस्य अपनी शक्तियां बनाए रखना चाहते हैं, जबकि विकासशील देश अधिक प्रतिनिधित्व चाहते हैं।

इन परिस्थितियों में भारत जैसे देश की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है जो एक संतुलित और न्यायसंगत समाधान के लिए काम कर रहे हैं। भारत का संदेश साफ है कि सुधार होने चाहिए, लेकिन वह सार्थक, व्यापक और सर्वसम्मत होने चाहिए। अस्थायी सीटों की संख्या बढ़ाना तो एक कदम हो सकता है, लेकिन यह एकमात्र कदम नहीं हो सकता।

भारत अपनी बातचीत में जोर दे रहा है कि नई वार्ता प्रक्रिया के लिए स्पष्ट लिखित दस्तावेज, समय सीमा और सभी पक्षों की व्यापक सहमति जरूरी है। यह दृष्टिकोण न केवल भारत के हितों की रक्षा करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हितों को भी ध्यान में रखता है।

भारत की यह चेतावनी आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है। यदि विश्व समुदाय इस बात को समझ जाए कि महज सतही बदलाव से संकट का समाधान नहीं हो सकता, तो शायद अधिक गंभीरता से सार्थक सुधारों की ओर बढ़ा जा सकता है। अभी तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि भारत की आवाज अंतरराष्ट्रीय पटल पर गूंज रही है और वह विश्व को यह सलाह दे रहा है कि आधी अधूरी कोशिशों से कोई हल नहीं निकलेगा।