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Wednesday, 29 July 2026
राजनीति

टीएमसी बागियों की एनसीपीआई रणनीति और भाजपा से बचाव

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Komal
संवाददाता
📅 16 June 2026, 6:00 AM ⏱ 1 मिनट 👁 741 views
टीएमसी बागियों की एनसीपीआई रणनीति और भाजपा से बचाव
📷 aarpaarkhabar.com

टीएमसी यानी ट्राइनामूल कांग्रेस के लगभग 20 सांसदों का विद्रोह अभी हाल ही में सामने आया है। ये बागी सांसद सीधे भारतीय जनता पार्टी में शामिल न होकर एनसीपीआई (नेशनल कांग्रेस पार्टी आइंडिया) के मार्फत विलय का रास्ता चुन रहे हैं। यह राजनीतिक चाल अपने आप में बेहद दिलचस्प है और इसके पीछे की रणनीति को समझना जरूरी है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर ये सांसद भाजपा के नेताओं से मिलते-जुलते हुए भी सीधा विलय क्यों नहीं कर रहे हैं।

टीएमसी से बागी सांसदों की चाल क्या है?

टीएमसी के ये विद्रोही सांसद दो-तिहाई से अधिक सांसदों को लेकर एनसीपीआई में विलय करने की घोषणा की है। उनका दावा है कि वे पार्टी के असली प्रतिनिधि हैं और ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी गलत रास्ते पर चल रही है। विद्रोही गुट के सांसदों का मानना है कि एनसीपीआई के जरिए यह कदम उठाने से उन्हें कुछ कानूनी सुरक्षा मिलेगी। साथ ही, वे टीएमसी के चुनाव चिह्न और पार्टी के नाम पर दावा करने की स्थिति में भी रह सकेंगे।

यह रणनीति भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची से जुड़ी है, जिसे आमतौर पर दल-बदल कानून कहा जाता है। इसी के तहत अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सदस्य किसी दूसरी पार्टी में शामिल होने का फैसला करते हैं, तो उन्हें दल-बदल कानून का दंड नहीं दिया जाता। यही कारण है कि ये सांसद एनसीपीआई के रूप में एक तीसरी पार्टी का सहारा ले रहे हैं।

कानूनी सुरक्षा और संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में यह प्रावधान है कि अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सदस्य किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो इसे पार्टी का विभाजन माना जाता है। ऐसी स्थिति में दल-बदल कानून के तहत कोई कार्रवाई नहीं की जाती। यही कारण है कि टीएमसी के विद्रोही सांसद इसी प्रावधान का लाभ उठाना चाहते हैं।

विद्रोही गुट का तर्क है कि अगर वे सीधे भाजपा में शामिल हो जाते हैं, तो ममता बनर्जी की पार्टी उन पर दल-बदल कानून लागू करके उन्हें संसद से निष्कासित करवा सकती है। लेकिन अगर वे एनसीपीआई के माध्यम से जाते हैं और दो-तिहाई सदस्य एक साथ जाते हैं, तो वह स्थिति अलग हो जाती है। इसमें पार्टी विभाजन की श्रेणी में आता है, और ऐसे में दल-बदल कानून की कोई पकड़ नहीं रहती।

भाजपा से सीधा विलय क्यों नहीं?

सवाल उठता है कि अगर ये सांसद भाजपा का समर्थन करना चाहते हैं, तो फिर सीधे भाजपा में क्यों नहीं जा रहे? इसके पीछे की मुख्य वजह कानूनी सुरक्षा ही है। अगर वे सीधे भाजपा में शामिल हो जाते हैं, तो टीएमसी नेतृत्व उन पर दल-बदल कानून लागू कर सकता है। ऐसे में वे अपनी संसदीय सीट खो सकते हैं।

हालांकि, विद्रोही सांसदों के दावे कि दो-तिहाई से अधिक सदस्य उनके साथ हैं, इस पर ममता बनर्जी की पार्टी जोरदार सवाल उठा रही है। टीएमसी नेतृत्व का कहना है कि ये दावे झूठे हैं और वास्तविकता में बस 20-25 सांसद ही इस विद्रोह में शामिल हैं। अगर यह साबित हो जाता है, तो विद्रोही सांसदों को दल-बदल कानून की मार झेलनी पड़ सकती है।

एनसीपीआई की भूमिका और राजनीतिक खेल

एनसीपीआई शरद पवार के नेतृत्व में एक अलग राजनीतिक दल है, जो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक हिस्से से अलग हुई थी। एनसीपीआई को एक तीसरी पार्टी के रूप में लाना टीएमसी के विद्रोहियों की एक चतुर राजनीतिक चाल है। इसके जरिए वे अपने को कानूनी सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं और साथ ही भाजपा का समर्थन भी जारी रख सकते हैं।

अंतिम विश्लेषण में, यह पूरा मामला भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों को परीक्षा में डाल रहा है। अगर कोर्ट विद्रोही सांसदों को दो-तिहाई का सदस्य माने, तो उनके लिए कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी। लेकिन अगर कोर्ट ममता बनर्जी की पार्टी के दावे को स्वीकार करता है, तो ये सांसद अपनी सीट खोने के लिए तैयार रह सकते हैं। यह मामला आने वाले दिनों में काफी महत्वपूर्ण साबित होगा।