रेफर किए गए कैंडिडेट फेल, अब कंपनी ने कर्मचारी को दोबारा टेस्ट देने को कहा
आजकल सोशल मीडिया पर एक ऐसी घटना वायरल हो गई है जो कई कर्मचारियों को चिंतित कर देगी। एक टेक्नीशियन का दावा है कि उसकी कंपनी की मानव संसाधन टीम उसे दोबारा इंटरव्यू देने के लिए कह रही है। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि जिस दोस्त को उसने कंपनी में रेफर किया था, वह उम्मीदवार साक्षात्कार में विफल हो गया। खास बात यह है कि रेफरल कैंडिडेट एक बेहद साधारण कोडिंग सवाल तक हल नहीं कर सका।
यह पूरा मामला तब सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया जब इस कर्मचारी ने वायरल ईमेल को अपने अकाउंट पर शेयर किया। इस ईमेल में भर्ती टीम ने स्पष्ट रूप से उस कर्मचारी की निर्णय लेने की क्षमता और उसके तकनीकी मूल्यांकन पर सवाल उठाए हैं। कंपनी की यह कार्रवाई न केवल अनोखी है, बल्कि यह कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है कि क्या कर्मचारियों को अपने रेफरल के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
रेफरल सिस्टम पर उठे सवाल
कंपनियों में रेफरल सिस्टम को आमतौर पर एक सकारात्मक कदम माना जाता है। यह माना जाता है कि कर्मचारियों को अच्छे उम्मीदवारों को रेफर करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हालांकि, इस घटना के बाद यह प्रश्न उठता है कि क्या कंपनियों को रेफर किए गए कैंडिडेट की असफलता के लिए कर्मचारी को दंडित करना चाहिए।
रेफरल कार्यक्रम का मूल उद्देश्य योग्य उम्मीदवारों को खोजना है। लेकिन यह सच है कि कोई भी कर्मचारी किसी दूसरे व्यक्ति की साक्षात्कार में क्या प्रदर्शन करेगा, इसकी गारंटी नहीं दे सकता। साक्षात्कार की प्रक्रिया काफी जटिल होती है और कई कारक उसे प्रभावित कर सकते हैं।
इस मामले में कर्मचारी ने शायद अपने दोस्त को तकनीकी रूप से योग्य समझकर रेफर किया होगा। लेकिन साक्षात्कार के दिन घबराहट, दबाव या अन्य कारणों से वह सामान्य प्रश्नों का उत्तर देने में विफल हो सकता है। ऐसे में कर्मचारी को दोष देना उचित नहीं है।
कंपनी की कड़ी नीति के परिणाम
इस घटना से यह स्पष्ट हो गया है कि कंपनी की नीति काफी कड़ी है। भर्ती टीम का यह निर्णय न केवल अनुचित है, बल्कि यह कर्मचारी मनोबल को भी नुकसान पहुंचाता है। जब कर्मचारी को पता चल जाता है कि उसके रेफरल की असफलता के लिए उसे दोबारा साक्षात्कार देना पड़ सकता है, तो वे भविष्य में किसी को रेफर करने से बचेंगे।
यह निर्णय कंपनी के रेफरल कार्यक्रम को ही नुकसान पहुंचाएगा। कर्मचारी जो अन्यथा अच्छे उम्मीदवारों को रेफर कर सकते थे, वे अब ऐसा करने से डरेंगे। इससे कंपनी को ही योग्य उम्मीदवारों के एक अच्छे स्रोत से हाथ धोना पड़ सकता है।
इसके अलावा, इस कार्रवाई से कंपनी की प्रतिष्ठा को भी नुकसान हो सकता है। सोशल मीडिया पर इस घटना के वायरल होने से संभव है कि अन्य संभावित कर्मचारी और उम्मीदवार भी कंपनी के बारे में नकारात्मक राय बनाएं।
बेहतर दृष्टिकोण क्या होना चाहिए
इस पूरे मामले में कंपनी को एक अलग दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था। सबसे पहले, भर्ती प्रक्रिया कंपनी की जिम्मेदारी है, न कि कर्मचारी की। यदि कोई कैंडिडेट असफल होता है, तो इसका अर्थ यह है कि साक्षात्कार प्रक्रिया में किसी न किसी स्तर पर गलती हुई है।
दूसरा, कंपनी को कर्मचारी और रेफर किए गए कैंडिडेट दोनों के साथ बेहतर संचार बनाए रखना चाहिए। यदि कैंडिडेट विफल हुआ है, तो उसे यह बताया जाना चाहिए कि उसने किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है।
तीसरा, कंपनी को कर्मचारियों के लिए एक स्पष्ट और न्यायसंगत रेफरल नीति बनानी चाहिए। यह नीति यह निर्दिष्ट करे कि रेफरल के लिए कर्मचारी की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। उनकी भूमिका केवल संभावित उम्मीदवारों को सुझाव देना है, न कि उनकी क्षमता की गारंटी देना।
इस घटना से सीखते हुए, अन्य कंपनियों को भी अपनी रेफरल नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। कर्मचारी-मित्रपूर्ण नीतियां न केवल कर्मचारी संतुष्टि बढ़ाती हैं, बल्कि कंपनी की उत्पादकता और दक्षता में भी वृद्धि करती हैं।




