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Saturday, 04 July 2026
विश्व

कोरोना का असली मास्टरमाइंड US साइंटिस्ट

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Komal
संवाददाता
📅 20 June 2026, 6:01 AM ⏱ 1 मिनट 👁 561 views
कोरोना का असली मास्टरमाइंड US साइंटिस्ट
📷 aarpaarkhabar.com

अमेरिका की खुफिया विभाग की प्रमुख तुलसी गबार्ड ने एक विस्फोटक खुलासा किया है जिसने पूरी दुनिया को हिला दिया है। नए जारी किए गए गोपनीय दस्तावेजों में यह बात सामने आई है कि विश्व प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक डॉक्टर एंथनी फाउची ने चीन की वुहान लैबोरेटरी को कोरोना वायरस पर खतरनाक शोध के लिए करोड़ों का फंड दिया था। यह खुलासा कोविड-19 महामारी की उत्पत्ति को लेकर चल रहे विवाद में एक बड़ा मोड़ साबित हो रहा है।

गबार्ड द्वारा जारी किए गए दस्तावेजों के अनुसार, डॉक्टर फाउची ने अपनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था के माध्यम से अरबों रुपये की राशि वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को भेजी थी। इन फंड्स का इस्तेमाल खतरनाक बायोलॉजिकल रिसर्च के लिए किया गया। जब यह वायरस लैबोरेटरी से लीक हुआ और पूरी दुनिया में महामारी के रूप में फैल गया, तब फाउची ने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर इस पूरे सच को छुपा दिया।

यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब कोविड-19 महामारी ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया था। लाखों लोगों की जान चली गई थी और करोड़ों लोगों के जीवन में भारी बदलाव आया था। इस पूरी त्रासदी के पीछे यदि सच में अमेरिकी फंडिंग और राजनीतिक षड्यंत्र है, तो यह मानवता के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध कहा जा सकता है।

वुहान लैब में किस तरह की रिसर्च हो रही थी

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी चीन की सबसे उन्नत जैविक अनुसंधान संस्थाओं में से एक है। इस लैबोरेटरी में विषाणु संबंधी उन्नत शोध किया जाता है। गबार्ड के दस्तावेजों के अनुसार, अमेरिकी फंडिंग का उपयोग करके यहां कोरोना वायरस के जीनोम पर खतरनाक प्रयोग किए जा रहे थे। इन प्रयोगों का उद्देश्य वायरस को और भी अधिक संक्रामक और घातक बनाना था।

यह पद्धति वैज्ञानिक समुदाय में "गेन ऑफ फंक्शन" रिसर्च के नाम से जानी जाती है। इस तरह की रिसर्च में कृत्रिम रूप से वायरस को इस तरह संशोधित किया जाता है कि वह अधिक संक्रामक हो जाए। यह बेहद खतरनाक और अनैतिक माना जाता है। अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में इस तरह की रिसर्च पर प्रतिबंध लगाने के लिए कहा गया है।

डॉक्टर फाउची ने हमेशा यह दावा किया था कि अमेरिका ने वुहान लैब में किसी तरह की जैविक हथियार बनाने में सहायता नहीं दी। लेकिन नए दस्तावेज इस दावे को झूठ साबित करते हैं। ये दस्तावेज स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि फाउची के नेतृत्व में अमेरिकी संस्थाएं वुहान लैब को आर्थिक मदद प्रदान कर रही थीं।

सच को छुपाने में खुफिया एजेंसियों की भूमिका

गबार्ड द्वारा उजागर किए गए सबसे गंभीर आरोप यह हैं कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने जानबूझकर कोविड-19 की वास्तविक उत्पत्ति को छुपाया। जब यह बात सार्वजनिक हुई कि वायरस वुहान लैब से लीक हो सकता है, तब एफबीआई, सीआईए जैसी एजेंसियों ने इसकी जांच को रोक दिया। मीडिया को भी इस विषय पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

इसके बजाय, ये एजेंसियां अलग-अलग सिद्धांत फैलाने लगीं। कहा जाने लगा कि वायरस प्राकृतिक रूप से चमगादड़ों से आया है। सोशल मीडिया पर इसके विपरीत किसी भी सिद्धांत को डिसइनफॉर्मेशन बताकर हटा दिया जाता था। डॉक्टर फाउची के विरुद्ध जांच की मांग करने वाले वैज्ञानिकों को अपने पदों से हटा दिया गया।

गबार्ड का कहना है कि यह सब एक सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था। अमेरिकी सरकार, फाउची और खुफिया एजेंसियां सब मिलकर इस बात को छुपाना चाहते थे कि अमेरिकी फंडिंग से बनाया गया वायरस ही वास्तव में कोविड-19 का कारण है। इससे न केवल अमेरिकी सरकार की छवि खराब होती, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत एक गंभीर अपराध माना जा सकता है।

इन दस्तावेजों के परिणाम और भविष्य की संभावनाएं

तुलसी गबार्ड के द्वारा जारी किए गए ये दस्तावेज विश्वव्यापी स्तर पर बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनके आने के बाद अब दुनिया के विभिन्न देशों की सरकारें और अंतर्राष्ट्रीय संगठन अमेरिका पर दबाव बना रहे हैं। भारत सहित कई देशों ने अब डॉक्टर फाउची के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

इन दस्तावेजों के आने के बाद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या डॉक्टर फाउची और अन्य अमेरिकी अधिकारियों को मानवता के खिलाफ अपराध के लिए अंतर्राष्ट्रीय अदालत में पेश किया जा सकता है। लाखों मौतों के लिए जिम्मेदार इन लोगों को न्याय के कटघरे में आना चाहिए।

अभी तक अमेरिकी सरकार और डॉक्टर फाउची इन आरोपों को अस्वीकार कर रहे हैं। लेकिन गबार्ड के हाथ में ठोस दस्तावेज हैं जो उनके झूठ को उजागर करते हैं। आने वाले दिनों में इस पूरे प्रकरण का विस्तार और गहराई से जांच की आवश्यकता है। सच्चाई को पूरी तरह सामने लाना होगा और जिम्मेदार लोगों को दंड दिलाना होगा। केवल इसी तरह से दुनिया को विश्वास हो सकता है कि न्याय प्रणाली ईमानदार है और शक्तिशाली लोग भी कानून से परे नहीं हैं।