भरत तिवारी एनकाउंटर पर BJP मंत्रियों के सवाल
भरत तिवारी के एनकाउंटर को लेकर बिहार की राजनीति में तूफान आ गया है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के चार मंत्रियों ने सरकार की नीति पर सीधे सवाल उठाए हैं। ये सवाल इसलिए अहम हैं क्योंकि ये पार्टी और सरकार के भीतर से ही आ रहे हैं। विजय कुमार सिन्हा, मिथिलेश तिवारी, ऋतुराज सिन्हा और आनंद मिश्रा जैसे दिग्गज नेताओं के बयान सम्राट सरकार को बेहद शर्मनाक स्थिति में डाल दिए हैं।
पुलिस ने शुरुआत में एनकाउंटर का खुलकर बचाव किया था। लेकिन जैसे-जैसे मामले की गहराई सामने आने लगी, सवाल उठने लगे। पहले तो आम जनता और विपक्षी पार्टियों ने सवाल उठाए, लेकिन अब सरकार के अपने मंत्रीगण ही सवालों का जवाब मांग रहे हैं। यह स्थिति किसी भी सरकार के लिए बेहद शर्मनाक और नाजुक होती है।
भरत तिवारी एनकाउंटर की पृष्ठभूमि
भरत तिवारी का नाम बिहार के अपराध जगत में काफी चर्चित था। उस पर हत्या और अन्य अपराधों के कई मामले दर्ज थे। पुलिस का कहना था कि वह काफी खतरनाक अपराधी था और अपराधियों के एक गिरोह का प्रमुख था। लेकिन उसके एनकाउंटर को लेकर कई सवाल उठने लगे। क्या एनकाउंटर सही तरीके से किया गया? क्या पुलिस को उसे गिरफ्तार करके कानूनी कार्यवाही नहीं करनी चाहिए थी? ये सवाल उठते हैं तो सरकार को जवाब देना पड़ता है।
एनकाउंटर के तुरंत बाद पुलिस ने कहा कि वह आत्मरक्षा में किया गया। लेकिन इस बयान को लेकर भी सवाल उठने लगे। कई मानवाधिकार संगठन और कानूनविद् इसे असंवैधानिक बताने लगे। उन्होंने कहा कि एनकाउंटर पुलिस द्वारा की गई हत्या है। भले ही भरत तिवारी अपराधी रहा हो, लेकिन उसे कानूनी तरीके से पेश किया जाना चाहिए था।
BJP मंत्रियों के सवाल और आलोचना
विजय कुमार सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेता ने पुलिस की कार्रवाई पर सीधे सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि एनकाउंटर को लेकर पूरी जांच होनी चाहिए। मिथिलेश तिवारी ने भी इसी तरह की बातें कहीं। ऋतुराज सिन्हा ने सरकार से पारदर्शिता की मांग की है। आनंद मिश्रा ने भी माना है कि इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए।
ये बयान सिर्फ आलोचना नहीं हैं। ये संकेत हैं कि सरकार के भीतर ही असहमति बढ़ रही है। जब सत्ताधारी पार्टी के मंत्री ही सरकार की नीति पर सवाल उठाएं तो यह माना जा सकता है कि सरकार की नीति में कुछ गड़बड़ है। इससे सरकार की विश्वसनीयता को भी चोट लगती है।
विपक्षी पार्टियां तो पहले से ही सरकार को घेर रही थीं। लेकिन अब जब अपनों ही ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है तो सरकार की स्थिति और भी कमजोर हो गई है। इसका मतलब है कि एनकाउंटर को लेकर कोई न कोई गंभीर सवाल है जो सभी को परेशान कर रहा है।
सम्राट सरकार की मुश्किलें और संभावित परिणाम
सम्राट सरकार अभी से ही कई विवादों में घिरी हुई है। बिहार की राजनीति में अस्थिरता रहती है और ऐसे में कोई भी विवाद बहुत बड़ा आकार ले सकता है। भरत तिवारी एनकाउंटर इसी तरह का एक मुद्दा बन गया है।
जब सरकार के अपने मंत्री ही सवाल उठाएं तो सरकार को नीचे झुकना पड़ता है। सरकार को अब एक स्वतंत्र जांच कमेटी बनानी चाहिए। इस कमेटी में निष्पक्ष और वरिष्ठ लोग होने चाहिए। जांच में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए। अगर एनकाउंटर सही था तो जांच इसे साबित कर देगी। अगर गलत था तो जिम्मेदार को दंडित किया जाएगा।
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का शासन सर्वोच्च होता है। कोई भी सरकार अपने को कानून से ऊपर नहीं मान सकती। भले ही भरत तिवारी अपराधी था, लेकिन उसे कानूनी प्रक्रिया से ही दंडित किया जाना चाहिए था।
सरकार को अब तुरंत कदम उठाने चाहिए। देरी करने से परिस्थिति और बिगड़ सकती है। मीडिया और जनता दोनों ही सरकार की नजरों में हैं। अगर सरकार पारदर्शी नहीं दिखेगी तो उसकी छवि और भी खराब हो सकती है।
भरत तिवारी एनकाउंटर का मामला सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं है। यह मानवाधिकार, कानून का शासन और सरकार की विश्वसनीयता का मामला है। जब तक सरकार इसे गंभीरता से नहीं लेगी तब तक सवाल उठते रहेंगे। और जब सवाल उठते हैं तो सरकार की नीति और निर्णयों पर लोगों का विश्वास कम हो जाता है।




