नौ राज्यों में जल भंडार खतरे में, पंजाब-राजस्थान सबसे गंभीर
देश भर में जल संकट की स्थिति बेहद गंभीर हो गई है। पंजाब और राजस्थान समेत नौ राज्यों में भूजल भंडार तेजी से खाली हो रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी जल दबाव लगातार बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। यह संकट केवल गर्मियों का मुद्दा नहीं है, बल्कि साल भर जल की उपलब्धता को लेकर गंभीर चेतावनी है।
भारत के भूजल संसाधन विभाग की ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। देश के विभिन्न हिस्सों में भूजल स्तर अलग-अलग गति से गिर रहा है। पश्चिमी राज्यों में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है, लेकिन अब समस्या उत्तर भारत तक भी फैल गई है।
पंजाब और राजस्थान में गंभीर संकट
पंजाब में भूजल दोहन की दर देश में सबसे ऊंची है। कृषि के अत्यधिक विकास के कारण भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। राजस्थान में भी यही समस्या दिखाई दे रही है। इन दोनों राज्यों में भूजल भंडार 40 प्रतिशत से अधिक हार गए हैं।
पंजाब में धान की खेती के लिए जिस तरह से भूजल का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह भविष्य के लिए खतरनाक है। कृषकों को सस्ती बिजली के कारण वे पानी की कोई परवाह नहीं करते। नलकूपों की संख्या हर साल बढ़ रही है और जल स्तर कम हो रहा है।
राजस्थान में पानी की कमी तो वैसे भी रहती है, लेकिन अब उपलब्ध जल भंडार भी तेजी से समाप्त हो रहे हैं। रेगिस्तानी क्षेत्रों में जल संरक्षण के प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं। वर्षा जल संचयन की योजनाएं सही तरीके से लागू नहीं हुई हैं।
दिल्ली और यूपी में बढ़ता दबाव
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जल संकट के संकेत स्पष्ट हो गए हैं। 34 मूल्यांकन इकाइयों में से 29.41 प्रतिशत क्षेत्रों में अत्यधिक दोहन की स्थिति है। 32.35 प्रतिशत इलाकों में भूजल की स्थिति गंभीर मानी जा रही है। महज 20.59 प्रतिशत क्षेत्र ही सुरक्षित हैं।
दिल्ली की आबादी हर साल बढ़ रही है। शहरीकरण के कारण जल की मांग लगातार बढ़ी है। भूजल दोहन का दबाव भी साल दर साल बढ़ता जा रहा है। सरकारी जलापूर्ति व्यवस्था अपर्याप्त है, इसलिए निजी नलकूप खोदे जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में भी स्थिति चिंताजनक है। यमुना पर निर्भरता के बावजूद, भूजल का दोहन बहुत तेजी से हो रहा है। पश्चिमी यूपी के कई जिलों में जल स्तर खतरनाक स्तर तक गिर गया है। गाजियाबाद, नोएडा और मेरठ जैसे शहरों में गर्मी के दिनों में जल की कमी की समस्या गंभीर हो जाती है।
भविष्य के संकट की ओर बढ़ता कदम
वर्तमान दर से अगर भूजल का दोहन जारी रहा, तो आने वाले 15-20 साल में कई क्षेत्रों में भूजल पूरी तरह समाप्त हो सकता है। वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है।
जल संरक्षण के उपाय अभी तक पर्याप्त नहीं हुए हैं। वर्षा जल संचयन की योजनाएं कागजों में ही रह गई हैं। उद्योगों में जल के पुनः उपयोग को लेकर सख्त नियम नहीं हैं। कृषि में सिंचाई के पुराने तरीकों का इस्तेमाल जारी है।
शहरों में भी जल की बर्बादी रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं। सार्वजनिक नलों से रिसाव होता है। तालाब और कुओं की सफाई नहीं होती। बोरवेल खोदने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में जल संकट गहराता जा रहा है। किसान और जनता दोनों को जल संरक्षण के महत्व को समझना होगा। सरकार को भी सख्त नीतियां बनानी होंगी। अन्यथा, यह संकट आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महाविनाश बन सकता है।
जल ही जीवन है - यह कहावत आजकल केवल कहावत नहीं रह गई है। यह अब कड़वी हकीकत बन गई है। समय रहते हुए अगर कदम नहीं उठाए गए, तो देश को भूजल संकट से जूझना पड़ेगा। पानी की कीमत हमें तब समझ आएगी, जब वह खत्म हो जाएगा।




