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Wednesday, 19 August 2026
राजनीति

ममता बनाम ऋतब्रत: PAC चेयरमैन पद पर नया संघर्ष

author
Komal
संवाददाता
📅 24 June 2026, 6:16 AM ⏱ 1 मिनट 👁 442 views
ममता बनाम ऋतब्रत: PAC चेयरमैन पद पर नया संघर्ष
📷 aarpaarkhabar.com

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर से एक नई उथल-पुथल की ओर बढ़ रही है। राज्य विधानसभा में लोकसभा के लिए समिति (PAC) के अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर अभूतपूर्व संघर्ष सामने आ रहा है। यह चुनाव महज एक सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह बंगाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। इस चुनाव में ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है, जो TMC के विभाजन का सबसे बड़ा प्रमाण है।

राज्य की राजनीति को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि PAC अध्यक्ष का पद कितना महत्वपूर्ण है। संसदीय लोकतंत्र की परंपरा में PAC का अध्यक्ष पद विपक्ष के नेता को दिया जाता है। यह भारतीय राजनीति की एक दीर्घस्थायी परंपरा है। PAC का काम सरकार की वित्तीय निगरानी करना होता है। इस पद की जिम्मेदारी विधानसभा में सत्ता पक्ष की जांच करना और उसके खर्चों पर निरीक्षण करना है। इसलिए यह पद विपक्ष के हाथ में जाता है ताकि सरकार की निरंकुशता पर रोक लगाई जा सके।

किंतु बंगाल में यह परिस्थिति बिल्कुल अलग है। यहां TMC का विभाजन हो गया है। एक ओर तो ममता बनर्जी की TMC है जो सत्ता में है, और दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी की TMC बंगाल का असली विपक्ष बनने का दावा कर रही है। यह स्थिति PAC अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर देती है - असली विपक्ष कौन है?

ममता की TMC बनाम ऋतब्रत की TMC

यह विभाजन काफी दिनों से बंगाल की राजनीति को हिलाकर रख देता है। ऋतब्रत बनर्जी, जो पहले TMC के एक शक्तिशाली नेता थे, अब अपनी अलग TMC बनाकर ममता के खिलाफ खड़े हैं। दोनों पक्षों का दावा है कि वही असली TMC हैं और असली विपक्ष हैं। यह स्थिति PAC अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर अत्यंत जटिल बना देती है।

ऋतब्रत बनर्जी की TMC को अगर PAC का अध्यक्ष पद दिया जाता है, तो इसका मतलब यह होगा कि चुनाव आयोग ने ऋतब्रत की TMC को असली विपक्ष माना है। दूसरी ओर, अगर ममता की TMC को यह पद दिया जाता है, तो सरकार को जांचने का अधिकार सत्ता पक्ष के हाथ में चला जाएगा, जो लोकतांत्रिक परंपरा के बिल्कुल विरुद्ध है। इसलिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है।

बंगाल की राजनीति में ऐसी परिस्थितियां बहुत ही दुर्लभ हैं। विधानसभा में एक ही पार्टी के दो अलग-अलग गुट हैं, दोनों अपने आपको असली विपक्ष कहला रहे हैं। यह परिस्थिति न केवल राजनीति के लिए बल्कि राज्य के लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी एक नई चुनौती है।

PAC का महत्व और विधानसभा में इसकी भूमिका

PAC यानी लोकसभा के लिए समिति एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्था है। यह सरकार के सभी खर्चों की जांच करती है और यह सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक धन का सही उपयोग हो रहा है। विधानसभा में PAC की भूमिका सरकार की वित्तीय निगरानी करना है। अगर कोई भी सरकारी विभाग गलत तरीके से पैसे खर्च कर रहा है, तो PAC को इसके बारे में जानकारी होनी चाहिए। PAC के अध्यक्ष को इस काम की पूरी जिम्मेदारी होती है।

इसीलिए विश्व के सभी लोकतांत्रिक देशों में PAC का अध्यक्ष विपक्ष से ही चुना जाता है। यह परंपरा यह सुनिश्चित करती है कि सरकार की जांच एक निष्पक्ष तरीके से हो सकती है। जब सत्ता पक्ष के पास PAC का अधिकार आ जाता है, तो यह पद अपनी शक्ति खो देता है। इसी कारण बंगाल में इस PAC अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर इतना विवाद है।

भविष्य के लिए निहितार्थ

पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह नई टक्कर भविष्य के लिए कई सवाल खड़े करती है। अगर PAC का अध्यक्ष पद ममता की TMC को दिया जाता है, तो ऋतब्रत की TMC को अपनी विरोधी स्थिति को पुनः परिभाषित करना होगा। दूसरी ओर, अगर यह पद ऋतब्रत की TMC को दिया जाता है, तो ममता की सरकार को एक शक्तिशाली विपक्ष का सामना करना होगा।

यह स्थिति बंगाल की राजनीति को आने वाले दिनों में काफी रोचक बना सकती है। विधानसभा में इस पद के चुनाव से पहले दोनों पक्षों को अपना-अपना दावा मजबूत करना होगा। यह चुनाव केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह बंगाल की राजनीति का एक महत्वपूर्ण क्षण है। आने वाले दिनों में यह पद किसे दिया जाएगा, यह देखना होगा कि बंगाल की राजनीति किस दिशा में जाती है।