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Wednesday, 19 August 2026
राजनीति

आपातकाल 51 साल: 25 जून 1975 की पूरी कहानी

author
Komal
संवाददाता
📅 25 June 2026, 6:15 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
आपातकाल 51 साल: 25 जून 1975 की पूरी कहानी
📷 aarpaarkhabar.com

51 साल पहले आज के दिन यानी 25 जून 1975 को भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय शुरू हुआ था। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी थी। यह आपातकाल लगभग 21 महीने तक चला था और इस अवधि में देश को अभूतपूर्व राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था। आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों का दमन, प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और विरोधियों की गिरफ्तारियां हुईं।

आपातकाल भारत के लोकतंत्र के इतिहास में सबसे विवादास्पद और महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। इस अवधि में देश की जनता को अपनी बुनियादी आजादियों से वंचित कर दिया गया था। आपातकाल लागू होने के तुरंत बाद सरकार ने विरोधी नेताओं की सामूहिक गिरफ्तारियां करवाईं। राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और अन्य प्रमुख राजनेताओं को जेल में डाला गया। इसके अलावा सामान्य नागरिकों को भी मनमाने ढंग से पकड़ा गया और उन पर अत्याचार किए गए।

आपातकाल की घोषणा के पीछे के कारण

आपातकाल के मुख्य कारण के रूप में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 12 जून 1975 के फैसले को माना जाता है। इस फैसले में इंदिरा गांधी को 1971 के आम चुनावों में चुनाव प्रचार अभियान में अनुचित तरीके अपनाने का दोषी घोषित किया गया था। हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी की सदस्यता को 6 साल के लिए रद्द कर दिया था। इसका अर्थ यह था कि वह इस अवधि में संसद का सदस्य नहीं रह सकतीं और न ही वे सार्वजनिक पद पर रह सकतीं।

यह फैसला इंदिरा गांधी के लिए एक बड़ा झटका था। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल घोषित करने का अनुरोध किया। राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी। अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि इंदिरा गांधी ने व्यक्तिगत कारणों से राष्ट्रीय आपातकाल का दुरुपयोग किया था।

इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण कारण था बिहार में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन। इस आंदोलन को 'संपूर्ण क्रांति' का नाम दिया गया था। यह आंदोलन सामाजिक और आर्थिक सुधारों की मांग कर रहा था। बिहार से शुरू होकर यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया था। सरकार को लगता था कि यह आंदोलन राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन सकता है। इसलिए इंदिरा गांधी ने आपातकाल के जरिए इस आंदोलन को दबाना चाहा।

आपातकाल के दौरान आए बदलाव और दमन

आपातकाल की घोषणा के तुरंत बाद सरकार ने कई कठोर कदम उठाए। सबसे पहले सभी विरोधी राजनीतिक दलों के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लागू कर दी गई। समाचार पत्रों को नियंत्रित खबरें ही प्रकाशित करने की अनुमति दी गई। रेडियो और टेलीविजन पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में चली गई।

आपातकाल के दौरान आपातकालीन नियमों का दुरुपयोग करके हजारों लोगों को बिना किसी कानूनी कार्यवाही के जेल में डाला गया। पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा विरोधियों पर अत्याचार किए गए। महिलाओं, बुजुर्गों और छात्रों को भी गिरफ्तार किया गया। देश की जेलें राजनीतिक बंदियों से भर गईं।

इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने इस अवधि में बहुत अधिक शक्तियों का प्रयोग किया। उन्होंने जबरन नसबंदी कार्यक्रम को बेरहमी से लागू किया। हजारों लोगों की नसबंदी बिना उनकी सहमति के कराई गई। यह आपातकाल के दौरान सबसे विवादास्पद कदम था जिसने समाज में गहरा असंतोष पैदा किया।

आपातकाल की समाप्ति और उसके बाद

आपातकाल की घोषणा के 21 महीने बाद 21 मार्च 1977 को इंदिरा गांधी ने चुनावों की घोषणा कर दी। उन्हें विश्वास था कि जनता उन्हें फिर से चुना देगी। लेकिन देश की जनता ने साफ संदेश दिया। मई 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ा। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी सत्ता में आई।

आपातकाल के बाद विभिन्न जांच आयोगों का गठन किया गया। शाह आयोग ने आपातकाल के दौरान हुए अत्याचारों की जांच की। न्यायिक सुधार के लिए कई कदम उठाए गए। 1979 में संविधान में 44वां संशोधन किया गया जिसमें आपातकाल की शर्तों को कड़ा किया गया।

आपातकाल का असर भारतीय लोकतंत्र पर गहरा पड़ा। इसके बाद से भारत में राजनीतिक चेतना और अधिक प्रबल हुई। जनता को अपने अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी का एहसास हुआ। आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा की घड़ी माना जाता है। यह घटना साबित करती है कि भारत का संविधान जितना मजबूत है, उसे हमेशा जनता की सतर्कता और संवेदनशीलता की जरूरत है। आज आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ पर हमें अपनी स्वतंत्रता को संरक्षित रखने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने का संकल्प लेना चाहिए।