Emergency@51: इंदिरा गांधी का आपातकाल निर्णय
भारत की आजादी के महज 28 साल बाद ही देश को एक ऐसे अंधकार से गुजरना पड़ा जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जो फैसला लिया, वह भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय बन गया। आपातकाल की घोषणा के साथ ही देश में लोकतंत्र की नींद उड़ गई और नागरिक अधिकारों पर अंकुश लगा दिया गया। आइए जानते हैं कि आखिर इंदिरा सरकार ने यह घातक निर्णय कैसे लिया और उस समय भारत की राजनीति किन परिस्थितियों में जूझ रही थी।
1974 में भारत की राजनीति की उथल-पुथल
1974 का साल भारतीय राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण साल साबित हुआ। इसी साल बिहार में जयप्रकाश नारायण का विद्यार्थी आंदोलन शुरू हुआ, जो कालांतर में पूरे देश में एक सशक्त जनांदोलन बन गया। जयप्रकाश नारायण, जिन्हें जेपी के नाम से भी जाना जाता था, वे एक आजादी संग्राम सेनानी और समाजसेवी थे। उन्होंने भारतीय राजनीति में एक नई ऊर्जा का संचार किया। उनका यह आंदोलन शुरुआत में बिहार के रामलीला मैदान में हुआ था, जहां लाखों की भीड़ जमा होती थी।
उसी दौरान देश की आर्थिक स्थिति भी बहुत खराब थी। महंगाई आसमान छू रही थी, बेरोजगारी बढ़ रही थी और आम जनता का जीवन मुश्किल हो गया था। 1973-74 में तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि से विश्व भर में आर्थिक संकट खड़ा हो गया था और भारत भी इससे बच नहीं सका। खाद्य पदार्थों की कीमतें बहुत बढ़ गई थीं, रेलवे कर्मचारियों की हड़ताल हुई थी जिससे देश की परिवहन व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई थी। इसी बीच इंदिरा गांधी की सरकार की लोकप्रियता में गिरावट आ रही थी।
जयप्रकाश नारायण का आंदोलन इसी समय विकराल रूप ले गया। 'संपूर्ण क्रांति' का नारा देते हुए जेपी ने युवाओं को संगठित किया। देश भर से सांसद, विधायक और राजनेता इस आंदोलन में शामिल होने लगे। यहां तक कि कांग्रेस पार्टी के भीतर भी असंतोष की आवाजें सुनाई देने लगी थीं। इंदिरा गांधी की सरकार चारों तरफ से दबाव में आ गई थी।
इंदिरा गांधी के खिलाफ न्यायिक संकट
सितंबर 1974 में इंदिरा गांधी के खिलाफ अनुपूरक याचिका दायर की गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि 1971 के चुनावों में गांधी ने चुनाव प्रचार में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया था। यह याचिका भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लंबित थी और फैसले की तलवार सिर पर लटकी हुई थी। न्यायालय से किसी भी समय प्रतिकूल फैसले का डर था।
इसी दौरान रायबरेली में एक जनसभा में विरोध हुआ, जहां इंदिरा गांधी की काफी खिल्ली उड़ाई गई। इसके बाद 25 मई 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया। न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने 1971 के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया और इंदिरा गांधी को छह साल के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया। यह फैसला इंदिरा गांधी के लिए काफी झटका था।
न्यायालय के इसी फैसले के बाद की परिस्थितियों में ही इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू करने का फैसला किया। उन्होंने इसे भारत की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह निर्णय खुद को बचाने के लिए लिया गया था।
25 जून की रात: आपातकाल की घोषणा
25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पास इंदिरा गांधी पहुंचीं। उन्होंने अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने का आग्रह किया। राष्ट्रपति ने इस पर सहमति दे दी। अगली सुबह 26 जून 1975 को देश को आपातकाल की घोषणा के बारे में पता चला। आकाशवाणी पर इंदिरा गांधी की घोषणा प्रसारित की गई जिसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने आपातकाल घोषित किया है।
आपातकाल की घोषणा के तुरंत बाद प्रमुख विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर दिया गया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और अन्य कई नेताओं को जेल में डाल दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, राजनीतिक गतिविधियों पर पाबंदी लगी और नागरिक अधिकार सीमित कर दिए गए। यह अवधि 21 महीने तक चली और इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे अंधकार पूर्ण दौर माना जाता है।
आपातकाल की अवधि में सरकार ने सत्ता को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए। राष्ट्रीय आपातकाल के तहत मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। मीडिया पूरी तरह नियंत्रण में आ गया। भारतीय लोकतंत्र की यह काली अवधि 1977 में खत्म हुई जब इंदिरा गांधी ने आम चुनावों का ऐलान किया और जनता ने इंदिरा सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। इस चुनाव के बाद मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री बने।




