PoK में शहबाज सरकार का दमन, 17 दिन प्रदर्शन जारी
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके में पिछले 17 दिन से एक बड़ा राजनीतिक संकट चल रहा है। शहबाज शरीफ की सरकार ने विद्रोह को दबाने के लिए जो तरीके अपनाए हैं, वे काफी कठोर और विवादास्पद हैं। सरकार लोगों को भूखा रखकर, उनकी नौकरियां छीनकर और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर अपना दमनचक्र चला रही है। इस स्थिति ने पीओके में राजनीतिक तनाव को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है।
पीओके में विद्रोह की शुरुआत विभिन्न सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को लेकर हुई थी। आम लोग अपने अधिकारों की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आए। लेकिन शहबाज सरकार ने इन प्रदर्शनों को कुचलने के लिए अत्यंत कठोर कदम उठाए हैं। सरकार का यह रवैया न केवल अलोकतांत्रिक है, बल्कि मानवाधिकारों का भी स्पष्ट उल्लंघन है।
दमनचक्र और हिंसक कार्रवाई
पीओके में शहबाज सरकार की हिंसक कार्रवाई में अब तक दर्जनों लोगों की जान चली गई है। इसके अलावा, सैकड़ों कार्यकर्ताओं और प्रदर्शन समर्थकों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस प्रशासन ने इन लोगों पर राजद्रोह और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की गंभीर धाराएं लगाई हैं। कई मामलों में तो गिरफ्तार लोगों को यातनाएं भी दी जा रही हैं।
स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस और सशस्त्र बलों ने प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध फायरिंग की है। इसमें कई बेगुनाह नागरिक, महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन शहबाज सरकार सभी आलोचनाओं को खारिज करते हुए अपने दमनचक्र को जारी रखे हुए है।
भूखे रखने और नौकरियां छीनने की नीति
शहबाज सरकार ने विद्रोह को दबाने के लिए एक अनोखी रणनीति अपनाई है - आर्थिक दंड के जरिए लोगों को नियंत्रित करना। सरकार ने प्रदर्शनकारियों और उनके परिवार के सदस्यों की नौकरियां निकाल दी हैं। यह कदम न केवल बेरोजगारी को बढ़ा रहा है, बल्कि लोगों को भूख से मरने के लिए भी मजबूर कर रहा है।
राशन और खाद्य सामग्री की आपूर्ति को भी सरकार ने प्रदर्शनकारियों के घरों तक पहुंचने से रोक दिया है। यह एक तरह का जातीय सफाया और मानवीय हिंसा है। कई इलाकों में बच्चों और बुजुर्गों को भूखे रहने की स्थिति में रखा जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत, यह कार्रवाई एक जुर्म माना जाता है।
व्यापारियों को भी दबाव में रखा जा रहा है ताकि वे प्रदर्शनकारियों को राशन न बेचें। इसके फलस्वरूप, पीओके के कई इलाकों में खाद्य संकट की स्थिति पैदा हो गई है। बड़ी आबादी को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही है।
17 दिन लंबा प्रदर्शन
पीओके में चल रहा यह प्रदर्शन पिछले 17 दिनों से लगातार जारी है। इतने लंबे समय तक प्रदर्शन चलते रहना, इस विद्रोह की मजबूत नींव और जनता के आक्रोश को दर्शाता है। प्रदर्शनकारी शहबाज सरकार के खिलाफ कड़े सवाल उठा रहे हैं और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
स्थानीय नेता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रदर्शनकारियों का समर्थन कर रहे हैं। कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने भी इस स्थिति पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। यूएन और अन्य मानवाधिकार निकायों ने शहबाज सरकार से इस दमनचक्र को रोकने की अपील की है।
प्रदर्शनकारी अपने प्रदर्शन को शांतिपूर्ण तरीके से चलाए जा रहे हैं, लेकिन सरकार किसी समझौते के लिए तैयार नहीं दिख रही है। प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं और अपनी मांगों को दोहरा रहे हैं।
प्रशासन के दावे और वास्तविकता
शहबाज सरकार का प्रशासन दावा करता है कि वह केवल गैर-कानूनी कृत्यों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। हालांकि, यह दावा काफी संदिग्ध है क्योंकि प्रदर्शन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक वैध साधन है। बेशक, हिंसा की कार्रवाई को रोका जाना चाहिए, लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन को दबाना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अस्वीकार्य है।
हजारों निर्दोष लोगों को गिरफ्तार करना, उन्हें यातनाएं देना और उनकी नौकरियां छीनना - ये सब कार्य प्रशासन के दावों को झूठा साबित करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों की बुनियादी अवधारणाएं शहबाज सरकार की इन कार्रवाइयों की कड़ी निंदा करती हैं।
पीओके में चल रहा यह संकट एक वैश्विक मुद्दा बन गया है। कई देशों ने अपनी चिंता व्यक्त की है और शहबाज सरकार से प्रदर्शनकारियों के साथ संवाद करने की अपील की है। लेकिन अभी तक सरकार के रवैये में कोई नरमी दिखाई नहीं दे रही है। 17 दिन लंबे इस संघर्ष का अंत कब और कैसे होगा, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।




