ईरान तख्तापलट: अमेरिका की साजिश और शाह की सत्ता
ईरान में हुए तख्तापलट में अमेरिकी सरकार की भूमिका, शाह की सत्ता और अमेरिकी प्रभाव के बारे में जानें।
ईरान के इतिहास में उन्नीस सौ तिपन का साल बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी साल अगस्त महीने में ईरान में एक ऐसा तख्तापलट हुआ जिसने देश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। यह तख्तापलट सिर्फ एक आंतरिक घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे अमेरिकी सरकार की गहरी साजिश थी। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और ब्रिटिश गुप्तचर संगठन ने मिलकर इस तख्तापलट को अंजाम दिया था। इस घटना ने न केवल ईरान के भविष्य को प्रभावित किया, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया।
उन्नीस सौ तिपन से पहले ईरान की राजनीतिक स्थिति काफी जटिल थी। ईरान के प्रधानमंत्री मुहम्मद मोसादेग ईरान की तेल संपदा को राष्ट्रीयकृत करना चाहते थे। तेल उद्योग पर विदेशी कंपनियों का कब्जा था और वे ईरान को न्यूनतम मुआवजा दे रही थीं। मोसादेग की यह नीति न केवल ईरानी जनता में लोकप्रिय थी, बल्कि वह अपने देश की संपत्ति को वापस लाना चाहते थे। लेकिन यह निर्णय पश्चिमी शक्तियों को नापसंद था। ब्रिटेन और अमेरिका को मोसादेग की नीति से खतरा दिख रहा था क्योंकि इससे उनके तेल व्यापार और आर्थिक हित प्रभावित होते थे।
अमेरिकी साजिश का आरंभ
ब्रिटिश सरकार ने सबसे पहले अमेरिका को इस मामले में शामिल करने की कोशिश की। ब्रिटेन चाहता था कि अमेरिका मोसादेग की सरकार को गिराने में मदद करे। शुरुआत में अमेरिका कुछ संकोचशील था, लेकिन शीत-युद्ध के दौर में कम्युनिस्ट विरोधी नीति के कारण अमेरिका को लगने लगा कि मोसादेग की सरकार का झुकाव सोवियत संघ की ओर हो सकता है। यह धारणा बिल्कुल गलत थी, लेकिन अमेरिकी राजनीतिज्ञ इसी बहाने मोसादेग के खिलाफ कार्रवाई करना चाहते थे।
अमेरिकी सीआईए और ब्रिटिश एमआई सिक्स ने मिलकर ऑपरेशन एजैक्स नामक एक गुप्त अभियान शुरू किया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मोसादेग की सरकार को उखाड़ फेंकना और शाह मुहम्मद रेजा पहलवी को पूर्ण सत्ता में स्थापित करना था। शाह पहले से ही ईरान के राजा थे, लेकिन संवैधानिक राजतंत्र के अंतर्गत उनकी शक्तियां सीमित थीं। अमेरिका और ब्रिटेन चाहते थे कि शाह निरंकुश शासक बन जाएं। इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए विभिन्न कार्रवाइयां की गईं।
अमेरिकी एजेंसियों ने ईरान के भीतर अलग-अलग समूहों को भड़काया। देश के अंदर एक अस्थिरता का माहौल बनाया गया। मीडिया के माध्यम से मोसादेग के विरुद्ध प्रोपेगेंडा चलाया गया। धार्मिक नेताओं को प्रभावित किया गया ताकि वे मोसादेग के खिलाफ जनता को भड़का सकें। सेना के कुछ उच्च अधिकारियों को अमेरिकी सहायता का वादा दिया गया। धीरे-धीरे देश में विद्रोह का माहौल पैदा होने लगा।
तख्तापलट की घटना और शाह की सत्ता
उन्नीस सौ तिपन के अगस्त में जब स्थिति विस्फोटक हो गई, तो शाह ने मोसादेग को हटाने का प्रयास किया। पहली कोशिश विफल हुई और शाह को मिस्र भाग जाना पड़ा। लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन ने हार न मानी। उन्होंने और जोरदार तरीके से हस्तक्षेप किया। सेना और पुलिस को निर्देश दिए गए। सड़कों पर उतरने के लिए भीड़ को भेजा गया। अंतत: मोसादेग की सरकार गिर गई और शाह ईरान में लौट आए।
शाह की वापसी के बाद ईरान पर अमेरिका का आधिपत्य स्थापित हो गया। शाह अमेरिका के हिसाब से चलने वाले राजा बन गए। मध्य-पूर्व में अमेरिकी नीतियों को लागू करने का जिम्मा शाह को दिया गया। ईरान की तेल नीति को अमेरिका के अनुसार तय किया जाने लगा। सैन्य खरीद-फरोख्त में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता दी गई। ईरानी सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण अमेरिकी सहायता से किया गया। इस प्रकार ईरान अमेरिका का एक महत्वपूर्ण सहयोगी बन गया।
दीर्घकालीन परिणाम और ईरानी क्रांति
हालांकि शाह की सत्ता अमेरिकी समर्थन से स्थापित हुई थी, लेकिन इसके परिणाम बेहद गंभीर निकले। शाह का शासन अत्यंत दमनकारी था। जनता की आवाज दबाई गई। राजनीतिक विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया गया। गुप्त पुलिस सावाक का आतंक पूरे देश में फैल गया। आर्थिक नीतियां अमेरिकी हितों के अनुसार बनाई गईं जिससे साधारण ईरानियों को लाभ नहीं मिला। धार्मिक मूल्यों को नजरअंदाज किया गया।
इन सभी कारणों से ईरानी जनता में एक क्रांतिकारी भावना पैदा होने लगी। उन्नीस सौ उनहत्तर में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में ईरानी क्रांति का विस्फोटन हुआ। इस क्रांति में जनता ने शाह को उखाड़ फेंका और एक नई राजनीतिक व्यवस्था स्थापित की। यह क्रांति अमेरिकी हस्तक्षेप के विरुद्ध एक सीधी प्रतिक्रिया थी। इसके बाद अमेरिका और ईरान के संबंध शत्रुतापूर्ण बन गए और आज तक वह स्थिति बनी हुई है।
मुहम्मद मोसादेग और ईरानी तेल राष्ट्रीयकरण का सपना भी इसी तख्तापलट के कारण टूट गया। यदि मोसादेग की सरकार बनी रहती, तो ईरान का राजनीतिक इतिहास बिल्कुल अलग होता। उन्नीस सौ तिपन का यह तख्तापलट विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है जो दर्शाती है कि कैसे बाहरी ताकतें किसी देश की भाग्य को बदल सकती हैं। यह घटना यह भी सिखाती है कि जनता की मर्जी के विरुद्ध की गई किसी भी साजिश का अंत हमेशा बुरा होता है।



