शशि थरूर ने नए संसद भवन को बेजान कॉन्फ्रेंस सेंटर बताया
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने नए संसद भवन की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें पुरानी इमारत जैसा अपनापन नहीं है। जानिए उनकी पूरी बातचीत।
नई दिल्ली - कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने देश के नए संसद भवन को लेकर तीखी आलोचना की है। उन्होंने इस आधुनिक स्थापत्य को एक 'बेजान कॉन्फ्रेंस सेंटर' बताते हुए कहा है कि इसमें पुरानी संसद भवन जैसी गरिमा, अपनापन और सांस्कृतिक विरासत का भाव नहीं है। थरूर का यह बयान भारतीय संसद के इतिहास और उसके महत्व पर एक गहरी बहस को जन्म दे रहा है।
थरूर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पुरानी संसद इमारत न केवल एक भवन थी, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा और विरासत का प्रतीक थी। वहां के हर कोने में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गौरवगाथा, संविधान निर्माताओं की कड़ी मेहनत और देश के विकास की कहानी लिखी हुई थी। नई इमारत चाहे कितनी भी आधुनिक और विशाल क्यों न हो, वह उस भावनात्मक जुड़ाव को नहीं ला सकती जो पुरानी इमारत में था।
पुरानी संसद का महत्व और भावनात्मक जुड़ाव
थरूर के अनुसार, पुरानी संसद भवन में सांसदों के बीच एक विशेष तरह की अनौपचारिकता और भाईचारे का माहौल था। सेंट्रल हॉल जहां दोनों सदनों के सदस्य बैठते थे, वह सिर्फ एक स्थान नहीं था बल्कि एक ऐसी जगह थी जहां विभिन्न विचारधाराओं वाले लोग आपस में घुलमिल जाते थे। राजनीतिक विरोधियों के बीच भी एक सम्मान और समझ होती थी। इस तरह की बातचीत और समझदारी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए बहुत जरूरी होती है।
नई संसद में यह अनौपचारिक माहौल नहीं रह गया है। थरूर ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आधुनिकता और भव्यता के नाम पर हमने अपनी संस्कृति और परंपरा के साथ एक महत्वपूर्ण रिश्ता खो दिया है। नई इमारत में बेशक सभी सुविधाएं हैं, लेकिन उसमें वह जीवंतता और लोकतांत्रिक चेतना की गूंज नहीं सुनाई देती जो कभी पुरानी संसद में सुनाई देती थी।
नई संसद की वास्तुकला पर सवाल
थरूर ने नई संसद भवन की वास्तुकला की भी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि यह इमारत एक आधुनिक कार्यालय भवन जैसी दिखती है, जिसमें कोई विशेष भारतीय या ऐतिहासिक स्पर्श नहीं है। सेंट्रल हॉल का न होना एक बड़ी कमी है क्योंकि वह हॉल दोनों सदनों को जोड़ने का काम करता था। उसमें अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर बहसें होती थीं जहां विभिन्न पक्षों के विचार आपस में टकराते थे और कोई समाधान निकलता था।
थरूर ने लोकसभा में 850 सांसदों की संख्या को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। वे मानते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में सांसद होने से संसद अधिक प्रभावी नहीं बल्कि कम प्रभावी हो जाती है। इससे न तो सभी को बोलने का मौका मिलता है और न ही गुणवत्तापूर्ण बहस हो पाती है। संसद एक मतलब के लिए का संस्थान है जहां सवाल-जवाब के माध्यम से सरकार को जवाबदेही के लिए मजबूर किया जाता है।
नई संसद की योजना और भविष्य की चुनौतियां
नई संसद भवन की निर्माण प्रक्रिया को लेकर भी थरूर ने कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इस भवन को बनाने में काफी धनराशि खर्च की गई है, लेकिन क्या यह खर्च सार्थक साबित हुआ है? क्या हम एक ऐसी संरचना बना रहे हैं जो केवल आधुनिकता का प्रतीक है लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रतिबिंबित नहीं करती?
थरूर का मानना है कि भारतीय लोकतंत्र की ताकत उसके विविधता और समावेशी होने में निहित है। पुरानी संसद यह विविधता को एक अनौपचारिक लेकिन सम्मानपूर्ण तरीके से समायोजित करती थी। नई संसद में औपचारिकता और दूरी अधिक है जो किसी भी तरह से लाभदायक नहीं है।
कांग्रेस नेता का यह आलोचनात्मक दृष्टिकोण भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बहस को केंद्रित करता है। यह केवल एक भवन की आलोचना नहीं है, बल्कि यह उस दर्शन की आलोचना है जो आधुनिकता के नाम पर परंपरा को भूल जाता है। भारत एक ऐसा देश है जहां परंपरा और आधुनिकता दोनों को समान महत्व दिया जाना चाहिए। शशि थरूर का यह विचार भारतीय संसद के भविष्य के बारे में एक गहन चिंतन का विषय बन गया है।




