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Thursday, 05 November 2026
धर्म

नैफेड दालों का बफर स्टॉक त्योहार में

त्योहारी सीजन में नैफेड 1.9 लाख टन मूंग बाजार में उतारेगी। दालों की किल्लत नहीं होगी, जानिए कीमतों पर क्या असर पड़ेगा।

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Komal
संवाददाता
📅 20 October 2026, 7:45 AM ⏱ 1 मिनट 👁 543 views
नैफेड दालों का बफर स्टॉक त्योहार में
📷 aarpaarkhabar.com

त्योहारी सीजन आते ही बाजार में दालों की मांग बढ़ जाती है और कीमतें भी आसमान छूने लगती हैं। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ यानी नैफेड अक्तूबर के अंत तक 1.9 लाख टन मूंग को बाजार में उतारने की तैयारी कर रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य त्योहारी सीजन में दालों की कमी को दूर करना और कीमतों को नियंत्रित रखना है।

दरअसल, हर साल त्योहारों के समय दालों की खपत में भारी इजाफा होता है। दिवाली, दशहरा और अन्य त्योहारों में मिठाइयां, खीर, हलवा आदि बनाने के लिए दालों की भारी मांग रहती है। इसी मांग को पूरा करने के लिए सरकार के खाद्य विभाग ने पहले से ही रणनीति बना ली है। नैफेड के पास मौजूद विशाल बफर स्टॉक इसी समय को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

नैफेड के पास 2026 के लिए कुल 3.90 लाख टन मूंग का बफर स्टॉक मौजूद है। इतना विशाल स्टॉक रखने का मुख्य कारण देश की आबादी की दैनिक जरूरतों को पूरा करना और किसी भी आपात स्थिति में आपूर्ति सुनिश्चित करना है। दाल भारतीय खाने का एक अभिन्न अंग है और प्रोटीन का प्रमुख स्रोत माना जाता है। गरीब परिवारों से लेकर अमीर तक सभी के भोजन में दाल शामिल होती है।

दाल की कीमतें नियंत्रित करने की रणनीति

सरकार की यह रणनीति सीधे तौर पर बाजार में दालों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बनाई गई है। जब बाजार में किसी वस्तु की आपूर्ति बढ़ जाती है, तो उसकी कीमत स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है। नैफेड द्वारा 1.9 लाख टन मूंग का रिलीज ठीक इसी सिद्धांत पर काम करेगा। जब बाजार में दालों की अचानक बाढ़ आ जाएगी, तो दलालों और व्यापारियों को कीमतें बढ़ाने का मौका नहीं मिलेगा।

पिछले कुछ वर्षों में दालों की कीमतें कई बार नियंत्रण से बाहर हो गई हैं। 2019-2020 में मूंग की कीमत 8000 रुपये प्रति क्विंटल के करीब पहुंच गई थी। इसका सीधा असर आम जनता के किचन बजट पर पड़ता है। गरीब परिवारों में दाल खरीदना बहुत महंगा हो जाता है। इसलिए सरकार ने इस बार पहले से ही तैयारी की है।

नैफेड का एक निर्दिष्ट मूल्य नीति भी है। जब वह बाजार में दाल उतारता है, तो वह खुदरा दुकानों और थोक बाजारों में एक निर्धारित कीमत पर ही दाल बेचता है। इससे काला बाजार को रोकने में मदद मिलती है। साथ ही, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी सहायता मिलती है।

बफर स्टॉक प्रबंधन और भंडारण की चुनौतियां

इतनी बड़ी मात्रा में दाल को भंडारित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। नैफेड को दाल को ठीक तापमान और नमी वाले गोदामों में रखना पड़ता है। अगर भंडारण की स्थिति ठीक न हो, तो दाल खराब हो सकती है। कीड़ों का असर भी हो सकता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में नैफेड के गोदाम मौजूद हैं। ये गोदाम आधुनिक सुविधाओं से लैस होते हैं।

दाल को बाजार तक पहुंचाना भी एक जटिल प्रक्रिया है। नैफेड को यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि दाल समय पर और सही मात्रा में बाजार के विभिन्न हिस्सों में पहुंचे। शहरों के अलावा गांवों तक भी दाल की आपूर्ति करनी होती है। इसके लिए एक सुव्यवस्थित वितरण नेटवर्क की जरूरत होती है।

किसानों पर प्रभाव और भविष्य की योजना

जब सरकार बफर स्टॉक से बाजार में दाल उतारती है, तो इसका असर किसानों पर भी पड़ता है। अगर बाजार में बहुत ज्यादा दाल आ जाए, तो किसानों को अपनी नई फसल बेचने में मुश्किल हो सकती है। कीमतें गिर सकती हैं। इसलिए सरकार को इस संतुलन को बनाए रखना पड़ता है। न तो बहुत ज्यादा स्टॉक बाजार में उतारना है और न ही बहुत कम। यह एक कला है जिसे सरकार के खाद्य विभाग को अच्छी तरह समझना होता है।

भविष्य में सरकार दाल उत्पादन को बढ़ाने की ओर भी ध्यान दे रही है। कृषि वैज्ञानिक नई किस्मों पर काम कर रहे हैं जो अधिक उपज दे सकें। किसानों को भी दालें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। लेकिन जब तक नई फसल तैयार न हो जाए, तब तक बफर स्टॉक ही एकमात्र विकल्प है।

नैफेड की यह पहल निश्चित रूप से सराहनीय है। इससे आम जनता को त्योहारों के समय दालें सस्ती कीमत पर मिल सकेंगी। दिवाली, दशहरा और अन्य त्योहारों में परिवार के सभी सदस्य अपने पसंद के व्यंजन बना सकेंगे। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत जैसे बहुआबादी देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। नैफेड का 1.9 लाख टन मूंग का रिलीज इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आशा है कि इससे बाजार में दालों की आपूर्ति सुचारू रहेगी और कीमतें भी नियंत्रण में रहेंगी।