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Wednesday, 19 August 2026
राजनीति

बिजनौर सीट का चुनावी इतिहास: कांग्रेस से BJP तक

बिजनौर विधानसभा सीट का पूरा चुनावी इतिहास, कांग्रेस के गढ़ से BJP के दबदबे तक, बसपा और सपा की चुनौती जानिए।

author
Komal
संवाददाता
📅 19 August 2026, 6:16 AM ⏱ 1 मिनट 👁 583 views
बिजनौर सीट का चुनावी इतिहास: कांग्रेस से BJP तक
📷 aarpaarkhabar.com

बिजनौर विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस सीट का चुनावी इतिहास दशकों तक विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के उत्थान और पतन का साक्षी रहा है। कभी जहां कांग्रेस का मजबूत गढ़ था, वहीं आज भाजपा का दबदबा दिखाई दे रहा है। हालांकि, समाजवादी पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों की चुनौती भी कम नहीं है।

कांग्रेस का स्वर्णिम दौर

बिजनौर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व स्वतंत्रता के बाद के दशकों में साफ दिखाई देता है। 1950 और 1960 के दशक में इस सीट पर कांग्रेस के नेताओं का शासन रहा। उस समय बिजनौर जिला कांग्रेस की मजबूत पकड़ का केंद्र माना जाता था। गांधीवादी विचारधारा और स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस की भूमिका के कारण आम जनता के बीच यह पार्टी काफी लोकप्रिय थी। 1970 और 1980 के दशक में भी कांग्रेस बिजनौर में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रही। इस अवधि में विभिन्न कांग्रेसी नेताओं ने बिजनौर का प्रतिनिधित्व किया और जनता के कल्याण के लिए काम किया।

कांग्रेस के इस स्वर्णिम दौर में स्थानीय मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जाता था। कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विकास के लिए कांग्रेसी नेताओं ने प्रयास किए। बिजनौर की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए किसानों के हितों के लिए कांग्रेस ने मजबूत रुख अपनाया। यह कारण था कि इस क्षेत्र में कांग्रेस की जड़ें गहरी थीं।

1990 का दशक: बसपा की बयार और नए दल का उदय

1990 के दशक में भारतीय राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन आया। बहुजन समाज पार्टी, जो दलितों और पिछड़ी जातियों के हितों के लिए काम करती थी, अपनी शक्ति दिखाने लगी। बिजनौर में भी बसपा को काफी समर्थन मिला। कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बसपा ने सामाजिक न्याय का नारा दिया, जिससे समाज के वंचित वर्गों में इस पार्टी की अपील बढ़ी। बिजनौर में बसपा के कार्यकर्ताओं ने जमीनी स्तर पर मजबूत संगठन तैयार किया। 1990 के दशक में बिजनौर से बसपा के उम्मीदवारों ने चुनाव जीते और पार्टी की मजबूत उपस्थिति दर्ज की।

इसी दौरान जनता दल जैसी पार्टियों का भी प्रभाव देखा जा सकता है। यह दौर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों के बीच सत्ता के हस्तांतरण का दौर था। कांग्रेस की एकाधिकारी पकड़ में दरार आ रही थी, और नए राजनीतिक गठन उभर रहे थे। बिजनौर की चुनावी राजनीति में यह बदलाव जाति-आधारित राजनीति के उदय को दर्शाता है।

भाजपा का दबदबा और मौजूदा राजनीतिक समीकरण

2000 के दशक के बाद से भाजपा की राजनीतिक ताकत बिजनौर में स्पष्ट दिखने लगी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और राष्ट्रवादी राजनीति के सहारे भाजपा ने अपनी जड़ें मजबूत कीं। 2012 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को बिजनौर में अच्छी सफलता मिली। 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा। पार्टी ने इस क्षेत्र में हिंदुत्व और विकास के मुद्दों को आधार बनाकर जनता को प्रभावित किया।

2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की शुचि चौधरी ने बिजनौर सीट से जीत हासिल की। उन्होंने राकेश लोधा की रिलीजन डेमोक्रेटिक पार्टी (आरएलडी) के नीरज चौधरी को एक करीबी मुकाबले में हराया। भाजपा की जीत को आधुनिकता और पारंपरिक मूल्यों के मिश्रण के रूप में देखा जा सकता है। शुचि चौधरी एक महिला उम्मीदवार थीं, जिन्होंने महिला सशक्तिकरण का मुद्दा उठाया।

वर्तमान समय में बिजनौर के राजनीतिक समीकरण में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। समाजवादी पार्टी, जो तेजी से अपनी ताकत बढ़ा रही है, भाजपा के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है। बिजनौर जिला के ग्रामीण क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी का काफी प्रभाव है। किसानों और मजदूर वर्ग के बीच सपा की अपील बढ़ रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भी इस क्षेत्र में सपा ने एक मजबूत लड़ाई दिखाई थी।

भविष्य की चुनावी गतिविधियां

2027 के आने वाले विधानसभा चुनावों में बिजनौर एक महत्वपूर्ण सीट बन गई है। भाजपा अपनी जीत को दोहराने के लिए तैयारियां कर रही है। शुचि चौधरी फिर से इस सीट से चुनाव लड़ सकती हैं। वहीं, समाजवादी पार्टी एक मजबूत उम्मीदवार के साथ आने की तैयारी में है। स्थानीय मुद्दों, जैसे कि पानी की आपूर्ति, कृषि सुधार, और रोजगार के अवसर चुनावों में केंद्रीय भूमिका निभाएंगे।

बिजनौर का चुनावी इतिहास यह दर्शाता है कि यह सीट राजनीतिक परिवर्तनों के लिए बेहद संवेदनशील रही है। कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, हर दल ने यहां अपना प्रभाव दिखाया है। आने वाले चुनावों में भाजपा की मजबूत स्थिति बनी रहेगी या समाजवादी पार्टी सत्ता में आएगी, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा। निश्चित रूप से, बिजनौर की राजनीति को समझना भारतीय लोकतंत्र की गतिविधियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।