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Thursday, 30 July 2026
समाचार

ब्रिक्स एनएसए बैठक: चीन का कूटनीतिक परीक्षण

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Komal
संवाददाता
📅 22 June 2026, 6:00 AM ⏱ 1 मिनट 👁 925 views
ब्रिक्स एनएसए बैठक: चीन का कूटनीतिक परीक्षण
📷 aarpaarkhabar.com

नई दिल्ली में सोमवार से ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की ऐतिहासिक बैठक शुरू होने जा रही है। यह दो दिवसीय बैठक ब्रिक्स समूह के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रभावशाली देशों के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी शामिल होंगे। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इस बैठक की अध्यक्षता करेंगे, जबकि चीन की ओर से विदेश मंत्री वांग यी प्रतिनिधित्व करेंगे।

यह बैठक भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा विवाद के बीच बुलाई जा रही है, जिससे इसका महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। भारत के लिए यह एक सुनहरा मौका है कि वह अपने पड़ोसी देश की नीतियों और कथनी-करनी के बीच के अंतर को उजागर कर सके। डैपसांग और डेमचोक जैसे संवेदनशील इलाकों से चीनी सैनिकों की वापसी का मुद्दा इस बैठक में केंद्रीय भूमिका निभा सकता है।

सुरक्षा एवं आतंकवाद पर केंद्रीय चर्चा

ब्रिक्स एनएसए बैठक का मुख्य एजेंडा क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और तकनीकी चुनौतियों पर केंद्रित है। वर्तमान समय में साइबर हमले, डेटा सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े खतरे विश्व के सभी देशों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं। ब्रिक्स देश इन मुद्दों पर एक समन्वित दृष्टिकोण विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं।

आतंकवाद की समस्या तो पारंपरिक रूप से ब्रिक्स देशों के लिए चुनौती बनी हुई है। भारत विशेषकर इस समस्या से जूझ रहा है और अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में आतंकवादी गतिविधियों का सामना कर रहा है। इस बैठक में आतंकवाद पर नियंत्रण के लिए क्षेत्रीय सहयोग और सूचना साझाकरण के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। भारत इस मंच का उपयोग करके क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत संदेश भेजना चाहता है।

तकनीकी क्षेत्र में भी ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग बढ़ने की गुंजाइश है। साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और डिजिटल नागरिकता के क्षेत्र में ये देश एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं। चीन अपने डिजिटल कौशल के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, लेकिन भारत के पास भी इस क्षेत्र में मजबूत सॉफ्टवेयर विशेषज्ञता है।

भारत-चीन सीमा विवाद की जटिलता

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पिछले कई दशकों से मौजूद है। 2020 में गलवान घाटी में हुए संघर्ष के बाद से यह समस्या और भी तीव्र हो गई है। डैपसांग और डेमचोक जैसे इलाकों में भारतीय सेना ने काफी मजबूत मोर्चे बिठाए हुए हैं। चीनी सेना अपनी उपस्थिति को लेकर काफी कड़ी है, लेकिन भारत इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करने के लिए प्रतिबद्ध है।

वांग यी की भारत यात्रा इसी संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन के विदेश मंत्री को भारत के दृढ़ संकल्प को समझना चाहिए कि भारत अपनी भूमि पर किसी भी अनुचित दावे को स्वीकार नहीं करेगा। भारत के राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं और इसलिए अजीत डोभाल इस मंच पर चीन को स्पष्ट संदेश दे सकते हैं।

सीमा पर तनाव को कम करने के लिए दोनों देशों के बीच सैन्य-से-सैन्य संवाद जरूरी है। ब्रिक्स बैठक इस संवाद को आगे बढ़ाने का एक बेहतरीन मंच प्रदान करती है। भारत चाहता है कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा के सम्मान में आए और किसी भी तरह की अवैध घुसपैठ से बाज आए।

कूटनीतिक दबाव और भारत की मजबूत स्थिति

भारत अपनी कूटनीतिक समझदारी के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इस बैठक में भी भारत को अपनी मजबूत स्थिति का लाभ उठाना चाहिए। ब्रिक्स समूह में भारत की अहम भूमिका है और इसलिए अजीत डोभाल को चीन के साथ सख्त रुख अपनाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। चीन की कथनी-करनी का यह परीक्षण काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसी बातें कहता है जो उसकी वास्तविक नीतियों से अलग होती हैं।

भारत को चीन से स्पष्ट प्रतिबद्धताएं लेनी चाहिए कि वह सीमा पर शांति बनाए रखेगा और किसी भी तरह की आक्रामक कार्रवाई नहीं करेगा। रूस और अन्य ब्रिक्स देश भी भारत के दृष्टिकोण को समझते हैं क्योंकि वे भी क्षेत्रीय सुरक्षा में विश्वास करते हैं। इसलिए इस बैठक का परिणाम काफी हद तक भारत की कूटनीतिक कुशलता पर निर्भर करेगा।

अंत में, यह बैठक ब्रिक्स देशों के लिए एकता और सहयोग का संदेश देने का एक शानदार मौका है। लेकिन भारत के लिए यह चीन के साथ अपनी सीमा समस्या को मजबूती से संबोधित करने का भी एक सुनहरा अवसर है। कूटनीतिक परीक्षा में भारत को सफल होना चाहिए।