ब्रिटेन में नेता विरोध लोकतंत्र की परिपक्वता
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर को अपनी ही पार्टी लेबर के सौ सांसदों के दबाव में पद छोड़ना पड़ा। यह एक साधारण घटना लग सकती है, लेकिन भारतीय राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। जब कीर स्टार्मर ने 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर मीडिया को संबोधित करते हुए अपने इस्तीफे की घोषणा की, तो उनकी बातों में न तो विद्रोह की गंध थी, न ही किसी प्रकार की तल्खी या बदले की भावना। यह ब्रिटेन के लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थागत मजबूती का जीता-जागता उदाहरण है।
भारत में अगर किसी नेता के विरुद्ध पार्टी के सांसद विद्रोह करते हैं, तो यह 'बगावत' और 'गद्दारी' का नाम दिया जाता है। मीडिया हंगामे से भर जाता है, राजनीतिक विष्लेषक बेतहाशा बातें करने लगते हैं। विरोधी पक्ष तो अपने-अपने समर्थकों को इकट्ठा कर देता है। लेकिन ब्रिटेन में यह सब नहीं होता। वहां नेता के विरोध को लोकतंत्र का अभिन्न अंग माना जाता है, न कि किसी प्रकार का विद्रोह।
ब्रिटेन की राजनीतिक परिपक्वता
ब्रिटेन की राजनीतिक संस्कृति कई सदियों की विकास यात्रा का नतीजा है। वहां की संसदीय प्रणाली दुनिया में सबसे पुरानी मानी जाती है। ब्रिटेन में 1689 में 'बिल ऑफ राइट्स' आया था, जिसने राजतांत्रिक शक्तियों को सीमित किया। तब से लेकर आज तक, वहां की राजनीति में संस्थागत मजबूती लगातार बढ़ी है।
ब्रिटेन में सत्ता का केंद्रीकरण नहीं होता। प्रधानमंत्री को भी संसद के सदस्यों के सामने नियमित रूप से जवाबदेही करनी पड़ती है। यदि प्रधानमंत्री अपने ही पार्टी के सांसदों का विश्वास खो देता है, तो वह स्वेच्छा से इस्तीफा दे देता है। कीर स्टार्मर का इस्तीफा इसी परंपरा का पालन है। वहां की राजनीति में व्यक्ति कम, संस्थाएं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
भारत में स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां सत्ता अक्सर एक व्यक्ति के चारों ओर केंद्रित होती है। पार्टी का मतलब उसका अध्यक्ष होता है। जब कोई नेता पद पर होता है, तो पार्टी के कार्यकर्ताओं और सांसदों से अपेक्षा की जाती है कि वे उसके आदेश मानें। इसके विपरीत, यदि कोई आवाज उठाता है, तो उसे पार्टी-विरोधी, विद्रोही या गद्दार करार दिया जाता है। शिवसेना से लेकर टीएमसी तक, ऐसे उदाहरण भारतीय राजनीति में भरे पड़े हैं, जहां नेता विरोध को पार्टी फूटने का कारण माना गया।
संस्थाओं का महत्व और कानून का राज
ब्रिटेन में कानून का राज सर्वोच्च है। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह प्रधानमंत्री हो या सामान्य नागरिक, कानून के ऊपर नहीं है। यह सिद्धांत ब्रिटेन के संविधान का आधार है। वहां संविधान लिखित नहीं है, बल्कि परंपरा, कानून और प्रथाओं का एक संग्रह है। इसी लचीलेपन के कारण ब्रिटेन की व्यवस्था विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल सकती है।
ब्रिटेन की प्रेस भी बेहद स्वतंत्र है। समाचार माध्यम किसी भी शक्तिशाली व्यक्ति के विरुद्ध खुलकर बोल सकते हैं। इसी कारण जब कीर स्टार्मर पर दबाव बढ़ा, तो मीडिया पूरी निष्पक्षता के साथ इसे कवर किया। न तो किसी को डराया गया, न ही किसी पर दबाव डाला गया। बस सत्य को सामने रखा गया।
भारत में मीडिया की आजादी के बावजूद, राजनीतिक दबाव अक्सर काम करता है। कुछ समाचार माध्यम सत्ताधारियों के करीब हो जाते हैं। इससे सूचना का प्रसारण तटस्थ नहीं रह पाता। विरोध को अक्सर नाटकीय या विद्रोही रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
भारत और ब्रिटेन में अंतर
भारत भी एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन हमारी लोकतांत्रिक परंपरा ब्रिटेन जितनी पुरानी या मजबूत नहीं है। भारत को आजादी मिले अभी सत्तर साल से कुछ अधिक हुए हैं। इसी अवधि में हमने एक विशाल, विविध और जटिल लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित किया है। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
हालांकि, भारत में अभी भी सत्ता का व्यक्तिगतकरण होता है। नेता-केंद्रित राजनीति हमारी संस्कृति में गहराई से समाई है। परिवारवादी राजनीति भी एक बड़ी समस्या है। कई पार्टियां तो बस एक परिवार के लिए काम करती हैं। ऐसे में जब कोई पार्टी के भीतर विरोध करता है, तो उसे तुरंत निष्कासित कर दिया जाता है। कभी-कभी उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई भी की जाती है।
कीर स्टार्मर का इस्तीफा इस बात का सबूत है कि लोकतंत्र किसी व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि एक व्यवस्था के रूप में काम करता है। भारत को भी धीरे-धीरे इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा। संस्थाओं को मजबूत करना होगा, व्यक्तिगत पूजा से बचना होगा। तभी हमारा लोकतंत्र वास्तव में परिपक्व होगा और नेता विरोध को गद्दारी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार माना जाएगा।




