चीनी आयात को मंजूरी, केजरीवाल का बड़ा बयान
भारत में चीनी की किल्लत को लेकर केजरीवाल का बयान। इंडियन शुगर एसोसिएशन ने गन्ने की पेराई जल्दी शुरू करने की घोषणा की।
चीनी आयात को मिली मंजूरी, देश में हलचल
देश की चीनी की कमी को लेकर बहुत समय से चिंताएं जताई जा रही थीं। भारत सरकार ने इसी समस्या से निपटने के लिए चीन से चीनी के आयात को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद से ही देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर अपना बयान दिया है और कहा है कि चीनी की समस्या को हल करने का तरीका बिल्कुल अलग है।
अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार को चीन से चीनी मंगवाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अपने बयान में साफ किया कि भारत के पास पर्याप्त गन्ना उगाने की क्षमता है और हमारे किसान साल भर गन्ने की खेती करते हैं। केजरीवाल का मानना है कि जो गन्ना मिल रहा है उससे ही ईथेनॉल बना दिया गया है, जिससे चीनी की कमी हो गई है। वह कहते हैं कि अगर हम अपनी नीति को सही तरीके से अपनाएं तो किसी भी आयात की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दिल्ली के मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद एक बार फिर से ईथेनॉल की नीति पर सवाल उठे हैं। सरकार की ओर से ईथेनॉल बनाने को लेकर जो प्रोत्साहन दिया जा रहा है, उसका सीधा असर चीनी के उत्पादन पर पड़ रहा है। केजरीवाल का कहना है कि यह एक गलत नीति है और इसी से देश में चीनी की कमी देखने को मिल रही है।
इंडियन शुगर एसोसिएशन का महत्वपूर्ण बयान
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने भारत में चीनी की किल्लत का इनकार किया है। एसोसिएशन के अनुसार आने वाले चीनी सीजन में गन्ने की पेराई सामान्य समय से दस से पंद्रह दिन पहले शुरू हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि नई चीनी घरेलू बाजार में पहले ही पहुंच जाएगी और कीमतों पर भी नियंत्रण रहेगा।
एसोसिएशन का कहना है कि गन्ने की बेहतर फसल और समय पर पेराई शुरू करने से चीनी की आपूर्ति में कोई कमी नहीं आएगी। भारत के चीनी उद्योग ने हमेशा से ही इस बात को स्पष्ट किया है कि अगर सही व्यवस्था की जाए तो देश में चीनी की कमी कभी नहीं होगी। एसोसिएशन के अधिकारियों का मानना है कि चीन से चीनी का आयात बिल्कुल गलत फैसला है।
एसोसिएशन के प्रवक्ता ने बताया कि इस बार गन्ने की फसल भी पिछली बार की तुलना में बेहतर है और किसान भी इस बार ज्यादा गन्ना लगाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। नई पेराई शुरू होते ही नई चीनी बाजार में आ जाएगी और भारत के आम आदमी को कोई समस्या नहीं होगी। इस बयान से लगता है कि भारतीय चीनी उद्योग सरकार के फैसले से सहमत नहीं है।
ईथेनॉल नीति और चीनी उत्पादन में संबंध
भारत सरकार ने हरित ईंधन के प्रचार के लिए ईथेनॉल बनाने को बढ़ावा दिया है। इसके लिए सरकार ने गन्ने से बने शुगर को ईथेनॉल बनाने की छूट दी है। इससे कई चीनी मिलें अब अपने आधे गन्ने का उपयोग ईथेनॉल बनाने में कर रही हैं। यह नीति पर्यावरण के लिए तो अच्छी है, लेकिन इससे घरेलू चीनी की आपूर्ति में कमी आ रही है।
अरविंद केजरीवाल ने अपने बयान में इसी मुद्दे को उजागर किया है। वे कहते हैं कि सरकार को ईथेनॉल और चीनी के बीच संतुलन बनाना चाहिए। अगर सभी गन्ना ईथेनॉल बनाने में लगा दिया जाए तो चीनी की कमी तो होगी ही। इसलिए केजरीवाल का मानना है कि चीनी के आयात से पहले इस नीति को दोबारा देखना चाहिए था।
भारतीय किसान भी इस समस्या में फंसे हुए हैं। उन्हें नहीं पता कि वे गन्ना लगाएं या नहीं, क्योंकि कभी चीनी मिलें उन्हें ईथेनॉल के लिए गन्ना खरीद रही हैं तो कभी चीनी के लिए। ऐसे में किसानों को स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं मिल रहे हैं।
भारतीय बाजार और आम उपभोक्ता
भारत में चीनी एक आवश्यक चीज है। रसोई में प्रतिदिन चीनी का उपयोग होता है। जब देश में चीनी की कमी होती है तो बाजार में कीमतें बढ़ जाती हैं और आम आदमी को परेशानी होती है। इसी समस्या से निपटने के लिए सरकार ने चीन से चीनी का आयात किया है। लेकिन इंडियन शुगर एसोसिएशन का कहना है कि ऐसी कोई जरूरत नहीं थी।
अगर एसोसिएशन की बातें सच हैं और नए सीजन में गन्ने की पेराई समय पर हो जाए, तो आने वाले महीनों में चीनी की कीमतें सामान्य हो जाएंगी। लेकिन अगर ईथेनॉल बनाने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा तो भारत को हर बार विदेश से चीनी मंगवानी पड़ सकती है।
देश के किसानों की आय बढ़ाने के लिए भी सही नीति बनानी जरूरी है। अगर सरकार एक ओर किसानों को गन्ना लगाने के लिए प्रोत्साहन दे रही है, तो दूसरी ओर उसी गन्ने को ईथेनॉल में बदल दिया जा रहा है। इससे किसानों को सही कीमत नहीं मिल पाती है।
अंत में कहा जा सकता है कि भारत में चीनी की समस्या केवल उत्पादन की नहीं, बल्कि नीति निर्माण में भी है। अगर सरकार सही तरीके से चीनी और ईथेनॉल के उत्पादन को संतुलित करे, तो चीन से चीनी मंगवाने की कोई जरूरत नहीं रहेगी। इंडियन शुगर एसोसिएशन ने यह दिखाया है कि भारत के पास चीनी को आत्मनिर्भर बनाने की क्षमता है। अब सरकार को इसी दिशा में काम करना चाहिए।




