कांग्रेस सत्ता के बिना छटपटा रही: सुधांशु त्रिवेदी
अमर उजाला के प्रसिद्ध पॉडकास्ट 'अनम्यूट भारत' में भाजपा के वरिष्ठ सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने देश की राजनीति, विदेश नीति, विज्ञान-अध्यात्म और रोजगार के मुद्दों पर अपने विचार रखे। इस चर्चा में उन्होंने कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक स्थिति को लेकर कड़ी आलोचना की। त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस सत्ता के बिना उसी तरह छटपटा रही है जैसे पानी के बिना मछली। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए भाषा की गरिमा को ताक पर रख देते हैं।
डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने पॉडकास्ट के दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया। उन्होंने पूछा कि जो तथाकथित अधिकारवादी और सेक्युलरवादी नेता सबरीमाला के मुद्दे पर बेहद आक्रामक रुख अपनाते हैं, वे तीन तलाक और हिजाब जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मौन क्यों साध लेते हैं। यह सवाल भारतीय राजनीति की दोहरी नीति को उजागर करता है। त्रिवेदी का यह विचार उन राजनेताओं की विचारधारा और राजनीतिक स्वार्थों के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है।
कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति पर त्रिवेदी की आलोचना
डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने अपने विचारों में कहा कि कांग्रेस पार्टी बिना सत्ता के अपनी भूमिका को समझ नहीं पा रही है। उन्होंने इसे एक मजबूत उदाहरण से समझाया कि जैसे पानी के बिना मछली का कोई मतलब नहीं रह जाता, उसी तरह सत्ता के बिना कांग्रेस पार्टी अपनी प्रासंगिकता खो रही है। यह सवाल भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। भारत में लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व रहा, लेकिन पिछले दशक में भाजपा के उदय ने राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है।
त्रिवेदी के अनुसार, कांग्रेस का विरोध करने की नीति उसके लिए विनाशकारी साबित हुई है। पार्टी को अपनी सकारात्मक एजेंडा और विकास संबंधी नीतियों पर फोकस करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीति केवल सत्ता पाने के लिए नहीं, बल्कि देश के विकास और जनता की भलाई के लिए होनी चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में कई राजनीतिक दल अपनी ही राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में अंधे हो गए हैं।
भाषा की गरिमा का सवाल और राजनीतिक दोहराई
डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने अपने विचारों में एक और महत्वपूर्ण पहलू उजागर किया। उन्होंने कहा कि भारतीय राजनीति में कुछ नेता अपनी राजनीतिक स्वार्थों के लिए भाषा की गरिमा को नीचा दिखाते हैं। इसका मतलब यह है कि राजनेताओं द्वारा अपशब्दों का प्रयोग, अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल, और सार्वजनिक मंचों पर अमर्यादित व्यवहार दिखाई देता है। यह लोकतंत्र के मूल्यों के विरुद्ध है।
त्रिवेदी के अनुसार, भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र है जहां हमेशा से भाषा की शुद्धता और गरिमा को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। लेकिन आजकल की राजनीति में भाषा का दुरुपयोग बढ़ता जा रहा है। राजनेताओं को अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए और सभ्य राजनीतिक विमर्श को बढ़ावा देना चाहिए। जनता को भी ऐसे नेताओं का समर्थन नहीं करना चाहिए जो असभ्य भाषा का प्रयोग करते हैं।
धार्मिक मुद्दों पर दोहरी नीति की आलोचना
डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने अपने पॉडकास्ट में सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जो राजनेता सबरीमाला के मुद्दे पर इतने आक्रामक क्यों होते हैं, लेकिन तीन तलाक और हिजाब जैसे सवालों पर मौन क्यों साध लेते हैं। यह सवाल भारतीय राजनीति में धार्मिक मुद्दों पर दोहरी नीति को उजागर करता है।
सबरीमाला का मुद्दा हिंदू मंदिर से जुड़ा है, इसलिए कई राजनेताओं ने इसे एक महिला मुद्दा बनाकर प्रचार किया। लेकिन जब तीन तलाक और हिजाब जैसे मुद्दे आते हैं जो मुस्लिम समुदाय से जुड़े हैं, तो यही राजनेता चुप हो जाते हैं। यह सांप्रदायिक राजनीति का एक उदाहरण है। त्रिवेदी का मानना है कि राजनेताओं को सभी मुद्दों पर समान रुख अपनाना चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से संबंधित हो।
भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। महिलाओं के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, और सामाजिक न्याय सभी के लिए समान होने चाहिए। लेकिन जब राजनेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए इन मुद्दों को चुनिंदा तरीके से उठाते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।
डॉ. सुधांशु त्रिवेदी की ये बातें भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने जो सवाल उठाए हैं, वे सभी नागरिकों को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। भारत को एक मजबूत और सकारात्मक राजनीति की जरूरत है, न कि विरोध और सांप्रदायिकता की राजनीति की। आशा है कि भविष्य में भारतीय राजनेता इन बातों पर गंभीरता से विचार करेंगे और अधिक जिम्मेदारी से काम करेंगे।




