Gen-Z में करियर FOMO: सोशल मीडिया और प्रतिस्पर्धा
आज का डिजिटल युग ऐसा है जहां हर कोई अपनी सफलता का ढिंढोरा पीटना चाहता है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन और ट्विटर ने युवाओं के लिए अपने करियर को प्रदर्शित करने का मंच तो दिया है, लेकिन इसके साथ ही एक नई समस्या भी पैदा हुई है - करियर एफओएमओ यानी फीयर ऑफ मिसिंग आउट। जेनरेशन जेड के लिए यह मानसिक दबाव इतना गंभीर हो गया है कि वे अपनी सफलता के बजाय दूसरों की असफलता को देखकर ज्यादा खुश होने लगे हैं।
पहले जहां सोशल मीडिया पर केवल छुट्टियों की तस्वीरें, जिम की सेल्फी और पार्टी के वीडियो साझा होते थे, वहीं अब हर दूसरा पोस्ट किसी के नए पद, प्रमोशन, नई कंपनी में जॉब या विदेश में नियुक्ति का होता है। लिंक्डइन पर तो यह 'प्रोफेशनल शोकेसिंग' इतनी अधिक हो गई है कि पढ़ने वाले युवा असल में अपने लक्ष्य पर ध्यान देने की जगह दूसरों की सफलता से जल उठते हैं। यह स्थिति गंभीर मानसिक समस्या बन गई है।
जेनरेशन जेड अर्थात 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए युवा सबसे पहले वो हैं जो पूरी तरह से डिजिटल दुनिया में बड़े हुए हैं। उनके लिए सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि जीवन जीने का तरीका बन गया है। अपनी हर उपलब्धि को तुरंत शेयर करना, लाइक और कमेंट का इंतज़ार करना, और दूसरों की पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया दिखाना - यह सब इतना सामान्य हो गया है कि इसके बिना कोई भी घटना अधूरी लगती है।
लेकिन इस प्रक्रिया में एक नकारात्मक पहलू यह भी सामने आया है कि युवा अपने आप को दूसरों से कम महत्वपूर्ण समझने लगते हैं। जब कोई सहपाठी या सहकर्मी किसी बड़ी कंपनी में जॉब पा जाता है, किसी विदेशी विश्वविद्यालय में प्रवेश पा जाता है, या किसी बड़े प्रमोशन की घोषणा करता है, तो दूसरे लोग जो अभी भी अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं, वे स्वयं को असफल समझने लगते हैं। यह करियर एफओएमओ का ही नतीजा है।
सोशल मीडिया पर 'फर्जी सफलता' का खेल
सबसे बड़ी समस्या यह है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली सफलता हमेशा वास्तविक नहीं होती। लोग अपने जीवन का सबसे सजा-संवरा संस्करण दिखाते हैं। एक युवा जो अपने बॉस से रोज़ सुनता है कि उसका प्रदर्शन ठीक नहीं है, सोशल मीडिया पर 'प्रमोशन' की घोषणा कर देता है जो किसी मामूली बढ़ोतरी तक सीमित हो सकती है। कोई अपनी नई नौकरी की बेहद सकारात्मक तस्वीर साझा करता है, लेकिन वास्तविकता में वह काम से भारी दबाव में हो सकता है। यह 'फर्जी दिखावट' युवाओं में असुरक्षा की भावना बढ़ाता है।
लिंक्डइन पर तो यह स्थिति और भी गंभीर है। यहां लोग अपने करियर को इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे कि हर दिन कोई न कोई नई सफलता मिल रही हो। 'मैं इस परियोजना का नेतृत्व किया', 'हमने इस क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया', 'मेरी टीम ने रिकॉर्ड तोड़ा' - ऐसी पोस्ट हर दिन सैकड़ों में आती हैं। जो युवा अभी अपना कार्य अनुभव बढ़ा रहे हैं या किसी मामूली पद पर हैं, उन्हें यह सब देखकर लगता है कि वे बहुत पीछे रह गए हैं।
करियर FOMO के मानसिक प्रभाव
नैदानिक मनोविज्ञानियों के अनुसार, करियर एफओएमओ से ग्रस्त युवाओं में चिंता, अवसाद और आत्मविश्वास की कमी देखी जा रही है। एक युवा जो अपने क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रहा हो, लेकिन सोशल मीडिया पर अपने समकालीनों को बेहतर करते देखता है, तो उसमें आत्म-संदेह पैदा होता है। यह मानसिक अवस्था उसके वास्तविक कार्य प्रदर्शन को भी प्रभावित करती है।
कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि जो युवा अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं, वे अधिक अकेलापन, असुरक्षा और असंतुष्टि महसूस करते हैं। करियर एफओएमओ की स्थिति में यह समस्या और तीव्र हो जाती है क्योंकि करियर और पेशेवर उन्नति एक ऐसा विषय है जो लगभग हर किसी को चिंतित रखता है। जब वह हर समय दूसरों की उन्नति देखता है, तो उसका अपना आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम होता जाता है।
करियर FOMO से बाहर निकलने के तरीके
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहली बात यह है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली सफलता को वास्तविकता के रूप में न लिया जाए। हर किसी का अपना समय है, अपना गति है और अपने लक्ष्य हैं। किसी और की तुलना में अपने आप को आंकना बिल्कुल गलत है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सोशल मीडिया का उपयोग सीमित किया जाए। अगर आप हर घंटे लिंक्डइन खोलते हैं और दूसरों की सफलता देखते हैं, तो आपको इस आदत को त्यागना चाहिए। सप्ताह में एक या दो बार सोशल मीडिया चेक करना पर्याप्त है। तीसरा, अपने वास्तविक लक्ष्यों पर ध्यान दें। आपको अपने लिए क्या करना है, इसे लिखकर रखें और उसी पर काम करें। चौथा, अपने आसपास के लोगों के साथ सकारात्मक संबंध बनाएं। ऐसे मित्र खोजें जो आपकी सफलता के लिए खुश हों, न कि जलन दिखाएं।
आज के समय में यह समझना बहुत जरूरी है कि सफलता एक प्रक्रिया है, एक गंतव्य नहीं। हर किसी का यह सफर अलग होता है। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली चमक को सच मानकर अपने मानसिक स्वास्थ्य को खतरे में डालना बिल्कुल गलत है। जेनरेशन जेड को यह सीखना चाहिए कि उन्हें अपने आप पर विश्वास करना है, अपने प्रयासों को जारी रखना है, और दूसरों की तुलना में अपने आप को मापना बंद करना है।




