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Friday, 05 June 2026
राजनीति

वोटर लिस्ट सफाई से राजनीतिक चक्रव्यूह

author
Komal
संवाददाता
📅 26 April 2026, 5:46 AM ⏱ 1 मिनट 👁 305 views
वोटर लिस्ट सफाई से राजनीतिक चक्रव्यूह
📷 aarpaarkhabar.com

सियासी चक्रव्यूह में आंकड़ों का इंद्रजाल

चुनाव लड़ना आसान नहीं होता, लेकिन जब चुनावों की तैयारी करनी हो तो सबसे महत्वपूर्ण काम होती है मतदाता सूची को सही रखना। पश्चिम बंगाल में हाल ही में जो कुछ घटा है, वह एक ऐसी घटना है जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। चुनाव आयोग की तरफ से की गई वोटर लिस्ट की सफाई ने एक ऐसी बहस को जन्म दिया है, जो केवल संख्याओं का खेल नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर चिंताएं भी हैं।

इस नए अंकगणित को समझने के लिए चौरंगी विधानसभा क्षेत्र सबसे सटीक उदाहरण है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में कुल 2,09,713 पंजीकृत मतदाता थे। उस समय मतदान का प्रतिशत 55.40 रहा था। लेकिन चुनाव आयोग की हालिया प्रशासनिक सफाई के बाद यहां एक अविश्वसनीय परिवर्तन देखने को मिला है। 83,364 मतदाता, जो कुल संख्या का लगभग 40 प्रतिशत था, सूची से बाहर कर दिया गया। अब मतदाताओं की संख्या घटकर मात्र 1,26,349 रह गई है। यह आंकड़ा अपने आप में एक बहुत बड़ी कहानी कहता है।

जब हम इन आंकड़ों को देखते हैं, तो सवाल उठता है कि आखिर ये 83,364 मतदाता कहां चले गए? क्या वे वास्तव में नकली थे? क्या वह मतदाता सूची में डुप्लीकेट नाम थे? या फिर किसी और कारण से उन्हें हटाया गया? ये सवाल केवल चौरंगी के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल में उठ रहे हैं।

राजनीतिक दलों की बयानबाजी और सच्चाई

त्रिणमूल कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही इस मुद्दे पर अपनी-अपनी दलील दे रहे हैं। एक तरफ सत्तापक्ष का मानना है कि यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसमें नकली और डुप्लीकेट मतदाताओं को निकाला गया है। दूसरी तरफ विपक्षी दल इसे एक राजनीतिक षड्यंत्र बता रहे हैं, जिसमें विरोधी दल के समर्थकों को वोटर लिस्ट से निकाला जा रहा है।

भारत के लोकतंत्र के लिए यह एक संवेदनशील मुद्दा है। मतदाता सूची तैयार करना, उसमें से नाम निकालना, नए नाम जोड़ना - ये सभी कार्य पारदर्शिता के साथ होने चाहिए। जब 40 प्रतिशत मतदाता एक ही क्षेत्र से गायब हो जाएं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह प्रक्रिया सही तरीके से की गई है या नहीं।

मैदान में जाकर जब हम लोगों से बात करते हैं, तो उनके चेहरों पर एक अलग तरह की चिंता दिखाई देती है। कई ऐसे लोग हैं जिन्हें लगता है कि उनका नाम गलती से निकाल दिया गया है। कुछ बुजुर्ग मतदाताओं का कहना है कि उन्होंने कभी अपना नाम हटवाने के लिए कोई आवेदन ही नहीं किया था। यह आम जनता की व्यथा है, जो सूचियों में खो गई है।

चुनावी प्रक्रिया पर असर और भविष्य की चिंताएं

इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि एक स्वस्थ मतदाता सूची का होना बहुत जरूरी है। नकली मतदाताओं को निकालना, डुप्लीकेट नामों को हटाना - यह सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए आवश्यक है। लेकिन जब यह सफाई इतने बड़े पैमाने पर होती है, तो सवाल उठता है कि क्या चुनाव आयोग की तरफ से पर्याप्त पारदर्शिता बनी रही है या नहीं।

भविष्य के चुनावों के बारे में सोचें। अगर 2026 के विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह की सफाई की जाती है, तो प्रत्येक क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है। इससे चुनाव की वैधता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। जब लोग अपने मतदान के अधिकार से वंचित महसूस करने लगें, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ने लगती हैं।

चौरंगी का यह उदाहरण केवल एक विधानसभा क्षेत्र की समस्या नहीं है। पूरे पश्चिम बंगाल में इसी तरह की परिस्थितियां बन रही हैं। कलकत्ता में कई अन्य क्षेत्रों में भी मतदाताओं की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह एक संकेत है कि चुनाव आयोग की सफाई प्रक्रिया में कोई न कोई खामी है, जिसे दूर किया जाना चाहिए।

जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की बातचीत से पता चलता है कि कई बार मतदाताओं को इस बात की जानकारी ही नहीं दी जाती कि उनके नाम सूची से क्यों निकाले जा रहे हैं। अपील की प्रक्रिया भी इतनी जटिल है कि आम आदमी समझ ही नहीं पाता कि उसे क्या करना चाहिए।

सियासी चक्रव्यूह में फंसे इन आंकड़ों का असली शिकार आम जनता है। चाहे त्रिणमूल कांग्रेस की जीत हो या भाजपा की, लेकिन यदि मतदाता सूची में ही विश्वास खो जाए, तो किसी की जीत का कोई मूल्य नहीं रहता। लोकतंत्र की सार्थकता तभी है, जब प्रत्येक नागरिक को अपने मतदान का अधिकार निर्विघ्न रूप से मिले। वोटर लिस्ट की सफाई का पूरा खेल पारदर्शी होना चाहिए, और जनता को इसमें भरोसा होना चाहिए। तभी तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपना सही अर्थ खोजेगी।