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Wednesday, 20 May 2026
विश्व

होर्मुज के बाहर तेल निर्यात: खाड़ी देशों की नई रणनीति

author
Komal
संवाददाता
📅 24 April 2026, 5:47 AM ⏱ 1 मिनट 👁 909 views
होर्मुज के बाहर तेल निर्यात: खाड़ी देशों की नई रणनीति
📷 aarpaarkhabar.com

होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट और उसका असर

पश्चिमी एशिया के भू-राजनीतिक तनाव ने होर्मुज जलडमरूमध्य को एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र बना दिया है। यह संकीर्ण जलमार्ग, जो ओमान की खाड़ी को फारस की खाड़ी से जोड़ता है, विश्व के लगभग 20-25 प्रतिशत तेल निर्यात का गलियारा है। पिछले कुछ वर्षों में इस इलाके में बढ़ते सैन्य तनाव, ड्रोन हमले, जहाजों की तोड़फोड़ और अन्य सुरक्षा चुनौतियों ने खाड़ी के तेल निर्यातक देशों को गहरी चिंता में डाल दिया है।

सऊदी अरब, इराक, ईरान, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश होर्मुज के माध्यम से अपने अधिकांश तेल का निर्यात करते हैं। लेकिन जब भी इस जलडमरूमध्य में कोई घटना घटती है, तो वैश्विक तेल की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं। अप्रैल 2024 में ईरान के हमलों और अक्टूबर 2023 में हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण वैश्विक बाजार में भारी उथल-पुथल देखी गई। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि खाड़ी देशों को होर्मुज पर अपनी निर्भरता कम करने की तत्काल आवश्यकता है।

इसी कारण से सऊदी अरब, यूएई और अन्य खाड़ी देश अपने तेल और प्राकृतिक गैस निर्यात के लिए वैकल्पिक रास्तों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। ये नए मार्ग न केवल सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि दीर्घकालीन आर्थिक स्थिरता के लिए भी आवश्यक हैं।

मौजूदा पाइपलाइन नेटवर्क और उनकी सीमाएं

खाड़ी देशों के पास पहले से ही कुछ वैकल्पिक पाइपलाइन विकल्प मौजूद हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित है। सऊदी अरब के पास 'इस्पू तेल पाइपलाइन' है, जो फारस की खाड़ी से सीधे अरब सागर तक जाती है। इसी तरह, यूएई के पास भी कुछ समुद्री पाइपलाइन विकल्प हैं। लेकिन ये सभी पाइपलाइनें होर्मुज के संकट को पूरी तरह से दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

वर्तमान में होर्मुज से निकलने वाले तेल की दैनिक मात्रा लगभग 21-22 मिलियन बैरल प्रतिदिन है। मौजूदा वैकल्पिक पाइपलाइनें इस क्षमता का मात्र 10-15 प्रतिशत ही संभाल सकती हैं। इसका मतलब है कि खाड़ी देशों को अभी भी होर्मुज पर 85-90 प्रतिशत निर्भरता है।

राजस्व और राजनीतिक कारणों से भी नई पाइपलाइनें बनाना महत्वपूर्ण है। नई पाइपलाइनें सीधे भारत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बड़े उपभोक्ता देशों तक तेल पहुंचा सकती हैं, जिससे परिवहन लागत में कमी आएगी और लाभमार्जन बेहतर होगा। इसके अलावा, यह खाड़ी देशों को अपनी आपूर्ति श्रृंखला पर अधिक नियंत्रण देगा।

नए मार्गों का विकास और भविष्य की रणनीति

खाड़ी देश अब नई पाइपलाइनें बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। सऊदी अरब ने अपनी 'इस्पू तेल पाइपलाइन' को विस्तारित करने का विचार व्यक्त किया है। यूएई तीन नई पाइपलाइन परियोजनाओं पर गौर कर रहा है, जो अलग-अलग दिशाओं में जाएंगी। ईरान भी अपने तेल निर्यात के लिए नए मार्ग विकसित करने में रुचि दिखा रहा है।

इराक, जो मेसोपोटामिया के तेल से भरे क्षेत्र में स्थित है, तुर्की की ओर एक नई पाइपलाइन बनाने पर विचार कर रहा है। यह तुर्की-इराक पाइपलाइन, भूमध्य सागर तक पहुंच प्रदान करेगी, जहां से यूरोप और अन्य बाजारों तक सीधी पहुंच संभव होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि ये नई पाइपलाइनें न केवल तेल, बल्कि प्राकृतिक गैस के लिए भी महत्वपूर्ण होंगी। विश्व में प्राकृतिक गैस की मांग तेजी से बढ़ रही है, खासकर यूरोप में, जहां रूसी गैस पर निर्भरता कम करने का दबाव है। खाड़ी देशों के पास दुनिया की कुल प्राकृतिक गैस का लगभग 38 प्रतिशत भंडार है। नई पाइपलाइनें इन भंडारों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने का सबसे कुशल तरीका होंगी।

लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) विकल्प भी खाड़ी देशों के लिए महत्वपूर्ण है। यूएई और कतर पहले से ही बड़े एलएनजी निर्यातक हैं, लेकिन लिक्विफिकेशन और ट्रांसपोर्ट की लागत काफी अधिक है। पाइपलाइन विकल्प अधिक किफायती साबित होंगी।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले दशक में खाड़ी देश कम से कम 5-7 मिलियन बैरल प्रतिदिन की क्षमता वाली नई पाइपलाइनें बना सकते हैं। यह होर्मुज पर निर्भरता को लगभग 30-35 प्रतिशत तक कम कर देगा।

लेकिन ये परियोजनाएं बहुत महंगी और जटिल हैं। एक नई अंतरराष्ट्रीय पाइपलाइन बनाने में 10-15 अरब डॉलर तक खर्च आ सकता है। इसके अलावा, पड़ोसी देशों से अनुमति, भू-राजनीतिक समझौते और तकनीकी चुनौतियां भी बड़ी बाधाएं हैं।

फिर भी, खाड़ी देशों की दृढ़ इच्छा और अंतर्राष्ट्रिक समर्थन इन परियोजनाओं को संभव बना सकता है। आने वाले वर्षों में इन नई पाइपलाइनों के निर्माण से न केवल खाड़ी देशों की आर्थिक सुरक्षा बेहतर होगी, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी।