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Saturday, 06 June 2026
व्यापार

गल्फ देशों में भारतीय रुपये का इतिहास और बोलबाला

author
Komal
संवाददाता
📅 01 April 2026, 9:48 AM ⏱ 1 मिनट 👁 580 views
गल्फ देशों में भारतीय रुपये का इतिहास और बोलबाला
📷 Aaj Tak

जब गल्फ देशों में भारतीय रुपया था राजा - जानें इस दिलचस्प इतिहास की कहानी

आज जब हम गल्फ देशों की बात करते हैं तो हमारे जहन में तेल, पेट्रोडॉलर और मजबूत अर्थव्यवस्था का चित्र उभरता है। लेकिन शायद ही आपको पता हो कि कभी इन्हीं गल्फ देशों में भारतीय रुपये का जमाना था। जी हां, एक समय था जब कुवैत, बहरीन, कतर, UAE और ओमान जैसे देशों में भारतीय रुपया आधिकारिक मुद्रा के रूप में इस्तेमाल होता था।

यह कहानी सिर्फ मुद्रा की नहीं, बल्कि भारत और गल्फ देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक और आर्थिक रिश्तों की है। आइए जानते हैं कि कैसे भारतीय रुपया इन देशों का आर्थिक आधार बना और फिर क्यों इसका दौर समाप्त हो गया।

गल्फ देशों में भारतीय रुपये का इतिहास और बोलबाला

ब्रिटिश राज का प्रभाव और गल्फ रुपया

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान, गल्फ क्षेत्र ब्रिटिश प्रभाव क्षेत्र में आता था। 1959 में भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से 'गल्फ रुपया' नाम की एक विशेष मुद्रा जारी की गई थी। यह मुद्रा विशेष रूप से कुवैत, बहरीन, कतर, UAE (तत्कालीन ट्रूशियल स्टेट्स) और ओमान के लिए बनाई गई थी।

गल्फ रुपया भारतीय रुपये के बराबर मूल्य रखता था और इसका डिजाइन भी भारतीय रुपये से मिलता-जुलता था। इस पर अरबी और अंग्रेजी में लिखा होता था। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी क्योंकि गल्फ देशों के साथ भारत के मजबूत व्यापारिक संबंध थे।

व्यापारिक संबंधों की मजबूत नींव

भारत और गल्फ देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते सदियों पुराने हैं। मोती, मसाले, कपड़ा और अन्य सामानों का कारोबार इन दोनों क्षेत्रों के बीच फलता-फूलता रहा। भारतीय व्यापारी इन देशों में बसे हुए थे और स्थानीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

उस समय तेल की खोज नहीं हुई थी, इसलिए इन देशों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः मोती, मछली पकड़ने और छोटे-मोटे व्यापार पर आधारित थी। भारतीय रुपया इन सभी लेन-देन का आधार था।

| गल्फ देश | गल्फ रुपया का प्रयोग काल | वर्तमान मुद्रा |

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कुवैत1961 तककुवैती दीनार
बहरीन1965 तकबहरीनी दीनार
कतर1966 तककतरी रियाल
UAE1966 तकदिरहम
ओमान1970 तकओमानी रियाल

तेल की खोज और बदलती परिस्थितियां

1960 के दशक में गल्फ देशों में बड़े पैमाने पर तेल की खोज हुई। इससे इन देशों की आर्थिक स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव आया। तेल की बिक्री से मिलने वाली भारी आय ने इन देशों को आर्थिक रूप से मजबूत बना दिया।

इस बदलाव के साथ ही इन देशों ने अपनी स्वतंत्र मुद्रा की मांग शुरू की। उन्हें लगा कि अब उन्हें भारतीय रुपये पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। एक-एक करके सभी गल्फ देशों ने अपनी राष्ट्रीय मुद्राएं शुरू कीं।

कुवैत सबसे पहले 1961 में कुवैती दीनार के साथ आया, जबकि ओमान सबसे अंत में 1970 में ओमानी रियाल लेकर आया।

आज भी जीवंत हैं ऐतिहासिक संबंध

भले ही आज गल्फ देशों में भारतीय रुपया नहीं चलता, लेकिन भारत और इन देशों के बीच आर्थिक रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं। आज लाखों भारतीय इन देशों में काम करते हैं और अरबों डॉलर की रकम भारत भेजते हैं।

गल्फ देशों से भारत को तेल मिलता है, जबकि भारत से वहां खाद्य सामग्री, कपड़ा और अन्य उत्पाद जाते हैं। यह ऐतिहासिक संबंध आज भी दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद है।

गल्फ रुपया की कहानी भारत और गल्फ देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक संबंधों का प्रमाण है। यह दिखाता है कि कैसे आर्थिक और राजनीतिक बदलाव मुद्रा नीतियों को प्रभावित करते हैं।