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Saturday, 04 July 2026
विश्व

ईरान को 300 बिलियन डॉलर: खाड़ी देशों की चिंता

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Komal
संवाददाता
📅 23 June 2026, 7:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
ईरान को 300 बिलियन डॉलर: खाड़ी देशों की चिंता
📷 aarpaarkhabar.com

वाशिंगटन और तेहरान के बीच होने वाले संभावित समझौते को लेकर पूरा मध्य पूर्व क्षेत्र तनाव में है। अमेरिका ईरान को तीन सौ अरब डॉलर का विशाल आर्थिक और पुनर्निर्माण पैकेज देने की योजना बना रहा है। यह फैसला खाड़ी के तेल समृद्ध देशों को गहरी चिंता में डाल गया है। सभी का सवाल है कि आखिरकार इस भारी-भरकम रकम को कौन उपलब्ध कराएगा? अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो इसी समस्या को हल करने के लिए मध्य पूर्व का दौरा कर रहे हैं ताकि वह क्षेत्रीय साझेदारों को सांत्वना दे सकें।

यह पूरी स्थिति बेहद नाजुक और जटिल है। ईरान को इतने बड़े आर्थिक पैकेज का मतलब है कि वह अपनी सैन्य शक्ति को और मजबूत कर सकता है। उसके क्षेत्रीय प्रभाव में भारी इजाफा हो सकता है। यह बात सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और अन्य खाड़ी देशों के लिए अत्यंत घातक साबित हो सकती है। इन देशों को लगता है कि अमेरिका उन्हें नजरअंदाज कर रहा है। उनका विश्वास टूट रहा है कि अमेरिका उनका सच्चा सहयोगी है।

खाड़ी के देशों का पहला सवाल यह है कि ईरान को इतनी बड़ी रकम कौन देगा? अगर यह पैसा सऊदी अरब को देना होता तो शायद वह राजी हो जाता। लेकिन ईरान को देना पूरी तरह से भिन्न मामला है। खाड़ी देश समझते हैं कि अगर ईरान के पास ज्यादा पैसा आ गया तो वह हूती, हिजबुल्लाह और अन्य उग्रवादी संगठनों को और ज्यादा धन मुहैया कराएगा। इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी। सीरिया, लेबनान और यमन में ईरान का प्रभाव और बढ़ जाएगा।

अमेरिकी नीति में क्यों आया यह बदलाव?

ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु समझौते से यूएस को निकाल दिया था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। अमेरिका को लगता है कि ईरान के साथ एक नए समझौते के जरिए क्षेत्र में शांति स्थापित की जा सकती है। अमेरिका सोच रहा है कि अगर ईरान को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जाए तो वह अपना आक्रामक रवैया छोड़ देगा। लेकिन यह सोच बिल्कुल गलत है और खाड़ी देश इसे समझते हैं।

मार्को रूबियो का यह दौरा असल में इसी गलतफहमी को दूर करने के लिए है। रूबियो को खाड़ी देशों को समझाना है कि अमेरिका उनके हितों की रक्षा नहीं भूला है। लेकिन सवाल यह है कि जब अमेरिका ईरान को इतना बड़ा आर्थिक पैकेज दे रहा है तो वह खाड़ी देशों के लिए क्या करेगा? क्या सऊदी अरब को भी तीन सौ अरब डॉलर मिलेंगे? बिल्कुल नहीं। इसीलिए खाड़ी के देश चिंतित हैं।

भारत भी इस मामले में क्यों सचेत है?

भारत के विदेश मंत्री को भी इस बाबत कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिए जाने हैं। भारत की अपनी चिंताएं हैं। भारत को ईरान से तेल खरीदना है। ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह पर निवेश करना है। लेकिन अगर खाड़ी देश नाराज हो गए तो भारत की पूरी नीति असफल हो जाएगी। भारत की तरफ से भी इस घोषणा के बाद कोई सकारात्मक बयान नहीं आया है। भारत यह देख रहा है कि अमेरिकी विदेश मंत्री क्या जवाब दे पाते हैं।

दरअसल, यह पूरा मामला बहुत संवेदनशील है। ईरान को इतनी बड़ी रकम देना मतलब पूरे क्षेत्र में एक नया खेल शुरू करना है। इससे पहले सऊदी अरब और ईरान की जो दुश्मनी थी, वह और बढ़ सकती है। यमन का संकट और गहरा हो सकता है। सीरिया की समस्या जटिल हो सकती है। इज़रायल को भी इस बात की चिंता है कि ईरान की सैन्य शक्ति बढ़ने से उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

रूबियो का दौरा और जवाब देने की चुनौती

मार्को रूबियो को जो जवाब देने हैं, वे बहुत कठिन हैं। पहला, उन्हें खाड़ी देशों को यह समझाना है कि अमेरिका उनके साथ है। दूसरा, उन्हें ईरान को पैसा देने का तर्क समझाना है। तीसरा, उन्हें यह साफ करना है कि यह पैसा कहां से आएगा। अगर यह पैसा खाड़ी देशों को ही देना है तो फिर भी सवाल का जवाब नहीं मिलेगा कि ईरान को सीधे क्यों दिया जा रहा है।

इसी बीच, भारत को भी अपनी रणनीति तय करनी होगी। भारत को खाड़ी देशों के साथ संबंध बनाए रखने हैं और साथ ही ईरान के साथ भी अच्छे संबंध रखने हैं। यह एक बेहद नाजुक संतुलन है। विदेश मंत्री को यह समझाना होगा कि भारत किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि सभी के साथ मित्रता चाहता है।

अंत में, यह कहा जा सकता है कि ईरान को तीन सौ अरब डॉलर का पैकेज देना एक विस्फोटक फैसला है। इसके परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं। मार्को रूबियो को खाड़ी की यात्रा में बहुत सावधानी से काम लेना होगा। उन्हें सभी को समझाना होगा कि अमेरिका की नीति क्या है और वह सभी की सुरक्षा और हितों का ध्यान रख रहा है। लेकिन यह काम बहुत मुश्किल लगता है। क्योंकि जब आप किसी को बहुत बड़ा तोहफा दे दें तो दूसरे को समझाना कि तुम हमारे लिए भी महत्वपूर्ण हो, यह बहुत मुश्किल काम होता है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि रूबियो के दौरे के बाद मध्य पूर्व में क्या बदलाव आते हैं।