ईरान ने दूसरी वार्ता से किया इनकार, ट्रंप की धमकी
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संकट में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। इस्लामाबाद में होने वाली दूसरे दौर की शांति वार्ता में ईरान की शिरकत न होने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को झटका लगा है। तेहरान की ओर से स्पष्ट कर दिया गया है कि वह इस वार्ता में भाग नहीं लेगा। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर काफी कड़ी टिप्पणी की है और तबाही की धमकी दी है।
यह घटनाक्रम मध्य पूर्व में मौजूद तनाव को और भी गहरा कर देगा। दोनों देशों के बीच यह विवाद केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की सुरक्षा और आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाला है। ईरान के इस फैसले से पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशों पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
ईरान ने क्यों लिया वार्ता से दूरी
तेहरान की ओर से कहा गया है कि अमेरिका पहले अपनी शर्तें बदले, तब ही बातचीत संभव है। ईरान का मानना है कि पिछली वार्ता में अमेरिका ने कोई सकारात्मक रुख नहीं दिखाया। इस्लामिक रिपब्लिक ने यह भी कहा कि जब तक इजराइल के खिलाफ कार्रवाई की गारंटी नहीं दी जाएगी, तब तक बातचीत बेमानी है।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत ईरान को अपने अधिकारों की सुरक्षा करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्य पूर्व में स्थायी शांति तभी आ सकती है, जब इजराइल के क्षेत्रीय आक्रमण को रोका जाए। तेहरान का कहना है कि अगर अमेरिका सच में शांति चाहता है, तो उसे इजराइल पर दबाव बनाना चाहिए।
ईरान के इस निर्णय के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि पिछली बातचीत में कोई ठोस नतीजे नहीं निकले। दोनों पक्षों के बीच मतभेद इतने गहरे हैं कि सतही बातचीत से कुछ हल नहीं होने वाला। ईरान को लगता है कि अमेरिका केवल समय बर्बाद करना चाहता है, जबकि इजराइल को मुक्त हाथ देता है।
ट्रंप की धमकीपूर्ण टिप्पणियां
डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को व्हाइट हाउस में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि अगर ईरान सही रास्ते पर नहीं आता, तो अमेरिका उसे बर्बाद कर देगा। ट्रंप की यह टिप्पणी काफी कठोर और खतरनाक साबित हो सकती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका के पास हर तरह की सैन्य क्षमता है और वह इसका इस्तेमाल करने से नहीं हिचकिचाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि ईरान को समझ जाना चाहिए कि अब दौर बदल गया है। पहले की तरह अब वह मनमानी नहीं कर सकता। ट्रंप का यह रुख साफ करता है कि अमेरिका ईरान के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहता, बल्कि अपनी मर्जी मनवाना चाहता है।
इस टिप्पणी से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की ऐसी कड़ी भाषा न केवल शांति वार्ता को नुकसान पहुंचाएगी, बल्कि मध्य पूर्व में एक और बड़े सैन्य संघर्ष का खतरा बढ़ा सकती है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने भी इस स्थिति पर अपनी चिंता जताई है।
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की इस्लामाबाद यात्रा
इसके बावजूद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल सोमवार को इस्लामाबाद पहुंचा। अमेरिका का मानना है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता से अभी भी कोई रास्ता निकल सकता है। वेंस ने तत्काल पाकिस्तानी नेतृत्व से मुलाकात की और स्थिति को समझने की कोशिश की।
पाकिस्तान ने अपनी मध्यस्थता की भूमिका को बनाए रखने की कोशिश की है। इस्लामाबाद चाहता है कि किसी भी तरह दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी रहे। पाकिस्तानी सरकार समझती है कि अगर यह संघर्ष तीसरे विश्व युद्ध का रूप ले ले, तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान दक्षिण एशिया को होगा।
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ईरान को दोबारा बातचीत के लिए राजी करने के लिए पाकिस्तान की मदद लेना चाहता है। लेकिन तेहरान के इस इनकार के बाद यह काम काफी मुश्किल हो गया है। पाकिस्तान ने ईरानी नेतृत्व को संदेश भी भेजे हैं, लेकिन अभी तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं आया है।
वर्तमान परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच इस टकराव से पूरी दुनिया प्रभावित हो सकती है। तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, व्यापार बाधित हो सकता है, और सबसे बड़ा खतरा एक विश्वव्यापी संकट का है। इसलिए सभी पक्षों को संतुलित और समझदारी से काम लेना चाहिए। शांति के लिए संवाद ही एकमात्र रास्ता है। बातचीत की मेज पर सभी को अपने अहंकार को त्यागकर बैठना होगा। अगर यह नहीं हुआ, तो इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते हैं।




