ब्रिक्स बैठक में ईरान-यूएई विदेश मंत्रियों का विवाद
नई दिल्ली में चल रही ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में एक तरफ आशा की किरण दिख रही थी, तो दूसरी तरफ पश्चिम एशिया का तनाव पूरी बैठक को गर्माता नजर आ रहा था। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रियों के बीच हुई जबरदस्त बहस पूरी अंतरराष्ट्रीय राजनीति को झकझोर गई है। यह घटना भारत की ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान एक महत्वपूर्ण क्षण है, जहां विश्व की बड़ी शक्तियां एक मंच पर बैठी हैं।
बैठक के पहले दिन जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री खलीफा शहीन अल मरार ने एक दूसरे के सामने अपने विचार रखे, तो बहस इतनी तीव्र हो गई कि कई पल के लिए हॉल में एक भारी तनाव का माहौल बना गया। यूएई के विदेश मंत्री ने ईरान पर सीधे तौर पर पड़ोसी देशों पर हमले का आरोप लगाया और कहा कि ईरान की आक्रामक नीति पूरे क्षेत्र में अस्थिरता ला रही है।
ईरान का पलटवार और तीव्र जवाब
ईरान के विदेश मंत्री ने यूएई के आरोपों का तीव्र जवाब देते हुए कहा कि यूएई स्वयं पश्चिमी शक्तियों के साथ मिलकर क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर रहा है। अराघची ने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिका को अपनी जमीन दी है, जिससे इस क्षेत्र में सैन्य हमले संभव हो रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यूएई की यह नीति न केवल ईरान के लिए, बल्कि पूरे मध्य पूर्व के लिए खतरनाक है। ईरान के इस कड़े रुख ने मामले को और भी गर्म कर दिया।
इस बहस में भारत सहित अन्य ब्रिक्स देशों ने संतुलित रुख अपनाया। भारत के विदेश मंत्री ने कहा कि सभी देशों को संवाद के माध्यम से अपने मतभेद को सुलझाना चाहिए। भारत की यह स्थिति स्वाभाविक है, क्योंकि भारत ईरान और खाड़ी देशों दोनों के साथ अपने संबंध बनाए रखना चाहता है। इसके साथ ही, भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी इस क्षेत्र पर निर्भर करती है।
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव
पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया का राजनीतिक माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया है। इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष के साथ ही यमन, सीरिया और इराक में भी विभिन्न समूह सक्रिय हैं। इन सभी समूहों के पीछे किसी न किसी बड़ी शक्ति का हाथ है। ईरान को लेकर यूएई की चिंताएं केवल सैद्धांतिक नहीं हैं। खाड़ी सहयोग परिषद के देश लंबे समय से ईरान की प्रभुत्व की नीति से चिंतित हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विवाद ब्रिक्स की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका को भी प्रदर्शित करता है। ब्रिक्स एक विविध संगठन है जहां विभिन्न भू-राजनीतिक हित आते हैं। ईरान और यूएई दोनों ही विभिन्न ब्रिक्स गुटों के करीब हैं, जिससे संगठन के भीतर गतिशील संतुलन बना रहता है। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान इस तरह की बहसें आम हो सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का खेल
यूएई ने अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है और खाड़ी क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। दूसरी ओर, ईरान अपनी क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इसी खेल में भारत, रूस और चीन जैसी देशें सावधानी से चलते हैं, क्योंकि उनके पास इस क्षेत्र में अपने हित हैं।
भारत के लिए यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान कार्यसूची तय कर रहा है। इस बहस से भारत की राजनयिक कुशलता का परीक्षण हो रहा है। भारत को ऐसे मंचों पर सभी देशों को विश्वास में लेते हुए संवाद को प्रोत्साहित करना होगा।
इन विवादों के बावजूद, ब्रिक्स की बैठक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें विश्व के प्रमुख उभरते बाजारों के प्रतिनिधि शामिल हैं। यहां की बहस विश्व राजनीति को नई दिशा दे सकती है। हालांकि, ईरान-यूएई के बीच का यह विवाद दर्शाता है कि ब्रिक्स भी संयुक्त राष्ट्र की तरह एक मंच है जहां विभिन्न दृष्टिकोण सामने आते हैं।
अगले दिनों में यह देखना रोचक होगा कि कैसे भारत इन विवादों को संभालता है और क्या ब्रिक्स के सदस्य देश पश्चिम एशिया की समस्याओं पर एक समन्वित रुख ले सकते हैं। भारत की राजनयिक कार्यक्षमता इस चुनौती के सामने अपनी परीक्षा दे रही है।




