🔴 ब्रेकिंग
मनप्रीत बादल भाजपा उपाध्यक्ष: मालवा राजनीति में बदलाव|मारुति फ्रॉन्क्स 28KM माइलेज, 2 लाख एक्सपोर्ट|वंदे मातरम विवाद: खरगे का जवाब और पूरा सच|हाफिज सईद के गुर्गे का दावा: LeT ने 10 हजार आतंकी भेजे|क्या डियो से ब्रेस्ट कैंसर होता है? जानें सच|विनोद तावड़े की कमबैक स्टोरी: साइडलाइन से यूपी की कमान तक|स्मृति ईरानी की राजनीतिक यात्रा: ड्रामा और ट्विस्ट|Jio Prime 300 रुपये में 1 साल, सभी सवालों के जवाब|बालों पर 25 हजार मासिक खर्च करने वाली महिला की कहानी|पहली इलेक्ट्रिक फेरारी Luce ₹383 करोड़ में बिकी|मनप्रीत बादल भाजपा उपाध्यक्ष: मालवा राजनीति में बदलाव|मारुति फ्रॉन्क्स 28KM माइलेज, 2 लाख एक्सपोर्ट|वंदे मातरम विवाद: खरगे का जवाब और पूरा सच|हाफिज सईद के गुर्गे का दावा: LeT ने 10 हजार आतंकी भेजे|क्या डियो से ब्रेस्ट कैंसर होता है? जानें सच|विनोद तावड़े की कमबैक स्टोरी: साइडलाइन से यूपी की कमान तक|स्मृति ईरानी की राजनीतिक यात्रा: ड्रामा और ट्विस्ट|Jio Prime 300 रुपये में 1 साल, सभी सवालों के जवाब|बालों पर 25 हजार मासिक खर्च करने वाली महिला की कहानी|पहली इलेक्ट्रिक फेरारी Luce ₹383 करोड़ में बिकी|
Wednesday, 19 August 2026
विश्व

ईरान को झुकाने में ट्रंप बनाम ओबामा

author
Komal
संवाददाता
📅 16 June 2026, 7:15 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
ईरान को झुकाने में ट्रंप बनाम ओबामा
📷 aarpaarkhabar.com

ईरान और अमेरिका के बीच हुई नई डील को लेकर पूरी दुनिया नजरें गड़ाए हुई है। इस समझौते के बाद पश्चिम एशिया में तनाव की स्थिति में कुछ कमी आई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह डील स्थायी साबित होगी? इसी सवाल का जवाब देने के लिए हमें अतीत की ओर देखना होगा। वर्ष २०१५ में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ एक ऐतिहासिक समझौता किया था, जिसे संयुक्त व्यापक कार्य योजना, यानी जेसीपीओए के नाम से जाना जाता है। इस डील के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम में बड़ी कटौती करने का वचन दिया था। लेकिन बस दो से ढाई साल बाद ही डोनाल्ड ट्रंप इस डील से अलग हो गए। तब से लेकर अब तक ईरान और अमेरिका के संबंध बेहद कड़वे रहे हैं।

आज जब ट्रंप खुद एक नई डील लेकर आए हैं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या इस नई डील की नियति ओबामा की डील जैसी ही होगी? आइए समझते हैं कि ओबामा की डील और ट्रंप की वर्तमान डील में क्या अंतर है और किसने ईरान को ज्यादा झुकाया है।

ओबामा की जेसीपीओए डील क्या थी?

वर्ष २०१५ में ईरान और अमेरिका के बीच हुई जेसीपीओए डील को दुनिया का एक सबसे महत्वपूर्ण समझौता माना जाता था। इस डील में अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी भी शामिल थे। इस समझौते के तहत ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को काफी हद तक सीमित करना था। ईरान को अपने यूरेनियम संचय को नब्बे प्रतिशत तक कम करना था और अपने परमाणु रिएक्टरों को निष्क्रिय करना था। इसके बदले में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ईरान पर से आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के लिए तैयार हो गया था।

ओबामा की इस डील को कई विशेषज्ञ एक ऐतिहासिक समझौता मानते थे। इसमें ईरान की स्वायत्तता को सम्मान दिया गया था और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय जांच की व्यवस्था भी की गई थी। लेकिन यह डील अमेरिका के भीतर ही बहुत विवादास्पद साबित हुई। रिपब्लिकन पार्टी के नेता इसे एक गलत समझौता मानते थे। जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने इस डील को "सबसे बुरा डील" कहा और २०१८ में इससे बाहर निकल गए। उसके बाद ट्रंप ने ईरान पर फिर से कठोर प्रतिबंध लगा दिए।

ट्रंप की नई डील कैसी है?

डोनाल्ड ट्रंप अब राष्ट्रपति बनने वाले हैं और उन्होंने ईरान के साथ एक नई डील की घोषणा की है। इस नई डील के तहत ईरान को बहुत कठोर शर्तें मानी पड़ी हैं। ट्रंप की डील ओबामा की डील से बेहद अलग है। इस नई डील में ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को लगभग पूरी तरह से निष्क्रिय करना पड़ा है। साथ ही ईरान को अपनी परमाणु विशेषज्ञों को अलग-अलग देशों में भेजना पड़ा है ताकि वह अपने परमाणु ज्ञान को दूसरों के साथ साझा न कर सके।

इस डील में ईरान को काफी सारी पाबंदियों को स्वीकार करना पड़ा है। इसमें ईरान के रक्षा क्षेत्र की जांच पर भी प्रतिबंध लगे हुए हैं। ट्रंप की यह डील ओबामा की डील से ज्यादा सख्त है। ईरान को इस डील को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया है क्योंकि वह अरब देशों और इजराइल के दबाव में आ गया है। खाड़ी के देशों ने ईरान के खिलाफ एक मोर्चा बना लिया है और अगर ईरान इस डील को स्वीकार नहीं करता, तो वह और भी ज्यादा अलग-थलग पड़ जाता।

दोनों डील में तुलना

जब हम ओबामा और ट्रंप की डील की तुलना करते हैं, तो साफ नजर आता है कि ट्रंप ने ईरान को ज्यादा झुकाया है। ओबामा की डील में ईरान को काफी सम्मान दिया गया था और उसकी सार्वभौमिकता का ध्यान रखा गया था। लेकिन ट्रंप की डील में ईरान के लिए कोई विकल्प नहीं बचा है। इसमें ईरान को अपनी सभी परमाणु गतिविधियों को पूरी तरह से रोकना पड़ा है। ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर है और इन प्रतिबंधों से वह और भी कमजोर हो जाएगी।

हालांकि ट्रंप की डील से अंतर्राष्ट्रीय शांति को लाभ मिल सकता है, लेकिन यह डील दीर्घकालीन समाधान नहीं है। अगर भविष्य में कोई दूसरा अमेरिकी राष्ट्रपति आता है, तो वह इस डील से भी निकल सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि इस डील को बहुराष्ट्रीय समर्थन दिया जाए और इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत सुरक्षित किया जाए।

निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि ट्रंप ने ईरान को ओबामा से कहीं ज्यादा झुकाया है। लेकिन यह भी सच है कि किसी देश को जबरदस्ती झुकाया जाना सदैव खतरनाक साबित होता है। इतिहास गवाह है कि ज्यादा सख्ती से कभी भी स्थायी शांति नहीं मिलती। ईरान और अमेरिका के बीच विश्वास की कमी ही इन डील्स की असली समस्या है। जब तक दोनों देश एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करेंगे, तब तक कोई भी डील पूरी तरह से सफल नहीं हो सकेगी।