अमेरिका-ईरान डील इस्राइल हमले से टली
क्या पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीदों को एक बार फिर झटका लग गया है? अमेरिका और ईरान के बीच जिस समझौते को संघर्ष खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा था, वह इस्राइल के बेरूत हमले के बाद कुछ घंटों के लिए टल गया। डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इस देरी की पुष्टि की है, जबकि क्षेत्र में तनाव और अनिश्चितता अभी भी बरकरार है।
इस्राइल के हमले ने पलटी डील की राह
दक्षिण लेबनान के शहर बेरूत पर इस्राइल के सैन्य अभियान ने पूरे क्षेत्र में तबाही मचा दी है। इसी घटनाक्रम के कारण अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता को अस्थायी रूप से रोक दिया गया। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न्यूज कांफ्रेंस में स्पष्ट किया कि यह समझौता केवल कुछ घंटों के लिए ही रुका है, लेकिन इससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उथल-पुथल मच गई है।
इस्राइल के सैन्य अभियान के पीछे के कारणों को समझना जरूरी है। लेबनान में हिजबुल्लाह जैसे सशस्त्र समूहों की उपस्थिति और उनकी ईरान से करीबी संबंध को लेकर इस्राइल लंबे समय से चिंतित रहा है। बेरूत पर किए गए हमले को इसी चिंता का नतीजा माना जा रहा है। लेकिन इस कार्रवाई से पश्चिम एशिया के नाजुक भू-राजनीतिक संतुलन को गहरा झटका लगा है।
इसी बीच अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस हमले की वजह से अमेरिका-ईरान समझौते की गति धीमी हो गई है। हालांकि ट्रंप की टिप्पणी से लगता है कि पक्षों के बीच बातचीत पूरी तरह टूटी नहीं है, बल्कि यह महज एक अस्थायी रुकावट है।
अमेरिका-ईरान समझौते का महत्व
यह समझौता केवल दोनों देशों के बीच का मुद्दा नहीं है। इसका प्रभाव पूरे विश्व की भू-राजनीति पर पड़ता है। पिछले कई दशकों से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बना हुआ था। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय हमेशा चिंतित रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए 2015 में ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन यानी जेसीपीओए समझौता किया गया था।
ट्रंप की पहली कार्यावधि में इसी समझौते से अमेरिका ने खुद को अलग कर लिया था। यह कदम पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ाने का मुख्य कारण बना। इसके बाद से क्षेत्र में अस्थिरता में लगातार वृद्धि हुई है। ड्रोन हमलों, मिसाइल परीक्षणों और सीमावर्ती विवादों ने हालात को और भी गंभीर बना दिया है।
इसी पृष्ठभूमि में नया अमेरिका-ईरान समझौता काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा था। इस समझौते से न केवल दोनों देशों के बीच शांति स्थापित होनी थी, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के लिए नई उम्मीदें जगनी थीं। लेकिन इस्राइल के हमलों ने इन सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
क्षेत्रीय तनाव और भविष्य की चिंताएं
इस्राइल के बेरूत हमले के बाद पूरे पश्चिम एशिया में तनाव की स्थिति बन गई है। हिजबुल्लाह और अन्य सशस्त्र समूहों की ओर से जवाबी कार्रवाई की धमकियां आने लगी हैं। इन सभी घटनाक्रमों के बीच अमेरिका और ईरान की समझौता वार्ता रुक जाना स्वाभाविक ही माना जा सकता है।
इंटरनेशनल रिलेशंस के विशेषज्ञों का मानना है कि इस नई परिस्थिति में अमेरिका और ईरान को अपने राजनयिक प्रयासों को और भी मजबूत करना होगा। केवल सैन्य कार्रवाइयों से समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। इस क्षेत्र में टिकाऊ शांति के लिए सभी पक्षों को एक मंच पर बैठना होगा।
ट्रंप की घोषणा के बाद भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या वास्तव में यह समझौता कुछ घंटों के लिए ही रुका है या फिर यह नई बाधाओं का संकेत है। यदि इस्राइल-लेबनान स्थिति और बदतर हो जाए तो अमेरिका-ईरान डील पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
वर्तमान परिस्थिति में यूरोपीय देश, चीन, रूस और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। लेकिन क्षेत्रीय शक्तियों के बीच बढ़ता शक बाकी प्रयासों को निष्प्रभावी बना सकता है।
अंतिम विश्लेषण में देखें तो इस्राइल के बेरूत हमले ने अमेरिका-ईरान समझौते के रास्ते में एक बड़ी बाधा खड़ी कर दी है। हालांकि ट्रंप की टिप्पणी से उम्मीद बनी हुई है कि यह डील पूरी तरह टूटी नहीं है। लेकिन आने वाले समय में क्या होगा, यह अभी अनिश्चित है। पश्चिम एशिया में शांति की स्थापना के लिए अभी और भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। सभी पक्षों को अपनी जिद्दों को किनारे रखकर संवाद के माध्यम से समस्याओं का हल निकालना होगा। केवल यही राह है जिससे इस क्षेत्र में स्थायी शांति आ सकती है।




