रूस के अंतिम जार निकोलस-2 का इतिहास
रूस के इतिहास में एक ऐसा दिन आया जो पूरी दुनिया के राजनीतिक नक्शे को बदल गया। वह दिन था जब निकोलस-2 रूस के सिंहासन पर बैठे। यह सिर्फ एक राजा का राज्य पर बैठना नहीं था, बल्कि यह तीसरे रोमानोव राजवंश के शासन की शुरुआत थी जो बाद में खत्म हो गई। निकोलस-2 का नाम इतिहास में अंतिम जार के रूप में दर्ज है और उनके शासनकाल में ही रूस की सबसे बड़ी क्रांति हुई।
निकोलस अलेक्जेंड्र रोमानोव का जन्म 6 मई, 1868 को हुआ था। उन्होंने 1 नवंबर, 1894 को रूस के सिंहासन पर अपना आसन ग्रहण किया। उनके पिता अलेक्जेंड्र-3 की मृत्यु के बाद यह जिम्मेदारी निकोलस के कंधों पर आ गई। जब निकोलस सिंहासन पर बैठे तो उन्हें उम्मीद थी कि वे एक महान शासक बन जाएंगे और रूस को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। लेकिन भाग्य का खेल कुछ और ही था।
निकोलस-2 के शासनकाल की शुरुआत
जब निकोलस-2 ने सिंहासन संभाला तो रूस एक पिछड़ा हुआ देश था। किसान वर्ग अत्यंत दरिद्र था, मजदूरों की स्थिति भी बहुत खराब थी और समाज में असंतोष की भावना व्याप्त थी। निकोलस-2 एक रूढ़िवादी शासक थे जो पुरानी व्यवस्था को बनाए रखना चाहते थे। उन्हें लोकतांत्रिक सुधारों में विश्वास नहीं था और वे स्वेच्छाशासन में विश्वास करते थे।
उनके शासनकाल की शुरुआत में ही रूस को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। सबसे पहले 1904-05 का रूस-जापान युद्ध हुआ। इस युद्ध में रूस की हार हुई और यह हार रूसी लोगों के लिए एक झटका था। राष्ट्रीय गर्व को ठेस पहुंची। लोगों का सरकार के प्रति विश्वास टूट गया। इसी के बाद 1905 में पहली रूसी क्रांति हुई जिसे खूनी रविवार की घटना ने प्रेरित किया।
रूसी क्रांति और सामाजिक विद्रोह
9 जनवरी, 1905 को सेंट पीटर्सबर्ग में एक शांतिपूर्ण जुलूस निकाला गया। हजारों मजदूर और किसान निकोलस-2 के महल की ओर मार्च कर रहे थे और अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे। लेकिन राजकीय सेना ने उन पर गोलियां चला दीं। सैकड़ों लोग मारे गए। इस घटना को खूनी रविवार के नाम से जाना जाता है। इसी घटना से रूस में क्रांतिकारी भावनाएं जागीं।
निकोलस-2 के शासनकाल में रूस पर विभिन्न समस्याओं का दबाव था। किसान आंदोलन चल रहा था, मजदूर संगठन बन रहे थे, और बुद्धिजीवी वर्ग भी क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित हो रहा था। निकोलस ने कुछ संवैधानिक सुधार किए और 1906 में दुमा (संसद) का गठन किया। लेकिन यह सुधार पर्याप्त नहीं थे। सामाजिक और आर्थिक समस्याएं बनी रहीं।
वर्ष 1917 में रूस में दूसरी क्रांति हुई जो अधिक विनाशकारी थी। इस बार क्रांति का नेतृत्व व्लादिमीर लेनिन ने किया। लोग जार की निरंकुश शासन प्रणाली से परेशान थे। प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की भारी क्षति हुई और आम जनता भुखमरी का शिकार हो गई। 8 मार्च, 1917 को पेट्रोग्राद में एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। बॉल्शेविक पार्टी की नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन की बयार चलने लगी।
निकोलस-2 का अंत और जारशाही का पतन
जैसे-जैसे क्रांति तेज हुई, निकोलस-2 की स्थिति कमजोर पड़ने लगी। सैन्य बल भी उनके साथ नहीं रहा। 2 मार्च, 1917 को निकोलस-2 को सिंहासन से हटना पड़ा। उन्होंने और उनके परिवार ने आत्मसमर्पण कर दिया। यह रूसी जारशाही के अंत का प्रतीक था।
निकोलस-2 और उनका पूरा परिवार क्रांतिकारियों के हाथों में आ गया। उन्हें कैद में रखा गया। 17 जुलाई, 1918 को निकोलस-2, उनकी पत्नी, उनके पांचों बच्चों और उनके चिकित्सक को बुल्शेविक क्रांतिकारियों ने मार दिया। यह रूसी इतिहास का सबसे दुःखद अध्याय था।
निकोलस-2 का शासनकाल रूस के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ। उनके समय में ही रूस में समाजवादी क्रांति हुई जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। उनके पतन के साथ ही तीसरे रोमानोव राजवंश का अंत हुआ और रूस एक समाजवादी राष्ट्र बन गया। निकोलस-2 का इतिहास एक चेतावनी है कि कैसे निरंकुश शासन, सामाजिक असंतोष और गलत नीतियां एक शक्तिशाली राजवंश को भी नष्ट कर सकती हैं।




