एलपीजी संकट से शादियां प्रभावित, कोर्ट मैरिज का चलन बढ़ा
नई दिल्ली - शहर में एलपीजी की भयानक कमी ने लोगों के जीवन को काफी हद तक प्रभावित कर दिया है। विशेषकर शादी के मौसम में जहां भव्य आयोजन होते हैं, वहां पर यह संकट बहुत बड़ी समस्या बन गया है। पिछले बीस दिनों में दिल्ली के विभिन्न इलाकों में कोर्ट मैरिज के आवेदनों में असाधारण वृद्धि देखी गई है। लोग अब परंपरागत भव्य शादियों के बजाय न्यायालय में संपन्न विवाह को प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि इससे न केवल समय की बचत होती है बल्कि आर्थिक बोझ भी कम होता है।
एलपीजी संकट का सीधा असर शादी उद्योग पर
दिल्ली के विभिन्न बैंक्वेट हॉल, होटल और कैटरिंग सेवा प्रदाताओं के लिए यह अवधि काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। एलपीजी सिलिंडर की कमी के कारण खाना पकाने में भारी बाधा आ रही है। पहले जहां एक बड़े बैंक्वेट हॉल में हजारों लोगों के लिए खाना तैयार किया जाता था, वहां अब कैटर्स को सीमित व्यवस्था करनी पड़ रही है। कई बैंक्वेट हॉल तो शादियों की बुकिंग ही रद्द कर दी हैं क्योंकि उन्हें आश्वस्त नहीं है कि वे अपनी सभी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकेंगे।
दक्षिण दिल्ली के एक प्रमुख कैटरिंग सेवा प्रदाता राहुल शर्मा कहते हैं, "पिछले महीने हमारे पास कम से कम पचास शादियों की बुकिंग थी, लेकिन एलपीजी की कमी के कारण हमने आधी को रद्द कर दिया। एक बार गैस मिलना मुश्किल हो गया तो हम हजार-दो हजार लोगों के लिए खाना कैसे तैयार कर सकते हैं? यह असंभव है।" इसी तरह की समस्याएं पूरे शहर के बैंक्वेट हॉल्स में देखने को मिल रही हैं।
कोर्ट मैरिज में अभूतपूर्व बढ़ोतरी
इस संकट के बीच दिल्ली की अदालतों में विवाह पंजीकरण के कार्यालयों में असाधारण भीड़ दिखाई दे रही है। पिछले बीस दिनों में कोर्ट मैरिज के आवेदनों में सौ प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। युवा दंपति अब परंपरागत रीति-रिवाजों की परवाह किए बिना सीधे न्यायालय में अपनी शादी रजिस्टर करवा रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक कारणों से उपजी है बल्कि व्यावहारिकता और समय-बचत के विचार से भी आई है।
दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के एक कर्मचारी कहते हैं, "पिछले महीने जहां हर दिन दस से बारह शादियां रजिस्टर होती थीं, वहां अब हर दिन पचीस से तीस आवेदन आ रहे हैं। लोगों की मानसिकता बदल गई है। वे समझ गए हैं कि भव्य शादियां अब संभव नहीं हैं तो क्यों न सीधे कोर्ट मैरिज कर लें।" न्यायालय की व्यवस्था भी इतनी बड़ी संख्या में आवेदनों को संभालने के लिए तैयार नहीं थी, परिणामस्वरूप प्रक्रिया में विलंब हो रहा है।
परिवार के साथ आर्य समाज मंदिरों में विवाह
अधिकांश युवा दंपतियों की रणनीति दो चरणों में बंटी हुई है। पहले वे न्यायालय में अपनी शादी कानूनी रूप से पंजीकृत कर लेते हैं, फिर बाद में सीमित संख्या में परिवार के सदस्यों के साथ आर्य समाज के मंदिरों में धार्मिक विवाह संस्कार पूरा करते हैं। यह तरीका बहुत सारे लोगों को अपील कर रहा है क्योंकि इससे कानूनी वैधता भी मिलती है और धार्मिक परंपरा का पालन भी हो जाता है, लेकिन बड़े आयोजन की झंझट नहीं रहती।
आर्य समाज मंदिर, नई दिल्ली के पंडित विजय कुमार कहते हैं, "पहले हर महीने हमारे यहां बीस-पच्चीस विवाह संस्कार होते थे, लेकिन अब हर दिन दो-तीन युवा दंपति आ रहे हैं। वे बस सरल और सस्ते विवाह संस्कार चाहते हैं। कोई ढोल-नगाड़े नहीं, कोई बड़ा आयोजन नहीं। यह एलपीजी संकट का परिणाम है।"
आर्थिक राहत का माध्यम
कई परिवारों के लिए कोर्ट मैरिज से एक वरदान साबित हो रहा है। शादी के खर्च में भारी कमी आई है। परंपरागत शादियों में जहां दाल-बाजरा पकाने के लिए महीनों पहले से गैस की व्यवस्था की जाती थी और बड़ी-बड़ी रकम खर्च होती थी, वहां कोर्ट मैरिज में केवल कुछ सौ रुपये का खर्च आता है। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए तो यह वरदान साबित हुआ है।
ब्लॉक-12, पश्चिम विहार की रहने वाली गीता शर्मा कहती हैं, "मेरी बेटी की शादी का ख्वाब कम से कम पांच लाख रुपये में पूरा होना था, लेकिन अब हमने कोर्ट मैरिज कर दी। बस पचास हजार रुपये खर्च हुए और बाकी सब कुछ सही है। मुझे लगता है यह समय बदलाव का है।"
भविष्य की चिंता
हालांकि यह प्रवृत्ति मौजूदा संकट को देखते हुए समझदारी भरी प्रतीत होती है, लेकिन समाज में परंपरागत विवाह संस्कारों के प्रति आस्था में कमी आना एक गंभीर बात है। विवाह केवल कानूनी समझौता नहीं है बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी रखता है। एलपीजी संकट यदि लंबे समय तक रहा तो शायद यह बदलाव स्थायी हो जाए। सरकार को इस संकट को तुरंत सुलझाना चाहिए ताकि लोगों की जीवनशैली और सांस्कृतिक परंपराएं प्रभावित न हों।
दिल्ली की सीएम कार्यालय से इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं मिली है, लेकिन शहर के विभिन्न स्थानों से रिपोर्ट्स यह संकेत दे रही हैं कि यह समस्या जल्द हल होने वाली नहीं है। तब तक कोर्ट मैरिज का यह चलन बढ़ता रहेगा।




