मर्कट और माखनलाल चतुर्वेदी की प्रसिद्ध कविता
माखनलाल चतुर्वेदी और उनकी कालजयी कविता
हिंदी साहित्य के इतिहास में माखनलाल चतुर्वेदी का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है। वे एक महान कवि, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज को जागृत किया। उनकी कविता 'तुम भी देते हो तोल तोल' एक ऐसी रचना है जो पाठकों के मन में गहरा प्रभाव डालती है और आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि अपने समय में थी।
माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म सन् १८८९ में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में हुआ था। वे समाज सुधार के एक प्रबल समर्थक थे और उनकी कविताओं में सामाजिक चेतना की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया और साहित्य के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया।
'तुम भी देते हो तोल तोल' कविता में माखनलाल चतुर्वेदी ने एक बहुत ही सूक्ष्म और गहरा संदेश दिया है। इस कविता के माध्यम से वे मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति और समाज में व्याप्त असमानता की ओर इशारा करते हैं। कविता की भाषा सरल होते हुए भी बहुत प्रभावी है और पाठक के हृदय को स्पर्श करती है।
मर्कट शब्द का महत्व और अर्थ
'तुम भी देते हो तोल तोल' कविता में मर्कट शब्द का प्रयोग एक प्रतीकात्मक अर्थ में किया गया है। मर्कट का अर्थ है बाजार या बाजारवाद। इस कविता में माखनलाल चतुर्वेदी ने बाजार के महत्व और मानव जीवन पर उसके प्रभाव के बारे में विचार व्यक्त किए हैं। वे दिखाते हैं कि कैसे बाजार मनुष्य के मूल्यों को परिभाषित करता है और लोग अपने सिद्धांतों को तोड़ते हुए आर्थिक लाभ के लिए झूठ बोलते हैं।
शब्द 'तोल तोल' का प्रयोग बहुत ही चतुराई से किया गया है। यह शब्द न केवल बाजार में तौलने की प्रक्रिया को दर्शाता है, बल्कि मनुष्य के गुण-दोषों को तौलने का भी संकेत देता है। कविता में यह भाव है कि समाज में सभी चीजों को पैसे के पलड़े पर तौला जा रहा है। आजकल का व्यक्ति भी इसी बाजारवादी सोच में फंसा हुआ है और अपने मूल्यों को भूल गया है।
माखनलाल चतुर्वेदी की यह कविता एक तीव्र आलोचना है आधुनिक समाज की उस मानसिकता के प्रति जहां सब कुछ बिकाऊ हो गया है। गुण, विचार, नैतिकता और सत्य - सब कुछ को बाजार में खरीदा और बेचा जा रहा है। कवि यह कहना चाहते हैं कि हम सभी इसी प्रक्रिया का हिस्सा बन गए हैं।
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