मानसून देरी से कपास-सोयाबीन की बुआई पिछड़ी
भारतीय कृषि जगत में इस बार मानसून की देरी ने बड़ी चिंता का सबब बन गया है। देश भर के किसान और कृषि विशेषज्ञ मानसून के देरी से आने को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर कपास और सोयाबीन की फसलों पर पड़ा है। बुआई का सही समय निकल जाने से किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस साल मानसून सामान्य समय से करीब दो से तीन हफ्ते देरी से आया है। यह देरी कृषि की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण साबित हो रही है क्योंकि कपास और सोयाबीन की बुआई के लिए जून का महीना सबसे उपयुक्त होता है। लेकिन इस बार मई और जून के दौरान पर्याप्त वर्षा न होने से किसानों को बीज बोने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा।
भारत विश्व में कपास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। भारतीय कपास की गुणवत्ता और उत्पादन दुनिया भर में मांग में रहता है। लेकिन इस बार मानसून की बेरुखी से कपास की बुआई में भारी पिछड़ापन देखा जा रहा है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में स्थिति काफी चिंताजनक है।
मानसून की देरी से बुआई में पिछड़ापन
भारतीय कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार कपास की बुआई इस साल पिछले साल की तुलना में लगभग चालीस प्रतिशत कम हुई है। सोयाबीन की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। किसानों का कहना है कि बारिश न होने से जमीन में नमी नहीं रही और बीज बोना संभव नहीं हो सका। कई किसानों को बीज खरीदने के लिए कर्ज लेना पड़ा लेकिन मानसून न आने से उन्हें निवेश का नुकसान उठाना पड़ा।
मध्य प्रदेश में सोयाबीन की बुआई की स्थिति और भी ज्यादा गंभीर है। राज्य के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक जिलों में बारिश की कमी के कारण बुआई का काम धीमी गति से चल रहा है। कृषि विज्ञान केंद्रों के विशेषज्ञ कहते हैं कि इस महीने की बारिश भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर जुलाई के पहले हफ्ते में बारिश नहीं हुई तो फसल चक्र पूरी तरह बिगड़ जाएगा।
कपास की खेती बहुत ही संवेदनशील होती है। इसके लिए विशेष तापमान और नमी की जरूरत होती है। बीज बोने के बाद अगर ठीक समय पर बारिश न हो तो बीज सड़ जाता है या अंकुरित नहीं होता। यही वजह है कि किसान मानसून के आने का इंतज़ार करते हैं। लेकिन इस बार मानसून की अनिश्चितता के कारण किसानों की योजनाएं बिगड़ गई हैं।
कपड़ा उद्योग पर असर और लागत बढ़ने की संभावना
भारतीय कपड़ा उद्योग कपास के उत्पादन पर काफी हद तक निर्भर है। देश के विभिन्न हिस्सों में कपड़े की मिलें, स्पिनिंग यूनिट्स और गारमेंट निर्माण के कारखाने हैं जो कपास पर निर्भर हैं। कपास की कमी से इन उद्योगों में कच्चे माल की कमी हो सकती है जिससे उत्पादन की लागत बढ़ेगी।
टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अनुसार अगर कपास का उत्पादन इसी रफ्तार से कम रहा तो भारतीय कपड़े के निर्यात में गिरावट आ सकती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कपास की कीमतें पहले से ही अधिक हैं और अगर भारत में कपास की कमी हुई तो आयात भी करना पड़ेगा जिससे लागत और बढ़ेगी।
छोटे और मझोले उद्यमियों के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा गंभीर है। उनके पास बड़ी कंपनियों की तरह पूंजी नहीं है इसलिए महंगे कपास को खरीदना उनके लिए मुश्किल है। कई छोटे कारखाने अपना उत्पादन कम करने के बारे में सोच रहे हैं या मौसमी कर्मचारियों को निकालने की योजना बना रहे हैं।
भविष्य की चिंता और सरकारी कदम
कृषि और उद्योग जगत के विशेषज्ञ सरकार से तुरंत कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। कपास और सोयाबीन के उत्पादकों को सहायता देने की जरूरत है। बीज खरीद पर सब्सिडी देने, कर्ज पर ब्याज में कमी करने और फसल बीमा की सुविधा बेहतर करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
सरकार को भी इस बात का एहसास है कि कृषि और उद्योग दोनों ही संकट में हैं। कृषि मंत्रालय ने किसानों को वर्षा की संभावना वाले क्षेत्रों में बुआई करने की सलाह दी है। मानसून की ट्रैकिंग के आधार पर अगले हफ्तों में बारिश की संभावना है लेकिन उसका समय सही हो या नहीं यह अभी निश्चित नहीं है।
यदि आने वाले दो-तीन हफ्तों में अच्छी बारिश हो जाए तो स्थिति सुधरने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन अगर यह देरी और बढ़ गई तो कपास और सोयाबीन की फसल में भारी नुकसान हो सकता है जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। किसानों, उद्योगों और आम जनता को इस मानसून की देरी का कीमत चुकानी पड़ सकती है।




