मानसून में 7 दिन की देरी, 10% कम बारिश की चेतावनी
देश भर के किसानों और मौसम प्रेमियों के लिए बुरी खबर आई है। भारतीय मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि इस बार मानसून सामान्य समय से सात दिन पीछे रह जाएगा। केरल के तटीय इलाकों तक मानसून पहुंचने में कम से कम एक हफ्ता और लग सकता है। मौसम विभाग के अनुसार यह देरी अल-नीनो जलवायु परिस्थिति के कारण हो रही है, जो मानसून को कमजोर कर रही है।
इतना ही नहीं, मौसम विभाग के वैज्ञानिकों ने यह भी सावधानी बरती है कि जब मानसून आएगा, तो सामान्य से करीब दस प्रतिशत कम बारिश होने की संभावना है। इसका सीधा असर देश की कृषि पर पड़ेगा। खरीफ सीजन शुरू होने के लिए तैयार किसानों के लिए यह खबर निराशाजनक है। अगर बारिश कम होगी, तो धान, मक्का, दलहन और तिलहन जैसी फसलें प्रभावित होंगी। सूखे की स्थिति तक पहुंचने का खतरा बढ़ जाएगा।
अल-नीनो प्रभाव और मानसून की कमजोरी
अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है जो प्रशांत महासागर में गर्म पानी की असामान्य मात्रा के कारण बनता है। इस बार अल-नीनो की तीव्रता काफी अधिक है। मौसम विभाग के वैज्ञानिकों के अनुसार, अल-नीनो मानसून की नमी को कम करता है और इसकी गति को धीमा करता है। पिछले दो महीनों में प्रशांत महासागर के तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
इसका अर्थ यह है कि भारतीय मानसून प्रणाली पर दबाव बढ़ रहा है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की गति कमजोर हो गई है और इसे सामान्य मार्ग पर पहुंचने में अधिक समय लगेगा। मौसम विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह एक अस्थायी स्थिति है और मानसून जब आएगा, तो निश्चित रूप से आएगा, लेकिन कुछ क्षेत्रों में बारिश की मात्रा कम हो सकती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, अल-नीनो की स्थिति जुलाई-अगस्त तक कायम रह सकती है। इसका मतलब है कि मानसून का पूरा मौसम प्रभावित हो सकता है। उत्तर भारत के कई राज्यों में सामान्य से 20 से 30 प्रतिशत तक कम बारिश हो सकती है। दक्षिण और पूर्वी भारत में स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर हो सकती है, लेकिन यहां भी औसत से कम वर्षा की संभावना है।
किसानों और कृषि पर संकट के बादल
मानसून की देरी और कम बारिश से खरीफ सीजन की शुरुआत में ही समस्या उत्पन्न हो सकती है। किसान आमतौर पर जून के मध्य तक अपने खेतों में बीज बो देते हैं। अगर इस बार मानसून जुलाई के पहले हफ्ते तक नहीं आता, तो लाखों किसान बीज बोने में असमंजस का शिकार हो जाएंगे।
भारतीय किसान संगठन ने सरकार से अनुरोध किया है कि वह सूखे की स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही तैयारी शुरू कर दे। सिंचाई सुविधाओं को बेहतर बनाया जाए और किसानों को आर्थिक सहायता की योजना तैयार की जाए। मौसम विभाग की चेतावनी के बाद कृषि मंत्रालय ने भी राज्य सरकारों को अलर्ट दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मानसून सात दिन की देरी से आता है और फिर भी कम बारिश होती है, तो देश की खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। गेहूं की बुवाई तो पहले ही कम हुई है, अब अगर खरीफ फसलें भी प्रभावित होंगी, तो अनाज की कीमतें बढ़ सकती हैं। महंगाई बढ़ सकती है और आम जनता के लिए खाद्य पदार्थ महंगे हो सकते हैं।
दरअसल, मानसून भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। देश की 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर करती है। अगर बारिश अच्छी नहीं होगी, तो किसानों की आय घटेगी, ग्रामीण क्षेत्रों में खपत में कमी आएगी और औद्योगिक क्षेत्र पर भी इसका असर पड़ेगा। इसलिए, मानसून की हर बूंद महत्वपूर्ण है।
सरकार की तैयारी और सावधानियां
मौसम विभाग की चेतावनी के बाद भारतीय सरकार पहले से ही कई कदम उठा रही है। कृषि मंत्रालय राज्य सरकारों के साथ समन्वय स्थापित कर रहा है। जल संसाधन विभाग जलाशयों और तालाबों को भरने की तैयारी कर रहा है, ताकि सूखे की स्थिति में सिंचाई की व्यवस्था की जा सके।
कई राज्यों ने पहले ही बारिश के जल को संरक्षित करने के लिए तालाब खोद दिए हैं। बोरवेलों की गहराई बढ़ाई जा रही है। सरकार किसानों को मल्टीलेयर फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है, जिससे कम पानी में भी अच्छी पैदावार मिले।
मौसम विभाग से पहले से ही नियमित पूर्वानुमान मांगे जा रहे हैं, ताकि किसान समय पर अपनी रणनीति बदल सकें। आशा है कि सरकार की सक्रिय भूमिका से किसानों को इस कठिन समय में कुछ राहत मिलेगी।




