NCERT किताब कृष्ण पर कर्नाटक में विवाद
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी द्वारा तैयार की गई कक्षा छठी की कन्नड़ किताब 'कृष्ण' को लेकर कर्नाटक में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। शिक्षा अधिकार संगठन पीएएफआरई ने इस किताब के खिलाफ कड़ी आपत्ति जताई है और कहा है कि इसमें धार्मिक विषयों को अनुचित तरीके से प्रचारित किया गया है। संगठन का यह भी कहना है कि किताब में भोजन से संबंधित विषयों को एकपक्षीय तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
पीएएफआरई के अनुसार, इस किताब में केवल शाकाहारी भोजन को ही संतुलित और स्वास्थ्यकर आहार बताया गया है। जबकि अंडा, मछली और मांस जैसे प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोतों को किताब में पूरी तरह से बाहर रखा गया है। यह दृष्टिकोण शैक्षिक दृष्टि से सही नहीं माना जा रहा है क्योंकि स्कूली किताबों में पोषण संबंधी जानकारी निष्पक्ष और वैज्ञानिक होनी चाहिए।
किताब के नाम को लेकर उठे सवाल
पीएएफआरई संगठन ने सबसे बड़ा सवाल यही उठाया है कि आखिर एनसीईआरटी ने इस किताब का नाम 'कृष्ण' क्यों रखा है? संगठन के अनुसार, यह नाम धार्मिक संदर्भ से जुड़ा है और स्कूली किताबों में धार्मिक विषयों को इतने प्रमुखता से स्थान देना उचित नहीं है। शिक्षा को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए और सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। संगठन का मानना है कि किताब के शीर्षक को ही बदलकर अधिक सामान्य और समावेशी नाम दिया जाना चाहिए।
कर्नाटक के शिक्षा विभाग को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और पीएएफआरई की चिंताओं को गंभीरता से लेना चाहिए। पीएएफआरई के प्रतिनिधियों ने कहा है कि वे इस विषय को शिक्षा मंत्री के पास ले जाएंगे और उचित कार्रवाई की मांग करेंगे। संगठन को लगता है कि भारतीय संविधान में जो धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत दिया गया है, वह शिक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह से लागू नहीं हो रहा है।
पोषण और आहार संबंधी विवाद
एनसीईआरटी की इस किताब में दिए गए आहार संबंधी सुझावों को लेकर भी बड़ी आपत्ति उठाई गई है। किताब में केवल शाकाहारी भोजन को ही संपूर्ण आहार के रूप में प्रस्तुत किया गया है जबकि आधुनिक पोषण विज्ञान यह साफ करता है कि विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ खाने से ही शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं।
मांस, मछली और अंडे प्रोटीन, विटामिन बी12, आयरन और अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्वों के समृद्ध स्रोत हैं। इन्हें पूरी तरह से किताब से बाहर रखना एक गंभीर वैज्ञानिक त्रुटि है। पीएएफआरई का मानना है कि यह शिक्षा में पूर्वाग्रह दिखाना है। स्कूली किताबें निष्पक्ष होनी चाहिए और विभिन्न खाद्य पदार्थों के पोषक गुणों को समान रूप से प्रस्तुत करना चाहिए।
विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं में अलग-अलग खान-पान की प्रथाएं हैं। कुछ समुदाय शाकाहारी हैं तो कुछ मांसाहारी। स्कूली शिक्षा में सभी को सम्मानित किया जाना चाहिए और सभी प्रकार के पोषक आहार के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। यह भारतीय समाज की बहुलवादी प्रकृति के अनुरूप भी है।
एनसीईआरटी की जिम्मेदारी और भविष्य की राह
एनसीईआरटी को भारत की शिक्षा नीति के अनुसार सभी धर्मों और सभी समुदायों के प्रति निरपेक्ष रहना चाहिए। किताबों को तैयार करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी धर्म या समुदाय को प्राथमिकता न दी जाए। पीएएफआरई का तर्क यह भी है कि जब भारत एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश है, तो शिक्षा प्रणाली को भी इसी विविधता को प्रतिबिंबित करना चाहिए।
कर्नाटक के शिक्षा विभाग को अब इस मामले में गंभीर पड़ताल करनी चाहिए। एनसीईआरटी से भी कहा जाना चाहिए कि वह इस किताब की समीक्षा करे और आवश्यक सुधार करे। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को सर्वांगीण विकास प्रदान करना है, न कि किसी विशेष विचारधारा को बढ़ावा देना। पीएएफआरई की आवाज को सुना जाना चाहिए और इस मामले में तुरंत कदम उठाए जाने चाहिए ताकि शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत और निष्पक्ष बनाया जा सके।




