बैंक ने मांगा डेथ सर्टिफिकेट, भाई ने खोदी बहन की कब्र
ओडिशा के क्योंझर जिले से आने वाली यह कहानी हमारी प्रशासनिक व्यवस्था और बैंकिंग सिस्टम की निर्दयता को बयां करती है। एक गरीब भाई को अपनी बहन की कब्र खोदनी पड़ी, बस इसलिए क्योंकि बैंक को मात्र 19 हजार रुपये के लिए डेथ सर्टिफिकेट की जरूरत थी। यह घटना न केवल दुःख की बल्कि शर्म की भी है, जो हमारे समाज की संवेदनशीलता पर गहरा सवाल खड़ा करती है।
यह पूरा प्रकरण तब शुरू हुआ जब एक भाई को बैंक से पता चला कि उसकी बहन के खाते से पैसा निकालने के लिए उसे डेथ सर्टिफिकेट दिखानी होगी। बहन की मृत्यु कई साल पहले हो चुकी थी और परिवार के पास डेथ सर्टिफिकेट नहीं था। गरीबी और बेबसी में फंसा यह भाई हर जगह भटकता रहा, लेकिन किसी ने भी उसकी मदद नहीं की। न तो प्रशासन ने, न ही कोई सरकारी अधिकारी।
जब सभी रास्ते बंद हो गए, तो इस गरीब भाई को एक ही रास्ता नजर आया - अपनी बहन की कब्र खोदना। 19 हजार रुपये की रकम जो कि शायद उसके लिए बहुत बड़ी रकम थी, उसने अपनी मानवीय गरिमा को तिलांजलि दे दी। बैंक के सामने उसे अपनी बहन के कंकाल के साथ खड़ा होना पड़ा। यह दृश्य किसी के भी दिल को तोड़ने के लिए काफी है।
प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी विफलता हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की है। जब कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद डेथ सर्टिफिकेट नहीं बना पाता है, तो इसके लिए विकल्प मौजूद होने चाहिए। लेकिन हमारे यहां गरीबों के लिए कोई विकल्प नहीं है। पटवारी, लेखपाल, तहसीलदार - कोई भी सुनने को तैयार नहीं होता। बस कागजात की मांग की जाती है।
जब यह भाई बार-बार प्रशासन के चक्कर काटता रहा, तो किसी ने उसे यह बताने की कसर नहीं छोड़ी कि डेथ सर्टिफिकेट के लिए अदालत से आवेदन कर सकता है। लेकिन अदालत तक पहुंचने का रास्ता भी गरीबों के लिए कठिन है। अदालतें दूर हैं, वकील महंगे हैं, और प्रक्रिया लंबी है। इसीलिए हजारों गरीब परिवार इन्हीं अधूरे कागजातों के साथ जीते हैं।
यह सवाल भी उठता है कि क्या बैंक के पास कोई और विकल्प नहीं था? क्या बैंक स्वयं मृत्यु का रिकॉर्ड प्राप्त नहीं कर सकता था? क्या कुछ अन्य दस्तावेज से काम नहीं चल सकता था? लेकिन नहीं, बैंक को बस अपनी प्रक्रिया का पालन करना है, भले ही इसके लिए किसी को अपनी बहन की कब्र खोदनी पड़े।
बैंकिंग सिस्टम की संवेदनहीनता
बैंकिंग सिस्टम आज के समय में भी उतना ही कठोर है जितना कि कई दशक पहले था। बैंकरों को सिखाया जाता है कि नियम ही सब कुछ है, मानवता कुछ नहीं। एक बैंक मैनेजर जब किसी गरीब के सामने बैठता है, तो वह उसे एक ग्राहक नहीं, बल्कि एक समस्या के रूप में देखता है।
इस प्रकरण में बैंक ने पहले यह सोचना चाहिए था कि आखिरकार यह खाता किसका है? क्या मृत व्यक्ति के परिवार को उसकी संपत्ति के लिए इतनी बेइज्जती से गुजरना पड़ेगा? लेकिन बैंकिंग सिस्टम में मानवीयता के लिए कोई जगह नहीं है। यहां बस नियम हैं, प्रक्रिया है, और संवेदनहीनता है।
समाज का दर्पण
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हमारा समाज आखिरकार क्या बन गया है? जहां एक भाई को अपनी बहन की कब्र खोदनी पड़े, वह समाज कहां जा रहा है? यह घटना केवल क्योंझर में नहीं घटी, यह हर जगह घटती है। प्रतिदिन हजारों परिवार इसी तरह की समस्याओं से जूझते हैं।
यह समय है जब सरकार और बैंकिंग सिस्टम को अपनी नीतियों में बदलाव लाना चाहिए। गरीब परिवारों के लिए डेथ सर्टिफिकेट प्राप्त करना आसान बनाया जाना चाहिए। बैंकों को अपनी प्रक्रिया को लचीला बनाना चाहिए, ताकि किसी को ऐसी अमानवीय परिस्थिति का सामना न करना पड़े।
ओडिशा की इस घटना ने सारे देश का ध्यान आकर्षित किया है। लोग सवाल पूछ रहे हैं, मीडिया सवाल पूछ रहा है। शायद यह घटना किसी बदलाव की शुरुआत बन जाए। शायद इस भाई की पीड़ा किसी नीति निर्माता के दिल तक पहुंच जाए। लेकिन तब तक, ऐसी कहानियां हमारे समाज की बेरुखी का गवाह बनती रहेंगी।




