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Wednesday, 19 August 2026
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ओडिशा बाढ़: पाँच दिन पेड़ से चिपका रहा शख्स

ओडिशा के भद्रक में बाढ़ के पानी में बहने के बाद सुनंदा बेहरा पाँच दिन तक ताड़ के पेड़ से चिपके रहे। ओडीआरएएफ की बदौलत सुरक्षित निकाले गए।

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Komal
संवाददाता
📅 19 August 2026, 5:45 AM ⏱ 1 मिनट 👁 401 views
ओडिशा बाढ़: पाँच दिन पेड़ से चिपका रहा शख्स
📷 aarpaarkhabar.com

ओडिशा के भद्रक जिले में एक ऐसी घटना हुई जिसने बताई कि मानव जीवन में जिजीविषा कितनी शक्तिशाली होती है। सुनंदा बेहरा नाम के एक शख्स ने बाढ़ के तेज पानी में पाँच दिन तक एक ताड़ के पेड़ से चिपके रहकर अपनी जान बचाई। यह घटना न केवल साहस की कहानी है बल्कि बचाव दल की समर्पण और ग्रामीणों की मानवीयता का भी प्रमाण है।

बाढ़ का तांडव और असहनीय परिस्थितियाँ

अगस्त के महीने में जब ओडिशा भारी बारिश का सामना कर रहा था, तो भद्रक जिला भी इसकी चपेट में आ गया। नदी का जल स्तर असामान्य रूप से बढ़ गया और पानी का प्रवाह इतना तेज था कि वह सब कुछ अपने साथ बहा ले जाता था। सुनंदा बेहरा उस समय खेत में काम कर रहे थे जब अचानक तेज बाढ़ आ गई। पानी की तेज धारा ने उन्हें अपने साथ बहा दिया और वह असहाय होकर नदी के बीच में फँस गए।

ऐसी विकट परिस्थिति में सुनंदा को एक ताड़ का पेड़ नजर आया। वह तुरंत उसी पेड़ से चिपक गए। इस पेड़ ने उनके जीवन की रक्षा का प्रतीकात्मक रूप से काम किया। बाढ़ का पानी चारों तरफ से बह रहा था लेकिन यह पेड़ उनका एकमात्र सहारा था। सुनंदा जान गए कि अगर वह इस पेड़ को छोड़ दें तो उनका जीवन समाप्त हो जाएगा।

पाँच दिनों की आशंका और निर्बलता

जब सुनंदा उस पेड़ से चिपके थे तो उनके सामने पाँच दिन की अविश्वसनीय चुनौती थी। बिना भोजन, बिना पानी पीने के मौके के, बिना किसी सहायता के वह उस पेड़ पर टँगे थे। उनका शरीर प्रतिदिन कमजोर होता जा रहा था। सूरज की तपिश और बाढ़ के ठंडे पानी दोनों ने ही उन्हें प्रताड़ित किया।

इस दौरान उन्हें मृत्यु का भय कई बार सता गया होगा। अकेलेपन, भूख, प्यास और शारीरिक पीड़ा से जूझना कितना कठिन होता है इसका अनुमान हम सिर्फ लगा सकते हैं। लेकिन सुनंदा ने हार नहीं मानी। उनकी आंतरिक शक्ति, उनकी जीवन की इच्छा ने उन्हें इन पाँचों दिनों तक पेड़ से चिपके रहने की ताकत दी।

ग्रामीणों की जागरूकता और ओडीआरएएफ का हस्तक्षेप

भाग्य और ग्रामीणों की जागरूकता ने सुनंदा को बचाया। स्थानीय लोगों ने बाढ़ के बीच पेड़ पर किसी को लटकता हुआ देखा। शुरुआत में तो लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई इंसान पाँच दिन तक इस तरह जीवित रह सकता है। लेकिन जब उन्होंने करीब जाकर देखा तो सुनंदा की कमजोर आवाज सुनाई दी।

ग्रामीणों ने तुरंत ओडिशा आपदा राहत और सहायता बल यानी ओडीआरएएफ को सूचित किया। बचाव दल ने बड़ी सावधानी के साथ सुनंदा को बाहर निकालने की रणनीति बनाई। बाढ़ का तेज पानी अभी भी नीचे बह रहा था, इसलिए यह कार्य बेहद जोखिम भरा था।

ओडीआरएएफ के जवानों ने पेशेवराना तरीके से एक नाव का उपयोग करते हुए सुनंदा के करीब पहुँचे। उन्होंने रस्सी और विशेष उपकरणों का प्रयोग करते हुए सुनंदा को पेड़ से सावधानीपूर्वक निकाला। यह एक सफल बचाव ऑपरेशन था जिसमें न तो कोई हताहत हुआ और न ही कोई अप्रत्याशित घटना।

स्वास्थ्य सेवा और आगे की यात्रा

जब सुनंदा को निकाला गया तो वह अत्यंत कमजोर हालत में थे। पाँच दिन तक बिना भोजन के रहने के कारण उनका वजन काफी कम हो गया था। उनकी मानसिक स्थिति भी गंभीर थी क्योंकि वह एक भयावह अनुभव से गुजरे थे।

उन्हें तुरंत एक अस्पताल में भर्ती किया गया जहाँ चिकित्सकों ने उनकी सावधानीपूर्वक जाँच की। धीरे-धीरे उन्हें तरल पदार्थ दिए गए, फिर हल्का भोजन दिया गया। कुछ दिनों में सुनंदा की शारीरिक स्थिति में सुधार आने लगा। मनोवैज्ञानिक सहायता भी उन्हें दी गई क्योंकि यह आघात उन्हें लंबे समय तक प्रभावित कर सकता था।

आज सुनंदा बेहरा का नाम ओडिशा की बाढ़ से जुड़ी एक ऐसी कहानी है जो जीवन की शक्ति और मानव संकल्प को दर्शाती है। उनकी यह घटना न केवल उनके लिए बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणादायक है। यह बताती है कि कितनी भी विकट परिस्थितियों में भी हार न मानना, जीने की इच्छा रखना और सामाजिक सहायता के बल पर आगे बढ़ना कितना महत्वपूर्ण है।