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Monday, 05 October 2026
विश्व

ओजोन परत सुधार में बाधा: फीडस्टॉक रसायनों का रिसाव

author
Komal
संवाददाता
📅 01 May 2026, 5:32 AM ⏱ 1 मिनट 👁 695 views
ओजोन परत सुधार में बाधा: फीडस्टॉक रसायनों का रिसाव
📷 aarpaarkhabar.com

ओजोन परत की सुधार में बड़ी बाधा बन रहे फीडस्टॉक रसायन

नई दिल्ली - पृथ्वी की सुरक्षा कवच माने जाने वाली ओजोन परत की मरम्मत की प्रक्रिया में एक बड़ी खतरनाक खामी सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के ताजा शोध में यह चिंताजनक तथ्य उजागर हुआ है कि फीडस्टॉक रसायन जो प्लास्टिक, नॉन-स्टिक कोटिंग्स और अन्य विभिन्न औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में काम आते हैं, वास्तव में अपेक्षा से कहीं अधिक मात्रा में वातावरण में रिस रहे हैं। यह खोज न केवल वैज्ञानिक समुदाय में चिंता की लहर दौड़ा रही है, बल्कि पूरे विश्व के पर्यावरण विशेषज्ञों को गंभीर चेतावनी दे रही है।

यह नई जानकारी इसलिए और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्व की सभी औद्योगिक नीतियां और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य इसी आधार पर बनाए गए हैं कि फीडस्टॉक रसायनों का उत्सर्जन बहुत कम है। लेकिन नए वैज्ञानिक मापों से पता चला है कि पहले के अनुमान पूरी तरह गलत थे।

फीडस्टॉक रसायनों का बढ़ता उत्सर्जन

वैज्ञानिकों के अनुसार, पहले यह माना जाता था कि फीडस्टॉक रसायनों से केवल लगभग 0.5 प्रतिशत ही वातावरणीय उत्सर्जन होता है। यह संख्या इतनी कम थी कि इसे ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले मुख्य कारकों की सूची में शामिल भी नहीं किया गया था। हालांकि, नवीनतम अनुसंधान और अत्यधुनिक मापन तकनीकों के माध्यम से यह सच्चाई सामने आई है कि यह रिसाव तीन से चार प्रतिशत तक हो सकता है। यह आंकड़ा पहले के अनुमान से सातगुना अधिक है।

यह खोज विशेषकर चिंताजनक है क्योंकि फीडस्टॉक रसायन दुनिया भर में बड़े पैमाने पर औद्योगिक प्रक्रियाओं में उपयोग होते हैं। प्लास्टिक का उत्पादन हो, टेफ्लॉन जैसी नॉन-स्टिक कोटिंग्स हों, या अन्य उन्नत सामग्रियों का निर्माण हो - लगभग सभी जगह इन रसायनों की आवश्यकता पड़ती है। इसका मतलब यह है कि दुनिया के हर कोने में, हर दिन बड़ी मात्रा में ये रसायन वातावरण में घुल रहे हैं।

ओजोन परत की मरम्मत पर प्रभाव

ओजोन परत की मरम्मत की प्रक्रिया 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के हस्ताक्षर के बाद शुरू हुई थी। उस समय विश्व के सभी देशों ने एक-दूसरे से वादा किया था कि वे ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों का उपयोग बंद करेंगे या कम करेंगे। इस प्रयास के कारण पिछले कुछ दशकों में ओजोन परत में सुधार देखने को मिला था। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि यदि यह प्रयास जारी रहे तो ओजोन परत 2070 तक पूरी तरह ठीक हो जाएगी।

लेकिन फीडस्टॉक रसायनों के अप्रत्याशित उच्च उत्सर्जन की खोज से यह पूरी गणना गलत साबित हो गई है। यदि हर साल इतनी अधिक मात्रा में ये रसायन वातावरण में जाते रहेंगे, तो ओजोन परत की मरम्मत में कई दशक और लग जाएंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि हम जिस तेजी से पर्यावरण की रक्षा की ओर बढ़ रहे थे, वह गति काफी धीमी हो जाएगी।

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन प्रभाव

ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी को सुरक्षा प्रदान करती है। जब यह परत कमजोर होती है, तो ये विकिरण सीधे पृथ्वी तक पहुंचते हैं और मानव स्वास्थ्य, पशु जीवन और पौधों को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं। इसके कारण त्वचा कैंसर, आंखों की समस्याएं, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं।

फीडस्टॉक रसायनों के अधिक उत्सर्जन का मतलब यह है कि यह हानिकारक स्थिति अब तक बनी रहेगी। आने वाली कई पीढ़ियों को इन खतरों का सामना करना पड़ सकता है। कृषि पर भी इसका असर देखने को मिलेगा, क्योंकि पराबैंगनी विकिरण फसलों की पैदावार को भी प्रभावित करता है।

इस नई खोज के बाद विश्व की सभी औद्योगिक नीतियों पर पुनर्विचार करने की तत्काल आवश्यकता है। भारत सहित सभी विकासशील देशों को अपनी औद्योगिक प्रक्रियाओं में सुधार लाना होगा और फीडस्टॉक रसायनों के रिसाव को रोकने के लिए कठोर नियम बनाने होंगे। यह केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है।