पहलगाम हमला एक साल: आतंक की पीड़ा अभी बाकी
पहलगाम के आतंकवादी हमले को आज एक साल हो गया है। यह दिन उन सभी परिवारों के लिए हर बार दोबारा आता है जिन्होंने अपने अपनों को एक ही पल में खो दिया था। बाईसरन घाटी में जो कुछ घटा था वह न केवल एक घटना थी, बल्कि कई परिवारों के सपनों को मिट्टी में बदल देने वाली एक त्रासदी थी।
22 अप्रैल 2025 को जम्मू कश्मीर के पहलगाम इलाके में जो हुआ उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। बायसरन घाटी का वह शांत और खूबसूरत मैदान एक ही पल में चीखों और रुलाई से गूंज उठा। यह एक त्यौहार जैसा वक्त था, लोग खुशियां मना रहे थे, बच्चों की हंसी सुनाई दे रही थी। लेकिन आतंकियों की गोलियों ने सब कुछ बदल दिया। 26 लोगों ने अपनी जान गंवाई और सैकड़ों परिवार टूट गए।
एक बेटी जो महज चार दिन पहले दुल्हन बनी थी, आज अपने पति का सिर अपनी गोद में लिए बैठी है। उसकी खुशियों के सपने खून में तब्दील हो गए। उसके परिवार के लिए यह विवाह का मौसम बदल कर मातम का मौसम हो गया। जो कपड़े खुशियों में पहने जाने थे, वही कपड़े शोक में पहने जाने लगे।
हर दिन फिर से मरना है उन परिवारों का
एक साल बाद भी जब इन परिवारों से बात की गई तो उनकी आंखों में वही पीड़ा नजर आई। माता-पिता जो अपनी संतान को सुरक्षित समझते थे, उन्हें एक ही सेकंड में अनाथ बना दिया गया। पत्नियां जो अपने पतियों का इंतजार करती थीं, उन्हें कफन में बदलकर दिया गया। बच्चों के पिता जो उन्हें स्कूल से लेने वाले थे, वह कभी नहीं लौटे।
पहलगाम के इस हमले के बाद पूरे इलाके में एक अलग ही सन्नाटा छा गया। दुकानें बंद रहने लगीं, बाजार सूने हो गए और घरों में सिर्फ रुलाई सुनाई देने लगी। जो लोग यहां पर्यटन के लिए आते थे, वह अब डर के साथ आते हैं। जो होटल मालिक अपने व्यापार से खुश थे, वह अब अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं।
यादों के सहारे जीना सीखना पड़ा इन परिवारों को। हर सुबह जब ये लोग उठते हैं तो सबसे पहली याद उन्हें अपने प्रिय जनों की आती है। खाना बनाते समय, कपड़े धोते समय, यहां तक कि सोते समय भी यह पीड़ा उनका पीछा नहीं छोड़ती। कुछ माताएं अभी भी अपने बेटों के लिए खाना पकाती हैं और फिर याद आता है कि उनके बेटे अब नहीं हैं।
समाज का घाव अभी भरा नहीं है
आतंकवाद केवल उन लोगों को नहीं मारता जो सीधे हमले में मारे जाते हैं। यह उनके परिवारों, उनके समाज और पूरे इलाके को मार देता है। पहलगाम का यह हमला सिर्फ एक घटना नहीं थी, बल्कि यह एक पूरी कहानी का अंत था और कई कहानियों की शुरुआत जो अब हमेशा अधूरी रहेंगी।
इस इलाके में जो हजारों परिवार हैं, उन सभी ने किसी न किसी को खो दिया है। कोई अपना भाई खो गया, कोई अपना पिता, कोई अपनी प्रेमिका। ये सब अब यादों में ही जीते हैं। जब भी कोई त्यौहार आता है तो एक सीट खाली रह जाती है। जब भी कोई खुशी का मौका आता है तो कोई न कोई उसके साथ नहीं होता।
पहलगाम का यह हमला भारत की सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा सवाल है। लोग पूछते हैं कि क्या यह हमेशा होता रहेगा? क्या हमारे बच्चे कभी सुरक्षित हो सकते हैं? क्या हम फिर से अपने प्रियजनों को किसी उत्सव में भेज सकते हैं बिना डर के?
इंसानियत का संघर्ष जारी है
लेकिन इस सब के बीच भी यहां के लोगों में एक हिम्मत है। वह अपने आस-पड़ोस की मदद करते हैं, एक-दूसरे को सांत्वना देते हैं और यह प्रण लेते हैं कि आतंकवाद उन्हें बांट नहीं पाएगा। जो माताएं अपने बेटों को खो चुकी हैं, वह अपने पड़ोसियों के बेटों को अपने बेटों से भी ज्यादा प्रेम करती हैं।
पहलगाम का यह एक साल एक बहुत बड़ी याद बन गया है। हर 22 अप्रैल को यह इलाका बदल जाता है। लोग अपने घरों के अंदर रहते हैं, लालटेन जलाते हैं और अपने मरहूमों को याद करते हैं। यह दिन उन सभी को बताता है कि आतंकवाद कितना क्रूर है, कितना निर्दयी है।
आज जब हम इस एक साल को याद करते हैं तो हमें उन सभी शहीदों को सलाम करना चाहिए जिन्होंने अपनी जान गंवाई। उनके परिवारों को हर संभव मदद देनी चाहिए। समाज को इस दर्द को समझना चाहिए और एक-दूसरे का साथ देना चाहिए। क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सेना की नहीं है, यह हर नागरिक की है। और यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हम एक-दूसरे के साथ खड़े हों, जब तक हम इंसानियत को सबसे ऊपर रखें।
पहलगाम का यह हमला भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन उन लोगों के सपने हमें आगे बढ़ने का रास्ता दिखा सकते हैं। उनकी यादें हमें बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। और यह है असली इंसानियत का जश्न।




