पाकिस्तान-चीन दोनों अलग खतरा: नरवणे की राय
पूर्व सेना प्रमुख नरवणे ने कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद से खतरा है, जबकि चीन दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धी है। जानिए भारत के लिए कौन बड़ा चुनौती।
भारत की सुरक्षा व्यवस्था के लिए पाकिस्तान और चीन दोनों ही प्रमुख चुनौतियां हैं, लेकिन दोनों के खतरे की प्रकृति बिल्कुल भिन्न है। यह बात पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने हाल ही में कही है। उनके अनुसार, पाकिस्तान से तत्काल सुरक्षा खतरा है जो आतंकवाद के रूप में भारत के पश्चिमी क्षेत्रों को निशाना बनाता है। वहीं दूसरी ओर, चीन एक दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धी के रूप में उभर रहा है जो भारत के भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
जनरल नरवणे की यह टिप्पणी समसामयिक और महत्वपूर्ण दोनों है क्योंकि यह भारत की भू-राजनीतिक स्थिति को स्पष्ट करती है। वर्तमान परिदृश्य में, भारत को न केवल पाकिस्तान से आतंकवादी हमलों का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि चीन के साथ सीमावर्ती विवाद भी अनसुलझे हैं। इन दोनों चुनौतियों से निपटना भारत के लिए एक जटिल कार्य है।
आतंकवाद का तत्काल खतरा: पाकिस्तान की चिंता
पाकिस्तान से भारत को आने वाला सबसे गंभीर और तत्काल खतरा आतंकवाद है। पिछले दो दशकों में पाकिस्तान-आधारित आतंकवादी संगठनों ने भारत में कई हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया है। जैश-ए-मुहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे संगठन भारतीय सुरक्षा बलों के लिए निरंतर सिरदर्द बन गए हैं।
26/11 मुंबई आतंकवादी हमले से लेकर पुलवामा हमले तक, पाकिस्तान-आधारित आतंकवादियों ने भारत को कई ब्लीडिंग स्ट्राइक दिए हैं। इन घटनाओं में सैकड़ों निर्दोष नागरिकों की जान गई है और हजारों घायल हुए हैं। भारत के सुरक्षा बलों को प्रतिदिन इन आतंकवादी संगठनों से निपटने के लिए अत्यधिक सतर्कता बरतनी पड़ती है।
जनरल नरवणे का कहना सही है कि पाकिस्तान से आने वाली इस तरह की चुनौती भारत के लिए तत्काल और जीवंत है। भारतीय सेना को सीमावर्ती क्षेत्रों में हमेशा तैयार रहना पड़ता है। पश्चिमी सीमा पर भारतीय सुरक्षा बलों की एक बड़ी तैनाती है जो लगातार निगरानी और कार्रवाई में संलग्न रहती है। यह भारत की सैन्य संसाधनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दीर्घकालीन चुनौती: चीन की उभरती प्रतिद्वंद्विता
जबकि पाकिस्तान से आने वाली चुनौती तत्काल है, चीन की ओर से आने वाली चुनौती अधिक संरचनात्मक और दीर्घकालीन है। चीन न केवल एक सैन्य शक्ति के रूप में विकसित हो रहा है, बल्कि आर्थिक और तकनीकी क्षेत्रों में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद दशकों से चले आ रहे हैं।
1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। तब से लेकर अब तक, भारत-चीन सीमा पर तनाव की स्थिति बनी रहती है। हाल के वर्षों में, विशेषकर 2020 में गलवान घाटी में हुए संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया कि चीन के साथ भारत का रिश्ता काफी जटिल है।
चीन के पास न केवल एक विशाल सेना है, बल्कि वह परमाणु शक्ति संपन्न देश भी है। चीन की सैन्य क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं। साथ ही, चीन का आर्थिक विकास भी भारत को पीछे छोड़ देता है। चीन की एक-पेल्ट नीति और आर्थिक प्रभाव क्षेत्र का विस्तार भारत के लिए चिंता का विषय है।
जनरल नरवणे का दृष्टिकोण यह है कि जहां पाकिस्तान को अल्पकालीन सतर्कता की आवश्यकता है, वहीं चीन के साथ भारत को दीर्घकालीन रणनीति बनानी चाहिए। चीन एक बड़ी आर्थिक शक्ति है और भविष्य में और भी शक्तिशाली हो सकता है। इसलिए भारत को अपनी सैन्य क्षमता को लगातार बढ़ाना, अपने सहयोगियों से संबंध मजबूत करना और आर्थिक विकास पर ध्यान देना होगा।
भारत की द्विमुखी कूटनीति की जरूरत
भारत के लिए पाकिस्तान और चीन दोनों के साथ अपने संबंधों को संभालना एक कला है। जनरल नरवणे ने सुझाव दिया है कि भारत को इन दोनों देशों के साथ किसी भी विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से हल करने की कोशिश करनी चाहिए, लेकिन साथ ही अपनी शक्ति को भी मजबूत रखना चाहिए।
भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। अमेरिका, जापान और अन्य लोकतांत्रिक देशों के साथ भारत के संबंध महत्वपूर्ण हैं। क्वाड (Quad) गठबंधन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है जहां भारत समान विचारधारा वाले देशों के साथ सामरिक हित साझा कर सकता है।
पाकिस्तान के साथ भारत को कूटनीतिक चैनलों के माध्यम से संवाद बनाए रखना चाहिए, लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। चीन के साथ सीमा विवाद को हल करने के लिए भी बातचीत जारी रहनी चाहिए, लेकिन भारत को अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर कोई दबाव स्वीकार नहीं करना चाहिए।
आने वाले समय में भारत की सुरक्षा नीति को इन दोनों चुनौतियों को संतुलित तरीके से सामना करना होगा। पाकिस्तान से तत्काल खतरे से निपटते हुए, भारत को चीन की दीर्घकालीन चुनौती के लिए भी तैयारी करनी चाहिए। यह संतुलनकारी कार्य भारत की सुरक्षा और समृद्धि के लिए अत्यावश्यक है।
जनरल नरवणे की यह बातचीत भारत की सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश है जो भारतीय नीति निर्माताओं को अपनी रणनीति बनाने में मदद दे सकती है।




